मधेसी आयोग पर एक नजर :रणधीर चौधरी

Randhir Chaudhary

रणधीर चौधरी

कहा जाता है कि हक मांगने से नहीं छीनने से मिलता है । कुछ इसी तरह, वि. सं. २०६७—१०—६ गते वकील सुनिल रंजन सिंह के द्वारा सुप्रीम कोर्ट में मधेसी आयोग गठन के लिए एक रिट दायर किया गया ।
मासूम बच्ची पूजा साह के बलात्कार के विरोध में माइतीघर मंडला में मोमबत्ती जुलूस निकालने की तैयारी का जिम्मा मुझे दिया गया था,थर्ड एलायन्स के द्वारा । सभी अधिकारपे्रमियों को शाम छः बजे माइतीघर मंडला पहुँचने के लिये समाजिक संजाल फेसबुक और टवीटर के माध्यम से सूचित किया जा रहा था । तकरीबन ४ः३० में फोन आया , रणधीर जी मधेसी आयोग गठन करने लिए सुप्रीम कोर्ट ने परमादेश जारी कर दिया । फोन था वकील दिपेन्द्र झा का । और चार साल की लम्बी प्रतीक्षा के बाद सर्वोच्च अदालत द्वारा फाल्गुन २५ को परमादेश जारी किया गया । बात कुछ महीने पहले की है । कामरेड ओली नेपाली मीडिया के माफर्त बोल रहे थे कि नेपाल में मधेस और मधेसी नहीं है । यूँ कहे तो यह आयोग कामरेड ओली को सुप्रीम कोर्ट द्वारा मारा गया एक तमाचा है, अधिकतम टिप्पणीकारों का भी यही मानना है ।
क्यों चाहिये मधेसी आयोग
हम कहीं भी आरक्षण कोटा में आवेदन भरते हैं तो हमें अपना इथनीसीटी प्रमाणित करवाना पड़ता है । जिला प्रशासन के दफ्तरो का चक्कर लगाने के बाद हमें वह प्रमाण मिलता है, वह भी किसी गैर मधेसी प्रशासकद्वारा । यहॉ अलग अर्थ ना लगे कि गैर मधेसी नेपाली नहीं है ? सरल तरीका से मधेसी प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिये मधेसी आयोग स्थापना होना अति आवश्यक है । आयोग ना होने की वजह से गैर मधेसी भी मधेसी प्रमाणित करवा के मधेसी आरक्षण का लुत्फ उठाते हैं । जिसकी पुष्टि करता है, राधिका गिरी का मुद्दा । जी हाँ, गिरी जो की एक पहाड़ी मुल की महिला है । जिल्ला प्रशासन दफ्तर से अपने आपको मधेसी प्रमाणित करवा के लोकसेवा आयोग तहत अकाउन्ट आफिसर में मधेसी आरक्षण सीट के माध्यम से नौकरी प्राप्त कर ली । सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दर्ज किया गया । फैसला में कहा गया, मधेसी प्रमाणित करने का जिम्मा जिला प्रशासन के मातहत में है । और राधिका गिरी का मधेसी प्रमाणपत्र कानूनन संगत है । इसीलिये इस मुद्दे को सदर किया जाता है । मधेसी आयोग की शीघ्र स्थापना की आवश्यकता इस एक प्रसंग से भी जाहिर होती है ।
मधेस आन्दोलन के पश्चात चार मुद्दा— समावेशी राज्य का निर्माण, मधेसियों के साथ नागरिकता में होने वाली हरेक प्रकार के भेदभाव का अन्त, मधेशियों के पहचान को संवैधानिक सुनिश्चितता प्रदान करना और राज्य संरचना द्वारा होने वाले स्रोत के बँटवारे में मधेसियों को बराबरी का हिस्सा । इन चार मुद्दों को अनुगमन करने वाला निकाय कौन सा है ? राज्य के पास कोई न कोई निकाय तो होना चाहिए । अन्तरिम संविधान के धारा १५४ के मुताबिक इन चार मुद्दों को स्थापित करवाने के लिए मधेसी आयोग का यथाशीघ्र स्थापना जरूरी है ।
अगर समानता के चश्मे से देखा जाए तो, नेपाल सरकार द्वारा कानुन पास कर, राष्ट्रीय महिला आयोग लगायत अन्य आयोगों के लिए भी कानुन पास कर विभिन्न आयोग स्थापना भी कर चुका है । जैसे कि– दलित आयोग, मुस्लिम आयोग, आदिवासी जनजाति प्रतिष्ठान । अगर नहीं बना है तो, मधेसी आयोग । अन्तरिम संविधान २०६३ के धारा १३ (३) द्वारा सुनिश्चित की गई समानता के सिद्घान्त को लागु करने के लिये मधेसी आयोग की स्थापना आवश्यक है ।
नेपाल सरकार तहत राष्ट्रीय योजना आयोग ने यूएनडिपी के सहयोग मे २०१४ में मानव विकास इन्डेक्स नामक एक प्रतिवेदन सार्वजनिक किया । जिसके अध्यन करने के बाद साफ पता चलता है, मधेस लगभग सभी जिला मानव विकास के हरेक सुचांक मे पीछे है और मध्य पहाड़ी भेग के हरेक जिला की अवस्था मधेस के जिलों से बेहतर है । खास कर मध्य पहाड़ी जिलों में से काठमाण्डु घाटी लगायत पूर्व के जिले सर्वाधिक विकसित दिखाए गए है । वहीं मधेस के हक में पर्सा से ले कर सप्तरी तक के जिलाें की अवस्था सबसे ज्यादा दयनीय है । परंतु ऐसा क्यों ? पूर्वी और मध्य तराई की समृद्घि का अपना इतिहास रह चुका है । पर इन दिनों मानव विकास के सूचांको में कैसे सब से पीछे पड़ गया ? क्या यह चिन्ता का बिषय नही ? शिक्षा क्षेत्र मे तो स्थिति और दर्दनाक है । नेपाल सरकार द्वारा किये गए पिछले तीन जनगणना को आधार माना जाय तो, मधेश में शिक्षा की स्थिति नीचे जाती दिख रही है । वि. सं २०४८ के जनगणना के अनुसार नेपाल के १० कम शिक्षित जिला में मधेस का सिर्फ एक जिला पड़ता था । वि. सं २०५८ में ३ और वि. सं २०६८ में आ कर १० में से ६ जिला मधेस का है । जबकि सारा संसार शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति का आसमान छू रहा है, नेपाल के ही विकट जिलाें में शिक्षा की स्थिति सुधरती जा रही है । परंतु मधेश के जिला और शिक्षा का ह्रास क्यों ? इस बिषय पर काठमाण्डु के सरकारी कर्मचारियों का दलील सुन कर अजीब लगता है । उनका कहना है, मधेस की यह स्थिति सांस्कृतिक कारण से हुई है । समृद्घि के हिसाब से मधेस सबसे ज्यादा समृद्घ हुआ करता था । नेपाल का अधिकांश पुराना शहर मधेस में ही था । शहर निर्माण के बाद शिक्षा का जागरण भी पहले मधेस में ही फैला था । नेपाल का अधिकांश स्कूल, कालेज का निर्माण मधेस में ही किया गया था । वि. सं २००७÷ ०८ में की गई जनगणना के अनुसार काठमाण्डौ घाटी के बाद सबसे अधिकतम साक्षर जिला में सप्तरी का नाम आता था । वि. सं २०२६ के स्नातक काउन्सिल के निर्वाचन में सबसे अधिक स्नातक पूरा करने वालो की संख्या सप्तरी जिले में थी । प्रश्न उठता है कि, बीते ५० बर्ष में मधेस की ऐसी स्थिति क्यों हो गई । यह केवल सांस्कृतिक कारण से हुआ या राज्य की नीति और संरचना के कारण हुआ ? इन सभी सवालों के जवाव ढूंढने के लिये और स्थिति में जल्द सुधार लाने के लिये मधेसी आयोग की यथाशीघ्र स्थापना जरूरी है ।
देश के विभिन्न निकाय का अवलोकन मधेसी आयोग द्वारा किया जायगा । देश में किसी भी कोने में मधेसी के साथ अगर भेदभाव किया जाता है तो उसका छानबीन करने का जिम्मा मधेसी आयोग को दिया जायगा ना की किसी और को । मधेस मे होने वाली हरेक सामाजिक समस्या को जड़ से उखाड़ फेंकने का दायित्व आयोग का होगा । मधेसी अपनी समस्या अपने अपने सरल और सुलभ भाषा में आयोग मे रख सकते हैं ।
चुप्पी और चर्चा
माननीय न्यायाधीश द्वय गिरिशचन्द्र लाल और दिपकराज जोशी के संयुत्त इजलास से मधेसी आयोग गठन करने के लिये परमादेश जारी हुआ । नेपाली मीडिया ने इसको अच्छा कवरेज भी दिया । सामाजिक संजाल मे मधेसी आयोग के गठन को ले कर बहुत लोगाें ने सकारात्मक अपडेट किया था । आयोग गठन के मुद्दे में बहस करने के लिये, वकील सुरेन्द्र महतो, दिपेन्द्र झा, सुनिल रंजन सिंह और गोविन्द बंदी को बधाई देने बालो की संख्या कम नही थी फेसबुक पर । लेकिन मधेशी जनता राजनीतिक कित्ता से भी मधेसी आयोग की आवश्यकता पर कुछ सुनना चाहता था । सोसल मीडिया में सक्रिय रहने वाले मधेसी नेताओं की तरफ से कुछ अपडेट देखना चाहता था । परंतु निराश होना पड़ा । इस परमादेश को सफल बनाने में जिस तरह की उर्जा की आवश्यकता है वह दिख नही रही । वैसे स्थान जहाँ से बुलंद आवाज आनी चाहिये थी आयोग स्थापना के लिये, वहाँ सिर्फ मौन दिखाई दे रहा है ।
आयोग गठन के लिये कैसे अच्छी टि.ओ.आर .(टर्म अफ रिर्फेन्स) बनाया जाय इस पर ध्यान न दे कर, कौन कौन आयोग मे शामिल होगा ? क्या–क्या सुविधाएँ मिलेगी इसमें ? इन बातो पर चर्चा व्यापक दिखाइ देती है, काठमाण्डौ में रहे कुछ मधेसियो द्वारा ।
एक अभियान का रूप लेना होगा इस आयोग को । आयोग को विफल बनाने मे या कहें तो आयोग को सीमित दायरा मे रखकर स्थापना करवाने के लिये चौतर्फीे प्रयास जारी है । हमें उस प्रयास को विफल बनाना होगा । एक संकल्प लेना होगा, इस आयोग को सफल बनाने का ।

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