मधेसी मानव के अस्तित्व और नेपाल सरकार द्वारा मधेस में बसाई जा रही प्रायोजित पहाडी बस्तियां

रोशन झा, सप्तरी।

वर्तमान राज्य संरचना के अनुसार स्थानीय सरकार और प्रादेशिक संरचना में नेपाल सरकार ने षडयन्त्र पूर्वक मधेस को टुकड़े  में विभाजित कर मधेसी एकता को तोडने का काम सफलता पूर्वक सम्पन्न कर लिया है। अशिक्षा, बेरोजगारी, गरीबी , राजनीतिक चेतना का अभाव, बढती  महंगाई, दमन, शोषण और बिभेदकारी शासन व्यवस्था होने के कारण अधिकांश मधेसी जनसमुदाय जिविकोपार्जन के लिए अनेका-अनेक सम्सयाओं से जूझ रही है । पूरव पश्चिम लोकमार्ग अन्तर्गत मोटरसाइकल यात्रा के दौरान गुरुवार शाम  को कोशी कटान के पास एक अजीब अवस्था के  व्यक्ति पर नजर  पडी जो दिखने में विल्कुल सोमालिया के नागरिक की तरह था, हमने उन से बातचीत  करने का प्रयास किया शारीरिक अवस्था अशक्त होने के कारण बडी मुस्किल से उन्होने अपना नाम श्याम दास बनियाँ बताया घर के बारे में पूछने पर घर नही है जबाब  मिला उसके आगे उन्होने हमें और कुछ  नहीं कहा। यह प्रसङ्ग इसलिए भी रोचक है की सोमालिया की  तरह मधेस में भी नरसंहार हो रहा है और भूख प्यास कारण सोमालिया के नागरिक की तरह अब मधेसी मानव भी दिखाई दे रहा है । चाहे मधेस आन्दोलन हो टिकापुर आन्दोलन घटना हो या के. पी. शर्मा ओली की मेची महाकाली भ्रमण बारम्बार सरकार द्वारा मधेसीयों का नरसंहार कराया गया है। औपनिवेश विभेद शोषण और सरकारी सोतेला व्यवहार के कारण मधेस में व्यापक रूप से पहाडीयों को बसाकर मधेसीयों को अपनी ही भूमि में भूमिहीन बना दिया गया। मधेस में उपनिवेश लादने के लिए सन् १८६२ और ६४ में नेपाल के प्रधान मंत्री जङ्गबहादुर ने अपने और अपने परिवारजन के नाम मे पश्चिम मधेस के बाँके, बर्दिया, कैलाली और कञ्चनपुर जिला  की  जमीन औपचारिक रुप से विर्ता वक्स के नामपर दिया गया। राणा शासकों ने पहाडीयों को मधेस में बसाने का औपचारिक प्रयास ”राप्ती उपत्यका योजना (१९२३) से सुरु किया। १९५० के बाद पहाडीयों द्वारा थारुओं का जमीन  हडपकर उन्हे कमैया कम्लरी में परिणत कर दिया। ”गुठी व्यवस्था” के नामपर मधेस के ६६,३५० विघा जमीन हडप लिया गया। सन् १९५४ में अमेरिकी सरकार के सहयोग से ”राप्ती भ्याली विकास आयोजना तहत २५,००० पहाडीयों को ५०,००० विघा जमीन  बितरण किया गया। राजा महेन्द्र के कार्यकाल में मधेस की बस्तियों से छल करके मधेस का जङ्गल बिनाश  कर राजमार्ग बनाया जिसका उद्देश्य राजमार्ग के नामपर पहाडीयों की बस्तियां बसाना था और औलो उन्मूलन कार्यक्रम से पहाडीयों को मधेस में बस्ती  बैठाने के लिए प्रोत्साहन किया गया | सन् १९६४ में ”नेपाल पुनर्वास कम्पनी” स्थापना किया गया जिसके तहत १९६४-१९८० तक १३१३३ परिवार को ३४,०३१ विघा जमीन बितरण किया गया, उसी  क्रममें १५०४ भूमिहीन आप्रवासी को ”नवलपुर पुनर्वास योजना” के तहत ३,२०० हे. जमीन में बसोवास कराया गया। सन् १९६८ में ” पुनर्वास विभाग द्वारा मधेस में अतिक्रमण कर बसे हुए ३७,००० पहाडीयों को व्यवस्थित रुप से बसाकर दर्ता किया गया । औलो उन्मूलन कार्यक्रम के बाद मधेस में पूर्व-पश्चिम राजमार्ग, पहाडीयोंका पुनर्वास, झोडा फडानी, राप्ती भ्याली आयोजना, भूमि सुधार, सहरी विकास आदि के कारण १९६० – १९८० तक भारी संख्या में पहाडीयों को मधेस में बसाया गया । डा. हर्क गुरुङ आयोग की रिपोर्ट के अनुसार १९७१ में मधेस की कुल  जनसङ्ख्याका ७.८% पहाडी पहाड हुआ है और सर्वेक्षण के समय में (१९८२ / ८३) मे बढकर ३१.६ दिखाई दे रहा है। मधेस के प्रमुख नदियां कोशी, कमला, गण्डक और काली नदी के किनार आज भी व्यापक संख्या में पहाडी बस्तियां बस रही है और जमीन  कब्जा कर रही है, उदाहरण के तौरपर कोशी नदी को ले लीजिये  ईस जेठ महिना भर में सैंकडों पहाडी बस्तियां सप्तरी कंचनरुप नगरपालिका और सप्तकोशी नगरपालिका अन्तर्गत कोशी टप्पु में आकर बस गया है और यह क्रम प्रतिदिन बढ रहा है किन्तु सरकार और प्रशासन उसपर रोक लगाने के वजाय उन्हे सुरक्षा देकर प्रोत्साहन कर रही है। मधेस के मौजुदा हालत को देखकर सहज अनुमान लगाया जा सकता है की अगर इस क्रियाकलाप को रोका नही गया तो यहाँ पर हिंसक घटनाओं के साथ गृह युद्ध की स्थिति पैदा होंगे। औपनिवेश और सरकारी षडयन्त्र के कारण मधेस में समुदायों के बीच द्वेष, संघर्ष, परिधिय क्षेत्र पर बाह्य समूहों का नियन्त्रण, गिरोह सशस्त्र समुह एवं तस्करी समेत आपराधिक हिंसा मे बढोत्तरी; विधायी एवं न्यायिक कामकाज में रुकावट; शिक्षा, स्वास्थ्य एवं अन्य सामाजिक सेवाको का अनौपचारिक निजीकरण; भ्रष्टाचार; वैधता की कमी; तस्करी में बढोत्तरी के साथ जुडी कम होती प्रति व्यक्ति आय (जीडीपी); एवं मधेस की स्रोत साधनों का दोहन कर पहाड में विकास करना और अनधिकृत कर के कारण आज मधेसी मानव की अस्तित्व संकट में है ।

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