मनुष्य जीवन की राह

रवीन्द्र झा शंकर’:शास्त्रों में मनुष्य-शरीर परमात्मा की र्सवश्रेष्ठ कृति कही गई है । परन्तु अनेक मनुष्य इस अमूल्य मानव शरीर को प्राप्त कर भी इस का दुरूपयोग असत् कार्यों में करते देखे जाते हैं । ऐेसे ही लोगों के लिए ‘धरती का भार होने’ की संज्ञा दी जाती है । पेडÞ-पौधे जंगल में भी होते हैं और उपवन में भी, र्फक यही होता है कि एक श्रेष्ठ माली उपवन के पौधे को एक सुन्दर स्वरूप देता है और जंगल में वे झाडÞ-झंखाडÞ के रूप में बढÞते रहते हंै । इसी प्रकार मानव जीवन की भी बात है । शास्त्र प्रतिपादित श्रेष्ठ चिन्तन रूपी माली एक श्रेष्ठ जीवन का निर्माण करता है । इसके विपरीत जीवन तो अधोगति कराने वाला ही होता है । हम सबका जीवन श्रेष्ठ मानव जीवन बन सके, इसी उद्देश्य से यहाँ जीवन निर्माण की कतिपय बाते प्रस्तुत हैं-
१. सोच सकारात्मक हो- कमरे में अँधेरा हो तो अँधेरा लाठी से भगाने से नहीं भागेगा, न ही अँधेरा भाग जाओ, अँधेरा भाग जाओ चिल्लाने से अंधेरा दूर हो जाएगा । कमरे में लगे बिजली के स्वीच को आँन कर देने से अँधेरा दूर हो जाता है । इसीलिए कहा जाता है कि अन्धकार का कोई अस्तित्व नहीं होता । प्रकाश का अभाव ही अन्धकार है । प्रकाश करने से ही अज्ञान के अँधेरे से बाहर निकला जा सकता है । अन्धकार को धिक्कारने से नहीं बरन एक दीप जलाने से अँधेरा दूर होगा ।
२. आध्यात्मिक बनें- जीवन में पीछे की ओर चलने से नहीं, बल्कि आगे की ओर बढÞने से मञ्जिल प्राप्त होती है । बात तब बनती है, जब दिल में इरादे अटल होते हंै । उत्साह तथा उल्लास को सदा प्रयत्नपर्ूवक बढÞाते रहना चाहिए । रोजाना पर्ूव से उगता सूरज यह सन्देश लेकर आता है कि हमें हर घडÞी प्रभु का कार्य अर्थात् कल्याण करना है । आत्मा की पुकार है, हर पल परमात्मा के साथ रहे । हमें बाँसुरी की तरह पोला बनना है- अपने जीवन से अहंकार को हटाना है । तभी हमारे अन्दर से हमारे कार्य से प्रभु की इच्छा से भरा मधुर सुर प्रस्फुटित होगा और हमारा जीवन संगीत बन जाएगा । जिस प्रकार एक बच्चा अपने माँ-बाप को एक पल के लिए भी नहीं छोडÞना चाहता है, ठीक उसी तरह हमारा भी अपने आत्म्ाा के माता-पिता -परमात्मा) से भी ऐसा ही प्यार होना चाहिए ।
३. परमात्मा की लोक-कल्याण की इच्छा को अपनी इच्छा बनाएं- हमें आत्मा की आवाज को सुनकर अनसुनी नहीं करना चाहिए । जिन्दगी हर पल हमारी परीक्षा लेती है । हम किस मिट्टी के बने हैं, इसकी कसौटी हर पल हमारे सामने होती है । परमात्मा ने सब को विशिष्ट बनाया है । हम सभी परमात्मा की सन्तान हैं । सभी उसके पुत्र हैं, अतः उनकी प्रसन्नता के लिए प्राणी मात्र के हित के लिए कार्य करना चाहिए ।
४. जीवन के प्रत्येक क्षण को मनोयोगपर्ूवक जीने का प्रयत्न करना चाहिए- जीवन में कौन-सा पल अन्तिम होगा- यह कोई नहीं जानता । जिस व्यक्ति के पल संभल गए, उसके मिनट संभल गए, जिस के मिनट संभल गए, उसके घंटे संभल गए, जिस के घंटे संभल गए, उसके दिन संभल गए, उस के महीने संभल गए, जिसके महीने संभल गए, उसके वर्षसंभल गए और जिसके वर्षसंभल गए, उसका जीवन संभल गया । इसीलिए आवश्यक है कि जीवन के हरपल को अपना कर्तव्य करते हुर्एर् इमानदारी से जिया जाए ।
५. जीवन का उद्देश्य आध्यात्मिक रूप से साहसी बनने में है- शक्ति का स्रोत है- अभय । जो प्रभु की राह पर चलने में आने वाली कठिनाइयो तथा बाधाओं से डÞरता नहीं, वही निर्बल होते हुए भी मजबूत जीवन वाला व्यक्ति होता है, लेकिन आसान बात नहीं है, अभय होना । भय तो हर समय हर कहीं है । आज स्वास्थ्य और तनाव की समस्या का एक बडÞा कारण है- भय या डर । भय शरीर को ही नहीं मनोबल को भी कमजोर करता है । अनेक भयंकर बीमारियों का कारण भी यह भय ही है । अपना जीवन परमात्मा के हाथों में सौंप कर ही हम ‘अभय’ हो सकते हैं, क्योंकि परमात्मा की ही इच्छा और आवश्यकता के कारण ही प्राणी का जीवन धरती पर है ।
६. जीवन में सन्तुलन बनाए रखें- सफल जीवन भौतिकता, सामाजिकता तथा आध्यात्मिकता के सन्तुलन का नाम है । जीवन की इन तीनों वास्तविकताओं में जो सन्तुलन स्थापित करता है, वही जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल होता है ।
७. हर परिस्थिति में जीवन का सम्मान करना चाहिए- कहते हैं कि सच्चे अर्थो में वही महान् होता है, जो अपने दुःखों को भूलाकर परोपकार में जुट जाता है । कई बार ऐसा होता है कि मौत की आहट अनसुनी कर हमें जीना होता है । इस बात को असाध्य रोग से ग्रसित रोगियों को देख कर आसानी से समझा जा सकता है । उन्हें निरन्तर शारीरिक तथा मानसिक पीडÞा महसूस होती है । यहाँ मुख्य बात यह है कि ऐसी हालत में भी आप जीवन के प्रति कैसा रवैया रखते हैं । दुःखों और कष्टों से घबरा कर पलायनवादी और आत्मघाती प्रवृत्ति में जाना तो मर्ूखता ही है । क्योंकि समय और परिस्थितियाँ शाश्वत नहीं, परिवर्तनशील हैं । जीवन में सुख-दुःख तो आते ही रहते हैं ।
८. सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं वरन् हमारे सोचने के तरीके पर निर्भर होता है- यदि हमे सुखी होने के लिए दूसरों की जरूरत पडÞती है तो यह एक तरह की दूसरों की इच्छा पर निर्भरता हर्ुइ और हर तरह की परनिर्भरता दुःख लाती है । दूसरा व्यक्ति आकर मुझे खुश करे, यह अपेक्षा ही क्यों करनी – और वह दूसरा व्यक्ति भी यही अपेक्षा लिए बैठा है । जब हम संसार में अर्थात् किसी वस्तु में किसी घटना में किसी व्यक्ति से सुख खोजते हंै तो अन्तिम परिणाम सिवाय दुःख के और कुछ नहीं होता । परमात्मा का नाम ही हमारा आरोग्य है तथा परमात्मा का स्मरण ही हमारी औषधि है ।
९. जीवन में आत्मकेन्द्रित होने से बचना चाहिए- केवल अपने हर काम को विचार को या दृष्टिकोण को ही सबसे महत्वपर्ूण्ा नहीं समझना चाहिए, अगर हम इस तरह की किसी आदत से परेशान हैं तो उसे दूर करना चाहिए । हम जब अपने हर काम को सब से महत्वपर्ूण्ा समझते हैं तो केवल खुद को ही महत्व देते हैं । हम जब आत्मकेन्द्रित हो जाते हंै तो दूसरे के पक्ष तथा दृष्टिकोण को समझने की हमारी क्षमता क्षीण होती जाती है । किसी व्यक्ति में हजार गुण होने के बावजूद यदि उस में एक स्वार्थ का अवगुण आ जाए तो उसके सारे गुण समाप्त हो जाते हैं ।
१०. हर समय के लिए अच्छा कार्य और हर अच्छे कार्य के लिए समय का स्वभाव विकसित करंे- इस क्षणभंगुर जीवन में मनुष्य को अच्छे कार्य करने चाहिए । अच्छे कार्य से तार्त्पर्य है, ऐसे कार्य, जिन से समाज और मानवता का भला हो । प्रत्येक मनुष्य का यह कर्तव्य भी है कि वह अपने व्यक्तिगत जीवन से समय निकाल कर अच्छे कार्य करे ।
११. सारी बसुधा एक कुटुम्ब के समान है- यह सारी धरती एक देश है तथा हम सभी इसके नागरिक हैं, सारी बसुधा एक कुटुम्ब के समान है, यह मानना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य बनता है ।

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