मनोरथ-सिद्धिका आधार चिन्तन है, चिन्ता नहीं

रवीन्द्र झा “शंकर”
यह नियम है कि मनुष्य जिस वस्तु का भलीभाँति चिन्तन करता है, उसे उसकी प्राप्ति होती है। अत एवं जिसको जिस वस्तु की आवश्यकता हो, उसको उसी का चिन्तन करना चाहिए। यहर्ीर् इप्सितार्थ-सिद्धिका सर्वोत्तम उपाय है। यह एक ऐसा बल है, जो चिन्तनीय से चिन्तनकर्ताका सम्बन्ध करवा देता है। दोनों के बीच में चाहे कितना भी अन्तर क्यों न हो, पर चिन्तन क्रमशः उस को दूर कर दोनों को मिला देता है। यानी जिस वस्तु की आवश्यकता हो, पर जिसके प्राप्त होने की कुछ भी सम्भावना न हो, भलीभाँति किए जानेवाले चिन्तन के प्रभाव से उसकी प्राप्ति भी अद्भुत प्रकार से सम्भव हो जाती है।
चिन्तन एक ऐसा यन्त्र है, जो अब तक बडÞे-बडÞे काम कर चुका है। ऋषि-मुनियोंद्वारा वणिर्त आठों सिद्धियाँ और नवों निधियाँ भीम के साहसिक कार्य और मन्त्र-तन्त्र की पौराणिक गाथाएँ केवल इस एक शब्द चिन्तन के ही अधीन हैं। यह जिस को साध्य है, वह प्रभु के समान है, उससे त्रिलोकीनाथ भगवान शंकर दूर नहीं हैं।
मन एक प्रकार का चुम्बक है। यह जैसे विचार या चिन्तन में लगा रहता है, वैसे ही मनोरथों की सिद्धी होती है। अवश्य ही इस बात की सावधानी रखनी चाहिए कि चिन्तन हो उत्तम प्रकार से और तभी वह परिपक्वावस्था को प्राप्त होता है। सारांश यह है कि फल प्राप्त होने तक चिन्तन करते ही रहना चाहिए। यदि कोई किसी जगह जाने के लिए घर से निकले तो उसे वहाँ पहुँचने तक चलते ही रहना चाहिए।
‘अभी वह जगह क्यों नहीं आई – अब तक वह स्थान दृष्टिगोचर क्यों न हुआ -‘ वस्तुस्थिति का विचार करने से इस प्रकार के अधर्ैययुक्त उद्गार निर्रथक हैं, क्योंकि इन से लक्ष्यस्थान प्राप्त नहीं हो जाता। यदि गन्तव्य स्थान प्राप्त न हो तो समझना चाहिए कि जितना चलने कि आवश्यकता है, उतना अब तक चला नहीं गया। अभी हमें और चलना चाहिए। उसकी प्राप्ति के लिए जितना चलना आवश्यक है, जब उतना चल चुकेंगे तब वह स्थान हमें अवश्य ही प्राप्त हो जायगा। पर इस विचार को त्यागकर मनुष्य अधीर हो उठता है। ‘मुझे मेरर्ीर् इप्सित वस्तु शीघ्र क्यों प्राप्त नहीं होती -‘ इस अनुचित विचार के वशीभूत हो, वह वस्तु प्राप्ति के लिए प्रारम्भ किया हुआ शुभ प्रयत्न बीच में ही त्याग देता है र्!र्
इप्सितार्थ की सिद्धि के पथ पर चलनेवाले को उचित है कि वह प्रारम्भ किए हुए प्रयत्न को कभी न छोडÞे, निश्चल दृष्टि से उस में लगा ही रहे। प्रयत्न जारी रहने से एक दिन फल अवश्य मिलेगा। विश्व का यह नियम है कि कोई भी क्रिया निष्फल नहीं होती। इसलिए दृढÞ विश्वास रखकर प्रयत्न करते रहना ही हितकर है। सतत संलग्न रहने से फल स्वतः  प्रकट हो जाता है। परन्तु जब तक फल न मिले, तब तक अन्तस्करण की श्रद्धान्वित स्थिति को सुदृढ रखकर उत्साहपर्ूवक प्रयत्न करने से कभी विमुख नहीं होना चाहिए।
एक बात और विचारणीय है। यह देखा जाता है कि बहुधा गन्तव्य स्थानपर पहुँचने की इच्छा रखनेवाला पथिक राह चलते रहने पर भी वहाँ नहीं पहुँचता, परन्तु यह बात ठीक नहीं है, क्योंकि ठीक रास्ते पर चलते रहनेवाले की यह दशा कभी नहीं हो सकती। जो उससे उलटे मार्ग पर चलता है, चाहे वह अपने मन में मानता हो कि मैं ठीक रास्ते पर चल रहा हूँ, वह अवश्य वहाँ नहीं पहुँचता है। पर्ूव की ओर जाने की आवश्यकता और थोडÞी देर पर्ूव की ओर चले भी, परन्तु, दूसरे ही मुहर्ूत में भ्रम से वह उत्तर में जाने लगे तो वह पर्ूव दिशा में कदापि नहीं पहुँचेगा। इसलिए लक्ष्य स्थान पर पहुँचने की इच्छा रखनेवाले पथिक को सावधानी की बडÞी आवश्यकता है, जिससे वह सीधे मार्ग को छोडÞकर उलटे पथ पर न चल पडÞे।
योग्य मार्गपर चलनेवाला अवश्य ही वहाँ पहुँचता है। ऐसे ही कभी कभर्ीर् इप्सित वस्तु को प्राप्त करने की इच्छावाला उसका चिन्तन तो करता है, परन्तु उसे फल नहीं मिलता। इस में भी यही बात समझनी चाहिए कि वहा पूर्वोक्त गन्तव्य-स्थान के सीधे मार्ग को छोडÞ भ्रम से दूसरे मार्गपर चलनेवाले की तहर लक्ष्य वस्तु के चिन्तन को छोडÞकर दूसरे विषय का चिन्तन करने लगता है। इसीसे उसे उसकी प्राप्ति नहीं होती। जब कुछ समय बीतने पर भी फल नहीं मिलता, तब या उससे पर्ूव ही कर्म के नियमों को नहीं समझनेवाले लोग अत्यन्त अधर्ैय से या तो आरम्भ किया हुआ चिन्तन र्सवथा छोडÞ देते है, अथवा चिन्तन की जगह भ्रम से चिन्ता करने लगते हैं। परिणाम यह होता है कि वह चिन्ता उन्हें उलटे मार्ग पर ले जाती है। जिससे वे अपने लक्ष्य से और भी दूर चले जाते हैं।
चिन्ता और चिन्तन को एक समझना बडÞी भारी भूल है। वे दोनों र्सवथा भिन्न स्थिति हैं। दोनों के परिणाम भी भिन्न-भिन्न होते हैं। चिन्तन फल को प्रकट करता है और चिन्ता उस का नाश करती है। चिन्तनशील प्राणियों को शान्ति देता है और चिन्ता शान्ति का नाश करती है। चिन्तन धर्ैय तथा श्रद्धा का पोषण करता है जबकि चिन्ता इनका विध्वंशक है।
अध्यात्म-शास्त्र का नियम है कि जो जैसा चिन्तन करता है, वह वैसा ही फल पाता है। अर्थसिद्धि के लिए प्रधान कर्तव्य केवल चिन्तन है, परन्तु सावधान ! चिन्तन के बदले कही चिन्ता न होने लगे !
-चिन्ता से चतुर्राई घटे, सोच से घटे शरीर। पाप से लक्ष्मी घटे, कह गए दास कबीर)

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