मधेस आन्दोलन और विकल्प खोजती सरकार

मधेस का यह आन्दोलन संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेसी मोर्चा के आह्वान से प्रारम्भ हुआ था । परन्तु आज यह किसी दल या दलपति के भरोसे नहीं हो रहा है । दो दिनों के मधेस बन्द आह्वान के साथ शुरु यह आन्दोलन सप्तरी जिला के भारदह में एक युवा की पुलिस फायरिंग में मारे जाने के कारण उग्र हुआ है । सड़क पर जनसागर का सैलाब उमड़ रहा है । लोग इस बार के आन्दोलन को अन्तिम और निर्णायक बनाना चाहते हैं ।
देवेश झा:मधेस आन्दोलन अपना तीसरा महीना पूरा करने जा रहा है । परन्तु सरकार के कानों पर अभी तक जूँ भी रेंगता हुआ नहीं दिखता । अब तो सरकार का नेतृत्व भी परिवर्तन हो चुका है । नेपाली काँग्रेस के नेता सुशील कोईराला की जगह एमाले के अध्यक्ष के.पी.ओली देश के नये प्रधानमन्त्री बन चुके हैं । वैसे तो इस पद पर आने से पूर्व ही श्री ओली अपनी कटुक्तियों के कारण मधेस में विवादित हो चुके थे फिर भी एक जिम्मेवार पद पर आने के बाद उनसे उम्मीद की गई थी कि शायद उनकी सोच में बदलाव आ गया होगा । परन्तु उनकी कार्य प्रणाली से स्पष्ट होता जा रहा है कि उनके अडि़यल रवैये में कोई खास तब्दीली नही आई है । मधेसी मोर्चा के साथ वार्ता करने हेतु जिस समिति को जिम्मेवारी सौंपी गई है, उसका नेतृत्व रा.प्र.पा(नेपाल) के अध्यक्ष एवं विदेश मन्त्री कमलथापा कर रहे हैं । यह दल औपचारिक रुप से संघीयता विरोधी है । ऐसे में कमल थापा औपचारिकता का निर्वाह नहीं करेंगे । कई दौर की बेमतलब वार्ता से इसकी पुष्टि भी हो रही है । दरअसल सरकार समय बिताने के फिराक में है । सत्ता में बैठे लोग चीन से पेट्रोलियम की आपूर्ति की सुनिश्चितता कर लेना चाहते हैं । मधेसी मोर्चा के साथ का लेन–देन भी उसी अनुकूल किया जाएगा ।
मधेस का यह आन्दोलन संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेसी मोर्चा के आह्वान से प्रारम्भ हुआ था । परन्तु आज यह किसी दल या दलपति के भरोसे नहीं हो रहा है । दो दिनों के मधेस बन्द आह्वान के साथ शुरु यह आन्दोलन सप्तरी जिला के भारदह में एक युवा की पुलिस फायरिंग में मारे जाने के कारण उग्र हुआ है । सड़क पर जनसागर का सैलाब उमड़ रहा है । लोग इस बार के आन्दोलन को अन्तिम और निर्णायक बनाना चाहते हैं । एक जुनून सा सवार है उनके दिलोदिमाग पर । लोगों को लगता है कि आखिÞर कब तक ? पुश्तों से दबे हुए लोग नहीं चाहते कि उनके बच्चे भी उसी अपमानपूर्ण जीवन को जीने के लिये अभिशप्त हों । लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण ही माना जाएगा कि ४५ से अधिक मधेसियों की शहादत के बावजूद सरकार ने आँखों पर पट्टी बाँध रखी है और कानों में तैल डाल रखा है । बजाय अपनी ही मधेसी जनता के माँगों की सुनवाई करने के काठमाण्डू में बैठे शासकों ने मधेस आन्दोलन का विकल्प खोजने में अधिक ध्यान दिया है । जब पहला मधेस आन्दोलन हुआ था तो मधेसी जनता का प्रदर्शन देश के प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्ग (महेन्द्र राजमार्ग) पर केन्द्रित था । सरकार ने मधेस की माँगों पर बाध्यतावश सहमति तो जताई पर अपना ध्यान इस राष्ट्रीय राजमार्ग का विकल्प ढूँढने में लगाया । जिसके परिणामस्वरुप मध्य पहाड़ी लोकमार्ग का निर्माण किया गया ।उसीप्रकार से अभी का आन्दोलन भारत के साथ जुड़े सीमा नाका को ठप्प करने में केन्द्रित हुआ तो सरकार उसका विकल्प खोजने में लगी हुई है । स्रुपष्ट हैरु कि ररुाज्य की रुचि अपने देशवासी की समस्रुरुयाओं का समाधान कररुने में नहीं हैरुरु।
पष्ट है कि राज्य की रुचि अपने देशवासी की समस्याओं का समाधान करने में नहीं है ।
मधेस का यह आन्दोलन दरअसल अपनी पहचान की खोज है । हजारों वर्षों से इस भूभाग में रहने वाले लोगों को ही २५० वर्षों से अधिपत्य जमाए बैठा हुआ शासकवर्ग विदेशी मानता है । राज्य के विभिन्न अंगों में इस भूभाग में बसने वालों का प्रतिनिधित्व न्यून है । सरकारी नौकरियों में मधेसी समुदायको सिर्फ ३.५∞ हिस्सेदारी प्राप्त है । सेना को छोड़कर बाँकी सुरक्षा निकायों में इस समुदाय की उपस्थिति १∞ के बराबर है तो सेना में १∞ से भी कम लोगों को ही अवसर दिया गया है । न्यायालयों में तो इक्के दुक्के ही कोई दिख सकता है मधेस का ।
पहले मधेस आन्दोलन में तत्कालीन सरकार और मधेसी नेताओं के बीच एक सहमति हुई थी । जिसके तहत यह माना गया था कि नेपाल के दक्षिणी भाग के बीस जिलों को मधेस माना जाएगा । साथ ही वहाँ के मूलनिवासियों को निश्चित मात्रा में सरकारी नौकरियों पर आरक्षण का लाभ दिया जाएगा । देश में संघीय शासन प्रणाली लागू किया जायगा और संसदीय क्षेत्र जनसंख्या के आधार पर तय किये जाऐंगे । यह व्यवस्रुथा अन्तरिरुम संविधान मेंरु सुनिश्चित किया गया थारु। पहली संविधान सभा के असफल होने पररु दूसररुी बाररु फिररु से चुनाव कररुाया गयारु। जिसमें भाग लेते हुए नेपाली काँग्रेस, एमाले औरुररु माओवादी पार्टी के नेताओं ने मधेस की जनता को आश्वासन दिया था कि उनके सम्झौरुतों को लागू किया जायगारु। पररुन्तु सत्ता में आने के बाद गिररुगिट की तररुह ररुंग बदलते हुए इन बडथा अन्तरिम संविधान में सुनिश्चित किया गया था । पहली संविधान सभा के असफल होने पर दूसरी बार फिर से चुनाव कराया गया । जिसमें भाग लेते हुए नेपाली काँग्रेस, एमाले और माओवादी पार्टी के नेताओं ने मधेस की जनता को आश्वासन दिया था कि उनके सम्झौतों को लागू किया जायगा । परन्तु सत्ता में आने के बाद गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए इन बड़े दलों के नेतागण अपने वचनों से मुकर गये । कहा तो यहाँ तक जा रहा है कि इनदलों के नेताओं ने अपने दल के सभासदों को संविधान पारित कराते वक्त वचन दिया था कि बाद में संविधान संशोधन करके आवश्यक माँगों को सम्बोधित किया जाएगा । जिस कारण से इन बड़े दलों में बैठे हुए मधेसी सभासद आज अपने ही निर्वाचन क्षेत्र में स्वयं को असुरक्षित देख रहे हैं ।
आन्दोलन के शुरुवाती ४५ दिनों तक राज्य की अनदेखी से आजिज मधेसी जनता ने अब उग्र रुप धारण कर लिया है । लोग नाका पर धरने में बैठे हैं । यह अब नेपाल में सामाजिक सद्भाव के लिये भी प्रश्न खड़ा करने लगा है । मधेस द्वारा देश में संघीय राज्यव्यवस्था को स्थापित कराने से जिन समुदायों को लाभ मिला है वे भी इस नाकाबन्दी के कारण विपक्ष में खड़े हो गये हैं । उपर से मधेस के कुछ नेताओं के द्वारा उत्तेजक एवं हल्की टिप्पणियों ने भी माहौल को दूषित किया है । मधेसी और पहाड़ी समुदाय के बीच एक प्रकार का मनोवैज्ञानिक विभाजन की स्थिति बन गई है । मौके की तलाश में बैठा हुआ पड़ोसी चीन इस अवसर का पूरा लाभ उठाना चाहता है । नाकाबन्दी के घाव पर सस्ते मलहमों का इस्तेमाल करके वह पहाड़ी जनता के दिलों में अपनी छवि बनाना चाहता है । इधर सरकार और प्रमुखदलों के बड़े नेतागण मधेस की माँगों से अनभिज्ञता का नाटक कर रहे हैं । मधेस के नेता अपनी अस्पष्ट मार्गचित्र के कारण आम जनता का विश्वास खोते जा रहे हैं । ऐसे में आवश्यक है कि मधेस अपने लक्ष्य की फिर से समीक्षा करे । नये मार्गचित्र तय किये जाऐं, ताकि बढ़ती हुए हताशा के कारण आन्दोलन भ्रमित न हो जाय ।

Loading...