Sun. Sep 23rd, 2018

मधेश मे हिन्दी अपरिहार्य भाषा : बी.के. पासवान

प्रिय पाठक मित्रों !
24-जनवरी,2018 – बि.के. पासवान । आज दुनियां भरमे एक लहर चल रहा है, स्वाभिमान और पहचान के लिए हर ब्यक्ति-समुदाय अपने बिगत की ऐतिहासिक उत्पीडन से छूटकारा पाने के लिए तथा बिगतकी भूल को आजके वर्तमानमे सुधारनेका प्रयास मे लगा हुआ है ताके उनके आनेवाली पिँढीको उन्हीं चीजोंके लिए फिरसे संघर्ष करना न पड़े ।
आज हमारे मधेशमे भाषा एक पेचिदा मुद्दा बना हुआ है। हिंदी भाषाके बिरोधमे नेपालके नेपालीभाषी तो खुले रूपसे बिरोध करते आ ही रहे थे, वहीं कुछ मधेसी लोग भी उन्हीके नक्स-ओ-कदम पर चलने के लिए उत्सुक दिखाई दे रहे हैं । इसका एक ही कारण ये है की हमारे मानसपटलमे महेन्द्रिय नेपाली राष्ट्रवाद का मिश्रित घोल पूरी तरहसे घुल-मिल गया है। जिसके कारण मधेशके कुछ संभ्रांत वर्ग तथा अर्धचेतन लोगोंको को भी हिन्दी भाषा से इतनी नफरत इसलिए हो रही है की बचपनसे उनको-हमको सिखाया गया की ये हिंदी भाषा मानों भारतकी ही पेटेंट आधिकारिक भाषा है और उसीतरह नेपाली भाषा केवल नेपालकी ही पेटेंट आधिकारिक भाषा है, जबकि तथ्य बिलकुल अलग है। अगर ऐसा कुछ दुनियाँमे होता तो किसी की मुल्क की भाषा बोलनेपर दूसरे मुल्कोंको पेटेंट अधिकार बापत निश्चित रकम देनेका संधि किया होता।
अगर नेपालकी आधिकारिक भाषा नेपाली होती तो संयुक्त राष्ट्रसंघ में नेपालकी लिपि के रूपमे रंजना लिपि तथा भाषा के लिए नेपाल भाषा (नेवारी) को रजिस्टर नहीं किया गया होता। बड़े दुखकी बात है की अभी माहौल ऐसा बनाया गया है की अगर नेपाल में कहीं कोई हिंदी लिखे-बोले तो वो पक्का देशद्रोही या नेपाली भाषा का बिरोधी या अपने ही मातृभाषा (मैथिलि/भोजपुरी/अवधी/बज्जी/राजवंशी/थारू/कोची…) का बिरोधी है।
मानों अगर मुझे हिंदी भाषा-साहित्य से कुछ ज्यादा लगाव है तो इसका मतलब ये तो कतई नहीं की मैं अपने ही मातृभाषा(मैथिलि/भोजपुरी/अवधी…) का बिरोधी हूँ। अगर मेरे बातको आप गलत तरीकेसे अर्थ निकालेंगे तो ये आपकी परेशानी है और इससे बेकार आप औरोंको भी परेशान कर रहे हैं।
हमारे पूर्ब-पश्चिम मधेशमें लोगोंके रहनसहन और सांस्कृतिक चीज़ों में बहुत समानताएं है, या यूँ कहें एकरूपता है, बस जरुरत है तो केवल भावनात्मक रूपसे सारे मधेसीको एकजुट करनेकी, जो की केवल हिंदी भाषा ही ये जादू कर सकता है।
नेपालमे प्रजातंत्र पश्चात जितने भी मधेशके मुद्दे उठाये गए उनमे मधेसी नेतृत्व ने हमेशा मधेशीको एकजुट करने के लिए हिंदी भाषा को प्रमुख प्राथमिकता में रखा । लेकिन नेपालकी राज्यसत्ताने आजतक किसी न किसी तरीके से मधेशीके साथ धोखाधड़ीका शिलशिला जारी रखा। मधेशियोंको कहीं भाषा के नामपर तो कभी मधेसी समुदायको ही बिभिन्न क्लस्टर (दलित,मुस्लिम,जनजाति) को अलग समुहमें बाटकर सत्ता अपना स्वार्थ पूर्ति करनेमे सफल हो रहा है।
गणतंत्र से पहले तराई कांग्रेस और नेपाल सद्भावना पार्टी द्वारा हर आन्दोलनमे प्रमुख एजेंडा मधेशकी सम्पर्क भाषा हिंदी को मान्यता देना था जो की वही बात आजके दिनमे भी बहोत सन्दर्भिक है। अगर आप सम्पूर्ण मधेश का वकालत करते हैं तो सम्पूर्ण मधेशको भावनात्मक सूत्रमे बाँधनेका तरिका सोचना होगा, बिभिन्न भाषिक समूहमे बटें समुदायको एकत्रित करके भावनात्मक रूपसे जोड़ने के बारेमे सोचना होगा और तब जाकर मधेशके सारे मधेशीय भाषा – कोची, राजवंशी, मैथिलि, बज्जी, ठेठी, भोजपुरी, अवधी, थारू .. जैसे मोतिरुपी मातृभाषी को एक ही मालामे पिरोकर सुन्दर हार रूपी एक सबल और एकजुट मधेशी समाज बना सकते हैं।
जिसतरह अंग्रेजी बोलनेवाला सारे अंग्रेज नहीं होते। वैसे हिंदी बोलनेवाले सारे इन्डियन हो ये जरुरी नहीं। भाषा एक संवादका माध्यम है, बौद्धिक बिकासका माध्यम है।
हमें समझना चाहिए की दुनियामें जितना महत्व अंग्रेजी भाषा का है, उतना ही महत्व दक्षिण एसियामे हिंदी भाषा का भी है, हिंदी भाषाके आधुनिक बोलीचालीमे कुछ उर्दू शब्द का भी मिश्रण होते आ रहा हैं। जिससे हिंदीकी भाषिक मिठास और भी बढ़ जाती है।
अन्तमे, आप सभी से निवेदन है की पूर्ब-पश्चिम पुरे मधेसी समुदाय को एक आधार पर लानेके लिए हिन्दी भाषा को भी जोड़ दें, यही आजकी आवश्यकता है।
ऊपर दिए गए बिचारको ठीक उसी तरह समझनेके लिए आपका धन्यवाद।
( @bkpaswan )

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एक फेसबुक मित्र ने थोड़ा चिढ़ते हुए कहा : मधेशमे हिंदी के वजाय हम संस्कृत ही क्यों न कामकाजी भाषाके रूपमे लागू करें ? मेरा जवाफ था: अब वो वक़्त नहीं रहा … भारत नव निर्माण के समयमे अगर डा. अम्बेडकर की प्रस्ताव मानकर वहां संस्कृत को कामकाजी भाषा बना दिया गया होता तो हमारे पडोश की भाषा-संस्कृती का भी उसीतरह प्रभाव पड़ता,… बालीवूड भी संस्कृत भाषामे होता, आज हम भी हिंदी के जगह संस्कृत बोल रहे होते… तब आज के समय मे हमारे यहां भी कामकाजके रूपमे संस्कृत लागु हो सकता था… मधेशके लोग भी भारत के बिभिन्न संस्थानों… Read more »