मनमोहन से कहीं ज्‍यादा सब्सिडी देते हैं ओबामा, फिर भी खुशहाल है अमेरिका

नई दिल्‍ली. बजट से पहले और बाद में सब्सिडी की खूब बात होती है। इस बार कुछ ज्यादा ही हो रही है, क्योंकि इसे जीडीपी के दो प्रतिशत फिक्स कर दिया गया है। सोशलिस्ट व्यवस्था के तहत हम मानकर चलते हैं कि सबसे ज्यादा सब्सिडी हम ही देते होंगे। जबकि यह मिथक है। इसके विपरीत अमेरिका में सब्सिडी पता नहीं चलती क्योंकि बजट में उसका जिक्र नहीं होता। यह फार्म बिल के रूप में पांच साल में एक बार पेश होती है। इसे देखें ताकि इन तथ्यों को बातचीत में इस्तेमाल कर सकें…

फर्टिलाइजर पर 61 हजार करोड़ रु की सब्सिडी दी जाएगी। इस बार बजट में 12 करोड़ किसानों को सीधे सब्सिडी देने का वादा किया गया है। फूड पर 75 हजार करोड़ और पेट्रोलियम पर 43 हजार करोड़ रुपए की सब्सिडी देंगे।

अमेरिका में 1500 हजार करोड़ रुपए का फार्म सब्सिडी बिल 2008 लागू है। 55 हजार करोड़ तो किसानों को खेती करने के लिए नगद सब्सिडी के रूप में बांटे जाते हैं। यह पैसा जनता से उगाहे टैक्स से सीधे किसानों तक पहुंचता है। इसी साल अमेरिका ने जनता को 51 लाख करोड़ रुपए का टैक्स ब्रेक दिया है।

आबादी और जमीन

121 करोड़ भारत की आबादी। आधी आबादी खेती पर निर्भर। जमीन सिर्फ 32 लाख वर्ग किलोमीटर।

31 करोड़ अमेरिका की आबादी। 2-3 प्रतिशत ही खेती पर निर्भर। जमीन 98 लाख वर्ग किलोमीटर।

गरीब 20 गुना ज्‍यादा, खर्च 3 गुना कम
70 करोड़ भारत में गरीब। लेकिन सामाजिक क्षेत्र पर जीडीपी का सिर्फ 6.8 प्रतिशत होता है खर्च।
4 करोड़ अमेरिका में गरीब। वहां सामाजिक क्षेत्र पर जीडीपी का 20 प्रतिशत खर्च होता है।

7 गुना छोटी है हमारी अर्थव्‍यवस्‍था

101 लाख करोड़ रुपए भारत का सकल घरेलू उत्पाद। खजाने पर भार 5.5 प्रतिशत।
750 लाख करोड़ है अमेरिका का जीडीपी। खजाने पर भार 8.7 प्रतिशत।

फिर हंगामा क्‍यों?
पिछले साल सब्सिडी बिल बढ़कर ढाई लाख करोड़ रुपए के पार पहुंच गया तो हंगामा खड़ा हो गया। महंगाई बढऩे और विकास दर गिरने तक के लिए इसे जिम्मेदार मान लिया गया। सब्सिडी दो लाख करोड़ रुपए फिक्स करने के पीछे सरकार का अपना तर्क है। वह खजाने पर सब्सिडी के बढ़ते बोझ को कम कर इकोनॉमी मजबूत करना चाहती है। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि सब्सिडी घटाने से महंगाई और बढ़ेगी। सुविधाएं आम आदमी से और दूर हो जाएंगी। अमेरिका में देखें तो तमाम आर्थिक संकटों के बावजूद सब्सिडी जारी है। मंदी में तो घोटाला करने वाली प्राइवेट कंपनियों को भी आर्थिक मदद दी गई। ऐसे में भारत जैसे सोशलिस्ट देश में सब्सिडी घटाने को क्या जायज ठहराया जा सकता है?

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