मनचलों की जीभ, लपलपाने लगी है …गंगेश मिश्र

मनचलों की जीभ, लपलपाने लगी है … गंगेश मिश्र
लालच की खेती,
लहलहाने लगी है।
सुखानुभूतिक चिड़िया,
चहचहाने लगी है।
चतुर कौओं की चतुराई,
देती है दिखाई;
मनचलों की जीभ,
लपलपाने लगी है।
हर बार यही होता,
हर बार दग़ा देते,
फ़िर रात वही काली,
गहराने लगी है।
अवसर मिला बहुत है,
मिलता ही जा रहा है;
फ़िर से हवा सुहानी,
सरसराने लगी है।
हैं क़ौम के ये, दुश्मन,
झूठे हैं, फ़रेबी हैं,
मक़्कारी जो, लहू में;
नज़र आने लगी है।
बनते हैं, ये मधेशी;
लगते हैं, ये मवेशी;
देख-देखके इनको, कुर्सी;
घबराने लगी है।

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