मधेश हर क्षेत्र में पिछड़ा है और इसका मुख्य कारण है: राज्य की विभेदकारी नीति

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डा. अजय कुमार यादव एमबीबीएस, एमएस (आर्थोपेडिक सर्जरी), क्लिनिकल फेलो आफ स्पाइन सर्जरी

० आप मूलतः कहाँ से हैं ? अपने विषय में कुछ बताएँ ।
– मैं नेपाल के तराई क्षेत्र से हूँ, मधेशी मूल का हूँ । पेशे से चिकित्सक हूँ और आर्थोपेडिक विशेषज्ञ हूँ । मेरा जन्म बीरगंज के मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ । मेरे पिताजी डा. श्री शिवशंकर यादव भी पेशे से चिकित्सक हैं और एक बात मैं बताना चाहूँगा अपने पिताजी के विषय में कि वो भले ही चिकित्सा क्षेत्र से सम्बद्ध हैं, किन्तु एक विशेषता और पहचान उनकी यह है भी कि वो लेखन क्षेत्र से भी सम्बद्ध हैं और नेपाल के हिन्दी लेखकों में उनकी अपनी एक अलग पहचान है । पिताजी ‘विमल कृष्ण’ उपनाम से भी जाने जाते हैं ।
० आप डाक्टर हैं किन्तु इसके अलावा आपकी रुचि और किस क्षेत्र में है ?
– डाक्टर तो मैं हूँ यह मेरा कर्म क्षेत्र है किन्तु मेरा रुझान, मेरी रुचि साहित्य, दर्शन, राजनीति, इतिहास, कानून इन सबमें है । जब भी मुझे वक्त मिलता है मैं इन विषयों से सम्बन्धित पुस्तकों को पढता हूँ । कभी कभी तो वक्त की कमी खल जाती है अपनी पेशेगत व्यस्तता को लेकर । उस वक्त अफसोस भी होता है । बायोग्राफी अध्ययन का भी मुझे शौक है । अभी जब भी मुझे समय मिलता है उस समय का सदुपयोग मैं डा. महाथिर मोहम्मद की जीवनी को पढ़ने में कर रहा हूँ ।
० आप तराई क्षेत्र से हैं, यह क्षेत्र आज भी शिक्षा और स्वास्थ्य के मामले में अत्यन्त पिछड़ा हुआ है, इस समस्या का निदान कैसे हो सकता है ?
– बिल्कुल सही कहा आपने । तराई या मधेश आप जो भी कहें, ये क्षेत्र वर्तमान नेपाल के अन्तर्गत शिक्षा और स्वास्थ्य में अत्यन्त पिछड़ा हुआ है । किन्तु अगर इतिहास को देखा जाय तो इसका पौराणिक और मध्यकालीन इतिहास ऐसा नहीं था । वर्तमान नेपाल में इसके पिछड़ेपन का महत्त्वपूर्ण कारण है राज्य की विभेदकारी नीति । जिसके चलते यहाँ के लोगों पर किसी और क्षेत्र की भाषा, वेषभूषा और शिक्षा प्रणाली को जबरन लादकर यहाँ की मौलिकता और शैक्षिक वातावरण का दमन किया गया । साथ ही नौकरशाही पैदा करने वाली प्रणाली को जन्म दिया गया । मेरी स्पष्ट धारणा है कि विभेद से शोषण पैदा होता है, शोषण से गरीबी और गरीबी से विभिन्न क्षेत्र में दलाल, भ्रष्टाचार और पिछड़ापन पैदा होता है । यही कारण है कि मधेश केवल शिक्षा और स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है । याद रहे कि जब मैं विभेद की बात करता हूँ तो वो केवल नेपाल राज्य के द्वारा किया गया विभेद नहीं है बल्कि स्वयं मधेश के अन्दर व्याप्त जातपात, रंगरूप और अमीर गरीब के बीच का भी विभेद है । वर्तमान नेपाल राज्य मधेश के उस आन्तरिक विभेद का फायदा उठा रहा है और उसका पक्ष पोषण कर के दलालों के मार्फत अपनी आन्तरिक उपनिवेश को कायम रखे हुए है । जब तक हम अपने अन्दर के दलाल और नौकरशाह प्रवृत्ति को खतम नहीं कर देते तब तक हम राज्य से प्रभावपूर्ण तरीके से नहीं लड़ सकते । और जब तक राज्य समान व्यवहार मधेशियों के साथ नहीं करेगा तबत क यह पिछड़ापन रहेगा । इसलिए मेरे विचार से मधेश शुद्धिकरण और फिर निर्णायक राजनीतिक संघर्ष कर के समाज की अवस्था को बदला जा सकता है । कर्मठ और इमानदार नेतृत्व के द्वारा मधेश की समस्याओं का चीरफाड़ कर के इसके रोग को ठीक किया जा सकता है ।
० मधेश आन्दोलन के विषय में आपके क्या विचार हैं ?
– जैसा कि मैंने कहा कि मधेश शोषण, विभेद और आन्तरिक उपनिवेश का शिकार हुआ जब से पृथ्वी नारायण शाह ने गोर्खा राज्य विस्तार किया अन्ततः इस औपनिवेशिक मानसिकता और स्थिति को खत्म करके मधेशियों को राज्य संचालन में समान अधिकार और समान व्यवहार करने के लिए मधेश की संस्कृति को बचाने के लिए मधेश आन्दोलन के अलावा कोई विकल्प नहीं है । किन्तु मेरा मानना है कि आन्दोलन के स्वरूप को बदल कर इसे प्रभावशाली बनाना होगा । समय समय पर मधेश के इतिहास को देखें तो बहुत बार विद्रोह हुआ है, कागज पर अधिकार भी दे दिए गए हैं, लेकिन अब एक निर्णयक धक्का मधेश आन्दोलन के रूप में जरुरी है उस कागजी अधिकार को व्यवहारिक रूप देने के लिए । मधेश के नेताओं को यह बात बहुत गौर से समझना होगा । जैसा कि मैंने कहा कि कर्मठ और ईमानदार नेतृत्व ही केवल मधेश की समस्या का हल निकाल सकता है । जनता सड़क पर आने के लिए तैयार है लेकिन क्या मधेशी नेता तैयार हैं ? इस प्रश्न को ठीक से बिना समझे केवल आवेश में और अपनी पार्टी के प्रचार के लिए मधेश आन्दोलन स्वयं में मधेशी जनता का शोषण है ।
० नेपाल की राजनीतिक परिस्थितियों के विषय में आपकी क्या राय है ? क्या आपको नहीं लगता कि राजनीति से बौद्धिक वर्ग को जुड़ने की आवश्यकता है ?
– मेरा मानना है कि नेपाल अभी देश नहीं बना है अतः यहाँ की कोई भी पार्टी राष्ट्रीय पार्टी नहीं है । हर एक पार्टी जो खुद को राष्ट्रीय पार्टी होने का ढोल पीटती है, वो भी क्षेत्रीय, जातीय या अन्य विभेदकारी सोच से ग्रसित है और उसी के नाम पर जनता को केवल वोट बैंक समझती है । आम जनता जो गरीब है, अशिक्षित है वो मजबूरी में अपना काम करवाने के लिए ऐसे पार्टियों के पीछे पड़ती है जिसको वो अपना राष्ट्रीय आधार बताते हैं ये हमारे यहाँ बन्दरबांट प्रजातंत्र का रोना है । असल में पार्टियाँ यहाँ कि इसी बन्दर बांट नीति का फायदा उठाती हुई दुकानदारी की तरह जम गई है । खास में इनको जनता की सेवा और सरकार से कोई लेना देना ही नहीं है । रही कुछ छोटी पार्टियाँ जो मधेशियों या जनजातियों का या पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है वो अधिकार के लिए अभी भी लड़ रही है लेकिन समय पड़ने पर वो भी पार्टी को दुकान बनाने लगे हैं और स्वार्थ की दुकानदारी करने लगे हैं ।
नेपाल के वर्तमान संविधान में और भी कुछ मुश्किलें पैदा हो गई हैं । महेन्द्रकालीन नीतियों को बस भाषा बदलकर बहुत चातुर्य से लिपिबद्ध किया गया है क्योंकि संविधान के स्रष्टा जानते हैं कि खुलकर फासीवाद को लिपिबद्ध करना मुश्किल ही नहीं बल्कि बेवकूफी भी है । अतः राजनीति अब पुरानी सड़े गले चेहरों से जो लोकतंत्र का फायदा उठाकर घृणात्मक खेल खेलने में माहिर है उनसे अब राजनीति को मुक्त होना होगा और बौद्धिक वर्ग को राजनीति से जुड़ने का ये संवेदनशील समय आ चुका है । वैज्ञानिक नियम है हर वस्तु का एक एक्सपाइरी डेट होता है इसलिए पुराने राजनीतिकर्मियों के हाथ से अब राजनीति को बौद्धिक वर्ग में आना जरुरी है । बौद्धिक वर्ग सिर्फ सिस्टम को दोष देकर हाथ पर हाथ धरे नहीं ब ैठ सकते । उनको अब राजनीति से बिना देर किए जुड़ना चाहिए और पुरानी भ्रष्ट और असक्षम राजनीतिज्ञों को प्रतिस्थापित करना होगा ।
० आप अपने जापान प्रवास के विषय में कुछ जानकारी दें ।
अभी जापान में मैं अपनी सब–स्पेशलिटी के लिए रह रहा हूँ । नेपाल में सब स्पेशलिटी उपलब्ध नहीं है । इसलिए बाहर जाने की मजबूरी है । मैं फिलहाल यहाँ स्पाइन सर्जरी में पीएच डी कर रहा हूँ । जापान जैसे विकसित देश में स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा के बारे में देखने और समझने को मिला है मैं यह अनुभव मधेश और वत्र्तमान नेपाल में बताना चाहूँगा अगर मुझे सही प्लेटफार्म मिला तो । यहाँ के बारे में बताने को और इनकी नीतियों की चर्चा किसी और समय करना उचित होगा ।
० मधेश के लिए भविष्य में क्या आप कुछ करना चाहेंगे ?
– मधेश की मिट्टी से मुझे प्रेम है । इसी मिट्टी में मेरे दादा परदादा मिले हुए हैं । यहाँ का इतिहास खास है और संस्कृति भी वत्र्तमान गोर्खा नेपाल और ब्रिटिश भारत से अलग है । मधेश केवल भूगोल नहीं है, यह भावना भी है, संस्कार और एक जीवन पद्धति भी है किन्तु गोर्खा राज्य विस्तार के बाद से मधेश के साथ क्रूरतम व्यवहार किया गया । मधेश का शोषण और बलात्कार किया गया है । ये बात बौद्धिक वर्ग को समझनी होगी और मेरी पीढ़ी जो महेन्द्र माला की शिक्षा प्रणाली के अन्तर्गत भ्रमित हुई है उनको विचार करना होगा । अन्याय विभेद और शोषण के विरुद्ध कोई भी लड़ाई न्याय के पक्ष में होती है इस बात को मैं नई पीढ़ी को बताना चाहूँगा ।
जैसा कि मैंने पहले कहा कि मधेश केवल गोर्खा राज्य विस्तारित चिन्तन से पीड़ित है, मधेश को इससे मुक्ति दिलाना होगा और सम्पूर्ण मधेश को एकता के सूत्र में बाँधते हुए विकास और समानता का विश्वव्यापि राह पर लेकर चलने की आकांक्षा मेरे अन्दर है । समय और अवसर मिला तो मधेश के भविष्य में मैं अपने विचारों पर अटल रहते हुए एक समृद्ध मधेश की रचना करना चाहूँगा ।
० स्वास्थ्य सम्बन्धी जनचेतना फैलाने के लिए कुछ कारगर उपाय जो आपकी निगाह में हो ।
– मेरा मानना है, स्वस्थ्य शरीर से स्वस्थ मन और स्वस्थ्य मन तथा शरीर से स्वस्थ समाज का विकास होता है । अतः हमारे अन्दर की नकारात्मक भावना को छोड़ना होगा और स्वस्थ शरीर के प्रति आम जनता को सजग बना कर स्वस्थ समाज का निर्माण करना चाहिए । इसकी शुरुआत हम आमलोगों में स्वास्थ्य प्रति जनचेतना फैलाकर कर सकते हैं । विभिन्न पत्र पत्रिका, रेडियो, टेलिविजन और इन्टरनेट के माध्यम से हम लाखों जनता तक स्वास्थ्य सम्बन्धी चेतनामूलक समाचार दे सकते हैं । उसी तरह मौजूद स्वास्थ्यकर्मी भी अपने समय का छोटा सा हिस्सा अगर समाज की सेवा में दे और समय समय पर फ्री मेडिकल कैम्पस करें तो प्रत्यक्ष रूप से हजारों जनता तक स्वास्थ्य के प्रति जनचेतना पहुँचाया जा सकता है तथा उनकी सेवा की जा सकती है । स्वास्थ्य इसके नियम और रोग के लक्षण के प्रति सजग बना सकते हैं जिस से कि कम से कम कोई भी रोग समय पर पता किया जा सके और उपचार हेतु सही जगह और सही उपचार विधि के बारे में लोगों को खबर कर सकते हैं । गाँव–गाँव में स्वयं सेवक लोकल स्तर पर भी किया जा सकता है । उसके लिए राज्य का मुँह देखने की जरुरत नहीं है । हमारे यहाँ अभी भी केवल जनचेतना के अभाव में हजारों लोगों की जानें जाती हैं । जिसमें सबसे प्रमुख है मातृ शिशु की दयनीय स्वास्थ्य स्थिति । सिर्फ सफाई से बहुत सारे संक्रामक रोगों से बचा जा सकता है । इसको जन जन तक पहुँचाने हेतु पत्र पत्रिका और अन्य साधन कारगर उपाय हैं बस हमार अन्दर दो चीजों की जररत है एक इच्छा शक्ति और दूसरा पूर्ण ईमानदारी ।
० हिमालिनी के लिए आपके विचार ?
हिमालिनी को मैं पहली बार अपने बाबूजी के द्वारा जान पाया । मैंने पहले ही कहा कि पिताजी की रुचि लेखन में है । वो अपनी रचनाएँ हिन्दी में लिखते हैं विमल कृष्ण उपनाम से । साहित्य और राजनीत के प्रति मेरी रुचि उनसे ही मिली है । ९० में मुझे पहली बार हिमालिनी पढ़ने का मौका मिला । उसमें प्रकाशित लेख हिन्दी भाषा को जीवित रखने के लिए नहीं बल्कि मधेशी संस्कृति और विचारों को भी जीवित रखने का प्रयास था, ये मैं तब उसके कुछ अंक को पढने के बाद ही समझ गया था । आज हिमालिनी का कद पहले से बड़ा हुआ है । ना केवल मधेश बल्कि साउथ एशिया की आवाज बन गई है और विरोधियों तक भी इसमें प्रकाशित लेख की गूँज पहुँचती है । इसलिए हिमालिनी सदा अपने कत्र्तव्य पथ पर अपने लक्ष्य के साथ अटल अविचल चलती रहे और जन जन की सेवा करती रहे । मैं इसके लिए शुभकामना देता हूँ । ऐसे पवित्र काम में जुड़े हुए हर कर्मचारी और स्वयंसेवक को मैं सहृदय धन्यवाद और शुभकामना देता हूँ । आप सभी को नववर्ष २०७३ की शुभकामना ।
हिमालिनी परिवार की ओर से भी आपको बहुत सारी शुभकामना और आप अपने लक्ष्य में सफल हों यही हमारी कामना है । धन्यवाद ।

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