मधेसी युवाओं का अतुलनीय बलिदान

डा. जयप्रकाश गुप्ता
पंचायत व्यवस्था के खिलाफ में हुए सभी छात्र आन्दोलनों में मधेसी समुदाय के छात्रों का योगदान अतुलनीय रहा है । वि.सं. २०२८ साल में पंचायत सरकार के द्वारा लागू की गई नई शिक्षा नीति के विरोध में देशव्यापी आन्दोलन हुआ । इस आन्दोलन का सर्वाधिक प्रभाव मधेस के जिलों में रहा । धनुषा जिला के यदुकहा में छात्र प्रदर्शन पर पुलिस ने निर्ममतापूर्वक गोलियां चलाई । वि.सं. २०२९ साल आश्विन १ गते पुलिस की गोली से १७ बर्षीय छात्र कामेश्वर मंडल का देहान्त हुआ । गोली प्रहार से ही सातवीं कक्षा के छात्र कन्नी गोइत और १५ बर्षीय कुशेश्वर मंडल भी उसी रोज शहीद हुए । इस गोली काण्ड में घायल ग्रामीण सवकत कवारी और नक्काराज नामक व्यक्ति की दूसरे रोज मृत्यु हुई । एक और आदमी भी मारा गया । वि.सं. २०३६ साल के विद्यार्थी आन्दोलन में जेष्ठ ६ गते महोत्तरी के करैया में छात्र नेता मिथिलेश दुबे और उसी रोज सर्लाही के हरिपूर्वा में ललन राय, अमृत शाह, शेख मियां, बुधन अंसारी, सूरत ठाकुर, इसरायल शेख, रामबाबू चौधरी तथा लालबन्दी में इगल बहादुर जर्घामगर ने शहादत्त प्राप्त की । इसी प्रकार ०३६ साल के छात्र आन्दोलन के दौरान ही बैशाख १० गते सिरहा के माडैर में जगदीश खत्वे, तसलिम मिया और रामेश्वर मंडल एक साथ ही पुलिस के गोली प्रहार से शहीद हुए । सिरहा के कर्जनहा में २०३६ साल के जेठ ३ गते विद्यार्थियों के प्रदर्शन पर पुलिस ने गोली चलाई । जिसमें छात्र नेता राम परीक्षण गडेरी शहीद हुए । दाङ में रतन बहादुर चौधरी शहीद हुए । इसी साल के आन्दोलन में धनुषा में मुगालाल महतो, मोहन राम महतो मारे गए ।
वि.सं. २०४२ साल में नेपाली कांग्रेस ने सत्याग्रह संचालन किया था । इसी दौरान रामराजा प्रसाद सिंह का जनवादी मोर्चा के द्वारा गणतन्त्र स्थापना की मांग के साथ राजधानी काठमाण्डू में कई जगह बम बिस्फोट करवाया गया । इस बम काण्ड के अनुसन्धान के नाम पर गिरङ्खतार हुए डा. लक्ष्मी नारायण झा, सत्यनारायण साह, ईश्वर लामा, पद्म लामा, साकेत चन्द्र मिश्र, हरि भुजेल और दिलीप चौधरी को गायब कर उनकी हत्या कर दी गयी । रामराजा प्रसाद सिंह के निर्देशन और नेतृत्व में हुए इस बम काण्ड के अभियोग में जनवादी मोर्चा के कई बिद्रोहीयों पर पंचायत सरकार ने गंभीर मुकदमा चलाया । इस में रामराजा प्रसाद सिंह को मृत्युदण्ड और उनकी सम्पत्ति का कुर्की, लक्ष्मण प्रसाद सिंह, प्रेम बहादुर विश्वकर्मा, बिश्वेस्वर मण्डल, पवन कुमार साह को मृत्युदण्ड का फैसला सुनाया गया । खेमराज मायालु, बिश्वनाथ चौधरी, शिव कुमार विश्वकर्मा, राजेन्द्र झा, मजिद मियां, किशोरी साह, हरिदेव चौधरी, ईश्वरी ठाकुर, इन्द्र बहादुर विश्वकर्मा और दाताराम बजगाई को २० बर्ष तक का जेल सजा दिया गया था । इस महान व्रmान्तिकारी कदम में भी अधिकांश मधेसी लोगों का ही सहभागिता रही थी ।
वि.सं. २०४५ से पंचायत व्यवस्था के खिलाफ सशक्त जन आन्दोलन शुरु हुआ । इसी साल पौष के २६ गते जनकपुर धाम में सत्यनारायण पाठक शहीद हुए । शिक्षक महादेव झा की मृत्यु हुई । वि.सं. २०४६ साल फाल्गुन ९ गते धनुषा के यदुकहा में हुए भीषण गोलीकाण्ड में जानकी देवी यादव, भुवनेश्वरी देवी यादव, सोनावती देवी यादव, उदय शंकर मण्डल और रामनारायण यादव शहीद हए । देश के इतिहास में महिला शहीद होने की यह पहली घटना थी । इस के वाद चैत्र २४ गते राम विलास ठाकुर शहीद हुए । अन्य कई वारदाताें में सप्तरी के बिहारी चौधरी और सुरेश कुमार गुप्ता, रौतहट के मुकुट ओझा, बारा के वैद्यनाथ गुप्ता और दीपक गुप्ता (जिनकी रक्सौल में हत्या की गयी) शहीद हुए ।
नेपाल के कम्युनिष्ट आन्दोलन में मधेसी योगदान
पंचायत व्यवस्था के विरुद्ध हुए संघर्ष में नेपाल के कम्युनिष्ट आन्दोलन का भी अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान रहा है । कुछेक अपवादों के अलावा अनेक समूहों में विभक्त कम्युनिष्ट नेता और कार्यकत्र्ताओं ने लम्बा संघर्ष किया है । नेपाल के कम्युनिष्ट आन्दोलन को व्यवस्थित करने के लिए भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी की तरफ से अयोध्या प्रसाद सिंह को नेपाल भेजा गया था । भारतीय नागरिक होने बावजूद वे वि.सं. २००८ साल तक नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी के पोलिटब्यूरो सदस्य थे । इस दौर के मधेसी नेताओं में सप्तरी के सैयद कमर शाह जो वि.सं. २०१० के पहले महाधिवेशन से नेकपा के केन्द्रीय सदस्य चुने गए थे । रौतहट के शेख फरमान जो वि.सं. २०१५ साल के आम निर्वाचन में कम्युनिष्ट पार्टी के तरफ से विजयी होने वाले कुल ४ व्यक्तियों में से एक थे । इन चार लोगों में दो मधेस से विजयी हुए थे । सिरहा के भोगेन्द्र ठाकुर एक व्रmान्तिकारी कम्युनिष्ट नेता थे । वे वि.सं. २०२८ साल से ही नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी के केन्द्रीय सदस्य चुने गए थे । उदयपुर जिला के लक्ष्मी नारायण चौधरी, सुनसरी के प्रभु नारायण चौधरी, सप्तरी के हिरालाल चौधरी, भदेस्वर प्रसाद साह, सत्यनारायण मंडल और जयकृष्ण गोइत, धनुषा के जोगिन्द्र साह काका, गणेश साह, महोत्तरी के जीवेन्द्र नाथ झा, महाविर प्रसाद सिंह और सीतानन्दन राय, सर्लाही (छतौना) के सुरेन्द्र सिंह, बारा के सोहन लाल चौधरी और गोपाल ठाकुर ऐसे अनेकों मधेसी व्यक्तियों ने नेपाल में कम्युनिष्ट आन्दोलन को सींचा है । अनेकों लोगों ने कम्युनिष्ट आन्दोलन के नाम पर शहादत दिया है । असंख्य लोगों ने जेल में कठोर जीवन को भोगा है ।
सिरहा के बडहरा माल में जन्मे बहादुर सदा मुसहर समुदाय के होते भी उन की राजनीतिक चेतना के कारण वि.सं. २०११ साल में सेना के द्वारा मारे गए ।रौतहट जिला कम्युनिष्ट व्रिmयाकलाप का एक मुख्य केन्द्र रहा था । रौतहट के हरिहर यादव लगायत दुखीलाल चौधरी, छवील चौधरी, हरदयाल महतो, अमीन दर्जी आदि नेताओं का नाम उल्लेख्य है । कम्युनिष्ट आन्दोलन के व्रmम में ही वि.सं. २०३२ साल में रामाधीन महतो, मज्जुलद अहमद, हरिकृष्ण चौधरी, विरजू चौधरी और भेटला राजवंशी मारे गए । पंचायत व्यवस्था के शुरुवाती दौर में ही रूपन्देही जिला के मर्चवार में तत्कालिन मधेस मोर्चा के नेता रघुनाथ राय तथा कपिलवस्तु में रामजी मिश्र गोली के शिकार बनाये गये । सप्तरी के कम्युनिष्ट नेता जयकृष्ण गोइत और सत्यनारायण मण्डल लम्बे समय तक जेल में रहे हैं । भारत के पश्चिम बंगाल से शुरु हुए नक्सलवादी आन्दोलन का प्रभाव भी पूर्वी नेपाल के झापा, मोरङ जैसे जिलों में पडा । नक्सलवादी सोच वाले झापा संघर्ष के दौरान वि.सं. २०२९ साल में झापा के ही वीरेन राजवंशी, वि.सं. २०३३ साल में सिरहा के रामप्रीत यादव और मोरङ के वलेश्वर राय, वि.सं. २०३६ साल में धनुषा के झप्सी मण्डल और २०४६ साल में झापा के छविलाल राजवंशी प्रहरी के द्वारा मारे गए । वि.सं. २०४२ साल आश्विन ४ गते व्रmान्तिकारी कम्युनिस्ट नेता सूर्यनाथ यादव की सरकार ने कायरतापूर्वक हत्या की । व्रmान्तिकारी कम्युनिस्ट नेता जय गोविन्द शाह ने जेल में और बाहर रहकर आजीवन संघर्ष किया । वे करीब छः साल तक जेल में रहे थे । सिरहा जिला से एमाले पार्टी के संसद सदस्य रहे हेमनारायण यादव का वि.सं. २०६० साल माघ १९ गते सेना के ब्यारेक में हत्या कर दी गयी ।
मूलधार की मधेसी राजनीति
तराई कांग्रेस की स्थापना नेपाल की राजनीति में एक दूरगामी महत्व की घटना थी । सन् १९४७ में भारत की स्वाधीनता और सन् १९५० (वि.स. २००७) में नेपाल में राणा विरोधी जनव्रmान्ति की सफलता के दूसरे बर्ष ही २००८ साल में तराई कांग्रेस की स्थापना हुई थी । सब से महत्वपूर्ण बात तो यह है कि जिस वक्त नेपाल के लोग अच्छी तरह से प्रजातन्त्र का अर्थ भी नही समझ पाए थे उस वक्त तराई कांग्रेस के संस्थापकों ने नेपाल में मधेसियों के साथ हो रहे विभेद का अन्त, प्रादेशिक संचना की मांग, भाषाई अधिकार के सवालों को जोरदार ढंग से उठाया था । सिरहा जिला निवासी बलदेव दास यादव और कुलानन्द झा की सव्रिmयता में इस पार्टी का जन्म हुआ था । सिरहा के सीमावर्ती जयनगर क्षेत्र में रुद्र प्रसाद गिरी, देवनाथ दास यादव, बलदेव दास यादव, कुलानन्द झा आदि नेपाल के राणा विरोधी और नेपाली कांग्रेस से सम्बन्धित व्यक्ति के रूप में कार्यरत् थे । वे सभी बहुत बडेÞ व्रmान्तिकारी थे और साथ साथ भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में भी शरीक हुए थे । परन्तु कुलानन्द झा और बलदेव दास यादव की चेतना भिन्न प्रकार की थी । कुलानन्द झा राजनीति के प्रारम्भ से ही मधेसियों के प्रति हो रहे विभेद से वाकिफ थे । उन का परिचय वी.पी. कोइराला से था । उन्हाेंने २००७ के व्रmान्ति के पश्चात ही मधेसियों के प्रति हो रहे विभेद को हटाने के लिए व्रmान्ति नायक वि.पी. कोइराला से संवाद किया । वि.पी. ने इसे साम्प्रदायिक सोच कह कर दुत्कार दिया । इस से कुलानन्द झा दुःखित हुए । उनके इसी विद्रोही तेवर के कारण २००७ साल में जब वी.पी. कोइराला राणा–कांग्रेस अन्तरिम सरकार के गृहमंत्री थे, कुलानन्द झा को गिरङ्खतार किया गया था । वि.सं. २००८ साल में सिरहा के कल्याणपुर जब्दी स्थित महादेव मन्दिर की धर्मशाला में मधेसियों की एक सभा बुलाई गई थी । इस सभा की अध्यक्षता बलदेव दास यादव ने किया था । यहीं कुलानन्द झा की अध्यक्षता में तराई कांग्रेस का गठन हुआ । जनकपुर में इसकी घोषणा की गयी । तराई कांग्रेस के गठन के कुछ दिनों बाद ही कुलानन्द झा ने अपने सहोदर भाई वेदानन्द झा को पार्टी का अध्यक्ष बनाया । वेदानन्द पटना में पत्रकारिता करते थे ।
वि.सं. २०१५ साल के पहले आम निर्वाचन में इस पार्टी ने संसद के कूल १०९ स्थान में से तराई के २१ स्थानों पर उम्मेदवार खडा किया था, परन्तु पार्टी को एक भी स्थान प्राप्त नही हो सका । राजा महेन्द्र के द्वारा संसदीय व्यवस्था को भंग किए जाने के वाद तराई कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष वेदानन्द झा भी गिरङ्खतार हुए थे । वे संघर्ष में टिक न सके और अपनी व्यक्तिगत स्वार्थपूर्ति के लिए राजा के कदम को समर्थन किया । बाद में वे पंचायती व्यवस्था के तहत एक शक्तिशाली मंत्री बने । तराई कांग्रेस के कई प्रभावशाली नेतागण वेदानन्द झा के इस आत्मसमर्पण से सहमत नही थे । उस समय के माहौल में रामजनम तिवारी आदि नेताओं ने मूल्यांकन किया कि पहले देश में लोकतन्त्र की स्थापना हो, फिर हम तराई के अधिकारों के लिए लडेंगे । इस सोच के साथ तराई कांग्रेस के तत्कालिन महासचिव रामजनम तिवारी ने रक्सौल में सम्मेलन करके पहला कदम–प्रजातंत्र पुनस्र्थापना के नाम पर सुवर्ण शमसेर के सहयोग में तराई कांग्रेस को नेपाली कांग्रेस में विलय कर दिया ।
मधेस–तराई की मुक्ति का सवाल
तराई कांग्रेस का नेपाली कांग्रेस में विलय के वाद तराई के नाम पर संगठित रूप से कोई राजनीतिक गतिविधि नही रहा । पश्चिम तराई के वामपंथी विचारधारा से प्रभावित कुछ व्यक्तियों व्दारा तराई मुक्ति मोर्चा का गठन कर छिटफुट रूप में कुछ कार्यवाही करने का उल्लेख मिलता हैं । इससे सम्बन्धित रहे व्यक्ति तराई कांग्रेस से भी जुडे थे । इस संगठन ने पश्चिमी तराई के क्षेत्रों में छापामार युद्ध संचालित करने का निर्णय किया था । वि.सं. २०२० साल आषाढ के पहले सप्ताह में नेपाल सरकार के सैनिकों द्वारा मोर्चा के नेता रामजी मिश्र की हत्या कर दी गई । इसी तरह तराई मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष रघुनाथ राय की भी शाही नेपाली सेना के द्वारा हत्या कर दी गयी । इनकी हत्या रूपन्देही जिला के सीमावर्ती भारतीय शहर नौतनवा से अपहरण करके नेपाली सीमा के भीतर लाकर हत्या कर दी गयी । इसी तरह से सत्यदेव मणि त्रिपाठी की भी हत्या हुई ।
राजा महेन्द्र के द्वारा सैनिक बल पर शासन किए जाने बावजूद भी सुनसरी के रघुनाथ ठाकुर ने मधेस मुक्ति आन्दोलन को आगे बढाया । रघुनाथ ठाकुर नेपाल में मधेसियों के प्रति हो रहे भेदभाव और राजनीतिक शोषण के विरूद्ध शांतिपूर्ण आन्दोलन के पक्षधर थे । वि.सं. २०१५ साल में ही रघुनाथ ठाकुर ने “परतंत्र मधेस और उसकी संस्कृति” और वि.सं. २०१६ साल में “मधेस आन्दोलन के प्रस्ताव और उनकी व्याख्या” नामक पुस्तक प्रकाशित की । वे एक सिद्धहस्त लेखक थे । उन्होंने विराटनगर से हिन्दी में “राजहंस साप्ताहिक” और “मधेसी आवाज” नामक पत्रिका निकालनी शुरू की । वास्तव में रघुनाथ ठाकुर ने ही सर्वप्रथम स्पष्ट व्याख्या के साथ मधेस की मुक्ति के सवाल को उठाया । उन्होंने मधेस एवं मधेसी के विकाश के लिए मधेसी राष्ट्रीय पुलिस, फौज, कार्यपालिका, विधायिका, स्वतंत्र न्यायपालिका तथा लोक सेवा आयोग आदि की परिकल्पना कर इस की स्थापना के लिए आन्दोलन पर जोड दिया । उन्होंने मधेसी व्रmान्ति को आगे बढाने के लिए “मधेस जन व्रmान्तिकारी दल” नामक संगठन को जन्म दिया था । परन्तु दुर्भाग्यवश वि.सं. २०३८ साल जेठ माह में सन्देहास्पद अवस्था में वे मृत पाए गए । उन की मृत्यु भी सप्तरी और सिरहा जिला के सीमावर्ती एक भारतीय कस्बे में हुई । उन के परिजनों के अनुसार नेपाल सरकार के षडयन्त्र के तहत उनको भोजन में बिष मिलाकर हत्या कर दिया गया । रघुनाथ ठाकुर का देहावसान मधेस आन्दोलन की सबसे बडी क्षति थी । व्

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