मधेस का शरण ढूंढते बाबुराम भट्टराई : मुकेश झा

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डा. मुकेश झा ,जनकपुर ,१७ नवम्बर | माओवादी जनयुद्ध के सफल नायक आज बेहताशा अपने अस्तित्व बचाने के लिए इधर उधर भटक रहा है। यह भटकन उसकी खुद की ही देन है। जो व्यक्ति राष्ट्र और जनता को भ्रमित करने के लिए ही सारा तिकड़म करता रहे उसे कहीं भी जगह नही मिलता।नेता भले ही सत्ता और स्वार्थ के लोभ में सोये रहने का नाटक करता रहे लेकिन जनता अब जाग गई है और एक एक राजनेता की असलियत को पहचान चुकी है। किसी भी नेता को यह भ्रम नही होना चाहिए की वह जनता को भूलभुलैया में डाल सकती है।
जनता अब वैसे नेतृत्व को बहुत जल्द दरकिनार करने वाली है जो सिर्फ सत्ता पर जाने के जोड़तोड़ में में लगे रहते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री, संविधान सभा के अध्यक्ष, बाबुराम भट्टराइ जी ने मधेस के साथ जो गद्दारी किया है इसका कोई हिसाब ही नही। मधेसी जनता यह कभी नही भूल सकती जब पहली संविधान सभा चुनाव में मधेसवादी दलों को अच्छी खासी सीट मिली और नेपाल का चौथा प्रमुख पार्टी बनकर उभरा तो सारे “खसवादि” पार्टी की अस्तित्व को खतरा महशुस हुवा। इसी को नजर में रखकर प्रथम संविधान सभा ने नेपाल को संविधान नही दिया क्योंकि उस समय मधेसी को अंतरिम संविधान के अनुसार सारा अधिकार देना ही पड़ता, किसी भी अधिकार से बंचित नही किया जा सकता था। अतः बड़ी चालाकी से तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ बाबुराम भट्टराई द्वारा उस संविधान सभा को ख़ारिज कर पुनः दुबारा निर्वाचन की घोषणा कर दी गई। जब नया संविधान का आधार अंतरिम संविधान के अनुसार तैयार ही था तो उसको लागू करने में ज्यादा दिक्कत क्यों आई? वह इसीलिए की उसमे मधेसी को अधिकार मिल रहा था और वह सत्ताधारी माओबादी लगायत अन्य किसी को भी रास नहीं आ रहा था। भट्टराई जी का दूसरा नाटक तब शुरू हुवा जब २०७२ असोज ३ को जारी कर दिया गया।उस संविधान को करीब आधी से ज्यादा जनता ने वहिष्कार किया और भट्टराई जी चूँकि उस सभा के अध्यक्ष थे तो उनपर सवाल उठने लगा तो उन्होने जारी दिनांक से एक हप्ते के अंदर माओवादी पार्टी से स्तीफा दिया और “नया शक्ति” नामक अभियानी गुट बना कर खुद के द्वारा घोषित संविधान का विरोध कर जनता को बेवकूफ बनाने में लग गए। जनता उनकी “पीएचडी” की इज्जत करती है बस इसी कारण उनकी बेवकूफ बनाने को मान नही रही है। नहीं तो भला दुनिया में कौन ऐसा नेता होगा जिसे एक हप्ते पहले तक संविधान सबसे बढ़िया लगा हो और घोषणा होने के एक हप्ता के अंदर खुद का बनाया हुवा संविधान त्रुटि पूर्ण लगा है। अगर वास्तव में ऐसा त्रुटि पूर्ण था तो उन्होंने वैसे संविधान को घोषणा करवाकर देश के बिरुद्ध बहुत बड़ी गद्दारी की और अगर सही था तो खुद उसका विरोध क्यों करने लगे? जिस नेता को अपने किसी भी निर्णय के असर अगले एक हप्ते में क्या होने वाला है उसका ज्ञान नही है वैसा नेता को राजनीति करने का कोई हक नही। भट्टराई जी के संविधान को अपूर्ण कहते ही नेपालक “खस” गुट नाराज हो गए, क्यों की उनको यही रटाया गया की यह संविधान 95% संसद के सहमति से पारित किया गया, तो भट्टराई जी पायजामा, कुर्ता और काँध पर गमछा रख कर जनकपुर भ्रमण पर आये।
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लेकिन मधेसी जनता उनकी असलियत से वाकिफ हो चुकी थी एवम् उनके स्वागत में कोई कसर बाँकी नही रखी। उसके कुछ समय बाद भट्टराई जी बिराटनगर गए वहां भी उनका सुनने वाला कोई नही मिला और ऐसे मधेस से “गद्दारी” करने वाले का सुने भी कौन। अब फिर भट्टराई जी एक नए नाटक रचने की तैयारी में हैं और संघीय समाजवादी फोरम, नेपाल के साथ नया शक्ति को जोड़कर सत्ता की गलियारी में घुसने का प्रयास कर रहे हैं। यह शायद स स फ़ो के लिए बहुत बड़ा घातक एवम् आत्महत्या करने वाली निर्णय होगी अगर वह इनको अपने साथ जोड़ती है। क्योकि अभी मधेसी और जनजाति की जो भी अवस्था है वह भट्टराई जी के कारण ही है इसमें कोई दो मत नही है। कहा जाता है सब को भूल सुधार का मौका मिलना चाहिए, क्या भट्टराई जी का पहला संविधान सभा को विघटन करना, गलत संबिधान को जारी करवाना जैसा भयंकर भूल भी माफ़ करने लायक है? उस पर से उनके इस हिम्मत और चालाकी की दाद देनी होगी की जिस मधेसी और मधेसी और जनजाति को उन्होंने बर्बाद किया अब उन्ही के रहनुमा बनने का नाटक कर अपना स्वार्थ पूरा करने में लगे हैं। हाँ , अगर संविधान घोषणा से पूर्व अगर यह संविधान सभा छोड़ कर मधेसी के समर्थन में आते तो मधेसी जनता इनको पलक पर बिठा कर रखती लेकिन उस समय तो किसी “अदृश्य” दवाब के कारण या मधेसी जनजाति जनता को भेड़ा समझकर संविधान घोषणा करवा दी और उसके बाद “ड्रामा” करने लगे। उनका यह कार्य “अब पश्ताए क्या होत, जब चिड़िया चुग गई खेत” उक्ति को चरितार्थ करती है। अगर स स फ़ो वास्तव में मधेसी और जनजाति के अधिकार के लिए संघर्षरत है तो वह मधेसी जनजाति का सबका बड़ा अहित करने वालों के साथ कभी कोई सहमती और सहकार्य नही करेगा।
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