मन आज भी वहीं है

ushasherchanआज तक वह अपने ही गाँव की मिट्टी और पशु पक्षी के साथ पला बढा है । उसका संसार उसका परिवार गाँव ही था । अपना और अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए उसकी आर्थिक स्थिति संतोषजनक थी । इसी वजह से उसका जीवन शाँतिपर्ूण्ा तरीके से गुजर रहा था । सुन्दर और शांत अपने गाँव में वह भयरहित जीवन यापन कर रहा था ।
पता नहीं किसकी नजर लग गई । उतना सुन्दर गाँव धीरे-धीरे अशान्त होता चला गया । जो गाँव कभी एक हुआ करता था, वह दो भागों में बँट गया । एक दूसरे के ऊपर का विश्वास घृणा में बदल गया ।
आफत विपत में आगे-आने वाला हाथ दूर होता गया । न जाने कहाँ से झुण्ड के झुण्ड लोग आये और सीधे सादे गाँव वाले को क्या पाठ पढÞाया कि भयमुक्त गाँव भययुक्त हो गया । गाँव के युवा युवतियों के खो जाने की वजह से गाँव वाले और भी डर-डर कर रहने लगे हैं । जो बचे हैं वो इसलिए बचे हैं क्योंकि वो काफी छोटे हैं ।
रात भर वो लोग इधर-उधर करते रहते हैं । कभी किसी के यहाँ तो कभी किसी के यहाँ जाते हैं, रहते हैं और खाते हैं । सुबह होती है और चले जाते हैं । एक दूसरे पर शंका, अविश्वास और डर के साथ सभी को रहते देख उसे काफी आर्श्चर्य होता है । यहाँ आने से पहले कभी किसी पुलिस चौकी पर आक्रमण तो कभी किसी पुलिस चौकी के ध्वस्त, कभी कहीं भिडÞन्त में दर्जनों के मरने की और घायल होने की ही बात होती थी । एक समय था कि किसी एक व्यक्ति के मरने की खबर से सारा देश थर्रर्ाााता था, पर अब तो दर्जनों के मरने पर भी अनसुना करना पडÞता है ।
“वर्षभर खून पसीना बहाकर उपजाए अन्न को बेचना मुश्किल हो गया है, सिर्फकिसी तरह पेट भरा जा सकता है । अन्न बेच कर नमक, तेल, मसाला, कपडÞा-लत्ता और बच्चों की कापी किताब खरीदने का माध्यम भी खो गया । ‘तुम्ही कहो कैसे रहें -‘ वह अपनी पत्नी से अपने मन की पीडÞा कहता है ।
“सामान नहीं आए तो कोई बात नहीं, दो चार पुराने कपडÞे हैं उससे काम चल जाएगा, किन्तु यहाँ तो जान-माल की सुरक्षा खो गई है । सभी पडÞोसी कौडÞी के दाम में अपनी जमीन बेच कर यहाँ-वहाँ जा रहे हैं । जो नहीं बेच पाए हैं वो घर-द्वार में ताला मार कर रातों-रात चले गए हैं । हम सब भी ऐसे ही कहीं चलते हैं, पर आप तो मेरी बात ही नहीं सुनते, तो अब आपसे क्या कहूँ -”
“तुम चाहे जो कहो । जैसी भी समस्या आए, जो भी पीडÞा सहनी पडÞे, जितना भी दुख तकलीफ सहना पडÞे, अपनी जन्मभूमि को, अपनी जान से प्यारे गाँव को छोडÞ कर मैं नहीं जाऊँगा ।” वह अटल होकर बोला ।
रात में फिर एक झुण्ड लोग आए और कहने लगे, हम सब भूखे हैं, हम सबको खाना खिलाओ ।
उससे रहा नहीं गया उसने कहा, “आप सब जब जी करता है आते हैं और कहते हैं खाना खिलाओ । खाना खिलाकर भेजो तो दूसरे आकर कहते हैं कि क्यों खिलाया, उन्हें क्यों रहने दिया उस पर मारते पीटते भी हैं । आज तो आप सब कहीं और जाकर व्यवस्था कीजिए । आज पकाने के लिए कुछ नहीं है ।” उसके स्वर में अनुनय था ।
“क्या कहा, हम सब क्या शौक से खाना माँगने आते हैं – इस तरह रात बिरात भटकने के पीछे हमारा भी कोई उद्देश्य है । हम सामन्तवाद को मिटाकर नया नेपाल बनाना चाहते हैं । इसके लिए तुम सबको हमारा साथ देना पडÞेगा ।”
“क्या पता ये नया नेपाल क्या है । हमें इन सबकी क्या समझ । हम सब तो अपने गाँव घर में शांति से रहें हमारे लिए यही काफी है । इस तरह भाई-भाई में दुश्मनी करके, एक दूसरे का खून पीकर, सभी नेपालियों का भविष्य दाँव पर लगाकर क्या नया नेपाल बनेगा –
“बहुत हुआ, अब ज्यादा भाषण मत दो । जो है वही पका कर दो, हम सब बहुत भूखे हैं ।”
जो भी थोडÞा चावल था, उसकी पत्नी ने वही पका दिया और गुन्द्रुक -सूखा हुआ साग) को उबाल कर दे दिया
अभी नींद पूरी तरह नहीं खुली थी, लगा कोई बूट से दरवाजा ठोक रहा है । आवाज तेज होती गई तब उसने उठ कर नीचे की ओर देखा । आँगन पुलिसों से भरा हुआ था । वह डर गया । क्या करूँ न करूँ वह असमंजस में पडÞ गया । विपरीत स्थिति देख कर वह नीचे गया, पति को नीचे जाता देखकर उसकी पत्नी भी उसके पीछे हो ली । उसने दरवाजा खोल दिया । एक साथ इतने पुलिसवालों को देखकर वह भय से काँप गया ।
“ए, कल रात तुम्हारे यहाँ आतंकवादी आए थे – तुम्हें बार-बार समझाया गया है कि उन्हें खाना-पीना या रहने की जगह मत दो, फिर भी तुम वही करते हो ।” पुलिसवाले उसे धमकाते हुए गाली देने लगे ।
“हाँ हजूर आए थे । मैंने कहा भी कि मेरे पास खाना पकाने के लिए कुछ भी नहीं है, पर वे माने ही नहीं । उल्टा धमकाने लगे तो क्या करता हुजूर बाध्य होकर खाना देना पडÞा ।”
“तुम्हारे जान पहचान के होंगे तभी तो बार-बार तुम्हारे यहाँ ही आते हैं ।” “कहाँ पहचानता हूँ हुजूर । नकाब लगाकर आते हैं । परोसा हुआ खाना किसी कोने में मँुह घुमाकर खाते हैं । कभी तो एक क्षण आराम करते हैं, तो कभी तुरन्त चले जाते हैं । अभी तक किसी का चेहरा नहीं देखा तो भला कैसे पहचानूँ -” उसने वास्तविकता बताई ।
“इस तरह सीधी तरह पूछने से ये कहाँ बताने वाले हैं, मार खाने के बाद ही उगलते हैं सब ।” एक पुलिस वाला गरजा ।
दूसरे ने फिर डराया, “क्या-क्या बात कर रहे थे वो – क्या-क्या प्लान बनाया आतंकवादियों ने – कहाँ-कहाँ आक्रमण करने की योजना बनाई उन्होंने तुम्हें पता होगा, बताओ ।”
उसने निरीह होकर पुलिस की ओर देखा, पुलिस की ज्यादती को देखकर उसकी पत्नी से नहीं रहा गया वह बोल पडÞी, “हमारी क्या गलती है जो हमें धमकाते रहते हैं – हमें उनकी बातों का क्या पता । हमारा क्या कसूर है – बिना गलती बिना अपराध के हम ये दुहरी मार सह रहे हैं, ऐसे हम कब तक जी पाएँगे – उन सबको खाना हम खुशी से नहीं देते बाध्यतावश देते हैं । ये आप सब क्या समझिएगा । साल भर पसीना बहाकर उपजाया गया अनाज हम बेच नहीं पाते, उल्टा अपने पेट पर लात मार कर उन्हें खिलाना पडÞता है । आप सब सरकार का नमक खाते हैं, आप सबको तो रातभर गस्ती देकर हमारी सुरक्षा करनी चाहिए, पर आप सब अपनी जान बचाने के लिए किसी बिल में छुपे रहते हैं । सुबह बिल से निकल कर हम जैसे निर्दोष को धमका कर सारा दोष हम पर मढ देते हैं ।” उसकी पत्नी आक्रोशित होकर बोली ।
“अरे ! यह तो बहुत चालाक है । पहले इसी को ठीक करना पडÞेगा ।” अब तक वह चुपचाप आँसू बहा रहा था पर जब पुलिसवाले को अपनी पत्नी की ओर बढते देखा तो वह लपक कर पत्नी के आगे जाकर खडÞा हो गया और बोला, “नहीं आप सब एक औरत के साथ हाथापाई नहीं कर सकते । यह ठीक तो कह रही है । जो देखा वही तो कहा ।”
“तुम बहुत चालाक मत बनो । हमें भी पता है तुम कौन हो । तुम उनके लिए जासूसी करते हो ।” अफसर लगने वाले एक व्यक्ति ने उस पर आरोप लगाते हुए कहा । फिर उसने एक पुलिस को आदेश दिया, “जाओ इसके घर की तलाशी लो कहीं बम, हथियार, गोला बारूद तो छुपाकर नहीं रखा है । जाओ तलाशी लो ।”
पुलिस उसके आदेश का पालन करने के लिए घर के भीतर चली गई । थोडÞी ही देर में कुछ नहीं मिला साहब कहते हुए उसके बच्चों को घसीटते हुए बाहर निकले । आँगन में अपने माँ-बाबा को देखकर रोते-काँपते उनके पीछे जाकर छिप गए ।
“आज माफ करते हैं । आज के बाद कभी आतंकवादियों को अपने घर में रहने और खाने के लिए दिया तो बहुत बुरा होगा । गाँव से निकाल दिए जाओगे ।” धमकी और चेतावनी देकर वे सभी चले गए ।
बिना कारण उन्हें इस पीडÞा को सहना पडÞ रहा था । दो-चार ही दिन संतोष से गुजरे थे कि आधी रात में फिर एक समूह आ गया । आज कुछ हो जाय द्वार नहीं खोलूँगा ये सोचकर वह बैठा रहा । पर लगा कि अब दरवाजा टूट जाएगा तो उसने उठ कर दरवाजा खोल दिया । दरवाजा खुलते ही उसके ऊपर लात घूँसों की बरसात होने लगी । “आप सब क्यों मार रहे हैं हमें, हमने क्या बिगाडÞा है आपका -”
“तुमने क्या बिगाडÞा है यह तो हमसे ज्यादा तुम्हें पता होगा ।”
“मुझे क्या पता है -”
“नींव तो तुमने ही खोदा है । इतनी देर से दरवाजा खटखटा रहे हैं, पर तुम खोल नहीं रहे थे क्यों -”
“खाना खाकर तुरंत सोया था, इसलिए नींद नहीं खुली । पता ही नहीं चला, पता चलता तो खोल ही देता ।”
“अच्छा, तुम पेट भर कर खाओ और सोओ, हमारे पेट में चूहे दौडÞ रहे हैं, और तुम दरवाजा नहीं खोल रहे हो । जान कर अनजान बन रहे थे । उस दिन पुलिस को हमारे बारे में क्या-क्या बताया -”
“मुझे आप सब के बारे में क्या पता है जो मैं उन सबको कोई सुराग दूँगा । हर बार जो आते हैं नकाब लगाकर आते हैं । किसी-किसी को आवाज से पहचानता हूँ । उस दिन पुलिस आकर धमका कर चली गई, कहा आप सबको रहने और खाने के लिए न दूँ, अच्छा नहीं होगा । इस तरह दोनों तरफ से अत्याचार सहकर हम सब कब तक यहाँ रह पाएँगें ।”
“नहीं रह सकते तो अभी निकल कर जाओ न । तुमको किसने रोका है – हम सब भी तो इसी तरह जान हथेली में रखकर क्रान्ति में अपना जीवन होम रहे हैं । नया नेपाल बनाने के लिए हम सब लगे हुए हैं और तुम एक शाम हमें खाना नहीं दे सकते । इसके लिए इतना महाभारत किए हुए हो ।”
उसने अपने मन में सोचा, क्रान्ति के नाम पर ऐसे उदण्ड क्या नेपाली का भविष्य लिख सकेंगे –
नीचे बहुत देर तक बहस की आवाज सुनकर उसकी पत्नी भी डरते-डरते हाथ में डिबिया लेकर नीचे उतरी । डिबिए की रोशनी में उसकी पत्नी का सुन्दर चेहरा देखकर वो बोलने लगे- “आहा ! इसकी पत्नी तो बहुत सुन्दर है । देखो देखो डिबिए की रोशनी में पूनम का चाँद  जैसी दिख रही है ।”
सबका ध्यान उसकी पत्नी की तरफ केन्द्रित हो गया ।
कितने दिनों से दबी वासना की आग उनकी भडÞकने लगी । वो सब उसकी पत्नी की ओर बढने लगे ।
उन लोगों से बचने के लिए दोनों ने उनका प्रतिकार किया । पर उन्होंने उसे मार-पीट कर खम्भे से बाँध दिया । पाँच सात आदमियों के बीच भला उसकी क्या चलती । उसकी पत्नी ने भी अपने बचाव में पूरी कोशिश की अनुनय विनय किया, पैर पडÞे, दुत्कारा किन्तु उन पर कोई असर नहीं हुआ । उनकी वासना की आग इतनी भडÞक चुकी थी कि उन्हें उसके आगे कुछ दिखाई नहीं पडÞ रहा था ।
“विनती करती हूँ, या तो मार दीजिए या छोडÞ दीजिए” इन सारी बातों को लात मारते हुए उन सब ने उसके पति के सामने ही बारी-बारी से उसका बलात्कार किया । वह घायल शेर की तरह चिल्लाता रहा । अपनी पत्नी की वो रक्षा नहीं कर पाने की आत्मग्लानि से पानी-पानी हो रहा था, उस पर वो सभी उसे धमका रहे थे- “ज्यादा मत चिल्लाओ । पत्नी की जिन्दगी चाहिए तो चुप रहो, लाश चाहिए तो हमें कुछ नहीं कहना ।” पत्नी के चेहरे पर पुती हर्ुइ लज्जा, ग्लानि, विवशता, घृणा, वेदना और आक्रोश के आँसू को वह पोछ नहीं पा रहा था, विवशतापर्ूवक मूक दर्शक की तरह वह मृतप्राय हो चुका था ।
“एक समय का खाना देना तुम सबको भारी लग रहा था । आज से तुम्हारी सारी सम्पत्ति हमारी हर्ुइ । तेरा र्सवस्व हमने हरण किया । यही तुम्हारी सजा है । हमारी बात न मानने वालों को हम ऐसी ही सजा देते हैं । धन्य तुम्हारी पत्नी है कि उसके कारण तुम बच गए नहीं तो तुम्हें भी मास्टर की तरह पेडÞ से लटका कर मार देते । आज तुम भाग्य से बच गए ।” उन सबने उन्हें और उसके बच्चों को घसीटते हुए घर से बाहर निकाल दिया । वो समझ नहीं पा रहा था कि किसे सम्भाले अपनी घायल पत्नी को या डर से रोते-चिल्लाते अपने बच्चों को । हे देव, ये कैसी आफत में हमे ला दिया । जिन्दगी भर जिस गाँव घर में रहता आया वहाँ से अचानक इस तरह रातों-रात भागना पडÞ रहा है ।
अपनी जान से प्यारी पत्नी को उन कामुकों से बचा नहीं पाया, उसके सामने सभी उसके शरीर को नोचते चिथोडÞते रहे और वह कुछ नहीं कर पाया । ये सारी बातें उसके मन में युद्ध मचा रहे थे । मन में सवालों के तूफान के साथ अपने परिवार के साथ वो काफी दूर निकल आया था । चाँदनी रात थी इसलिए भागने में आसानी हर्ुइ । सुबह होने ही वाली थी और पैर भी अब जवाब देने लगे थे, इसलिए वह वहीं एक बडÞे मैदान में बैठ कर सुस्ताने लगा । सुबह तो हो गई थी पर उसके मन पर अभी भी काले बादल छाये हुए थे । बच्चे डर और भूख से कुछ नहीं बोल पा रहे थे । उनके सूखे और काले होंठ और पत्नी की हालत देखकर उसका हृदय छलनी-छलनी हो रहा था ।
दो तीन दिन पहले ही उसने बकरे, मर्ुर्गे और भैंस बेचे थे, जिसके पैसे उसने अपने कोट की जेब में रखा था, जो अभी काम दे रहा था, नहीं तो आज और भी दिक्कत हो जाती । पास ही चाय की दुकान से उसने चार कप चाय और ब्रेड लिए । बच्चों और अपनी पत्नी को खाने के लिए दिया । बच्चे भूख से बेहाल थे इसलिए गपागप खाने लगे । पत्नी से पीडÞा सही नहीं जा रही थी, कहीं उसकी गलती नहीं थी फिर भी आँखों से निरन्तर आँसू बह रहे थे ।
खाने का मन नहीं होते हुए भी उसने चाय ले ली क्यों कि उसे लगा कि अगर वो नहीं लेगी तो पति भूखा रह जाएगा । बच्चों का पेट नहीं भरा होगा ये सोच कर उसने चाउ चाउ बनाने के लिए भी कह दिया था । होटल वाले ने चाउ चाउ पका कर वहीं पहुँचा दिया ।
कहाँ जाऊँ – कहीं न कहीं तो जाना ही पडÞेगा, पर कहाँ – उसके अंधकारमय भविष्य की तरह उसकी यात्रा का भी कोई अंत नहीं दिख रहा था ।
जिस तरह दूसरे विस्थापित हुए थे, उसी तरह वह भी शहर आ गया । शहर आने पर उसे पता चला कि वह अकेला इस दुख से नहीं गुजर रहा है, उसके जैसे अनेक हैं जिन्हें अपना घर बार छोडÞकर आना पडÞा है । कोई यहाँ से तो कोई वहाँ से पीडिÞत थे । कहीं से पीडिÞत हो पर मार में तो उसके जैसे निर्दोष जनता ही हैं ।
पास में जो पैसे थे उससे कितने दिन काम चलता इसलिए वह भी दूसरों की तरह मेहनत मजदूरी करने लगा । सभी विस्थापित किसी न किसी अत्याचार के मारे थे । कोई आतंकवादी के आक्रमण से तो कोई चन्दा न देने की वजह से तो कोई जासूसी के आरोप की वजह से तो कोई पुलिस और सेना की धमकी से विस्थापित हुए थे । कोई राजनीतिक विचार रखने वाला था तो कोई जमीन्दार था । विस्थापितों की एक बडÞी जमात थी, जिसमें जनयुद्ध में मारे जाने वालों का परिवार और घायल लोग भी शामिल थे ।
आज तक वो घर वापस नहीं जा सका, कल भी जा सकेगा या नहीं पता नहीं । अपना घर-बार सब खो गया या हडÞप लिया गया इस पीडÞा को भोगते हुए जिन्दगी गुजार रहा है । जो भी दल सत्ता में आता है वह अपना फायदा देखता है । उसके जैसों के लिए तो दुख ही दुख है । राष्ट्रवादी नेता से तो आशा की जा सकती थी पर पार्टर्ीीदी नेता से क्या उम्मीद की जाय । घोर निराशा में वो अपना जीवन गुजार रहा है ।
उसके जैसे सभी विस्थापित अपने गाँव को याद करते रहते हैं और रोते हैं । सशस्त्र युद्ध में जो मारे गए उसके परिवार वाले उन्हें याद कर रोते हैं । जो घायल हैं वो अपने दर्द से रोते हैं । जिनके अपने खो गए हैं, वो उनकी प्रतीक्षा में रोते हैं ।
अभी कुछ दिनों पहले एक औरत ने अपने पति के बिछोडÞ और बच्चों को पालने में जो कठिनाई हो रही थी उसके कारण आत्महत्या कर ली । हाल ही में दवाई न मिल पाने की वजह से किसी की मृत्यु हो गई । जिन्दा था तो बच्चों का सहारा था, अब उन बच्चों का क्या होगा – उनका भविष्य कैसा होगा – किस शहर, किस शिविर में या किस देश में वो पहुँचेंगे – उनके भविष्य को सोचकर उसका मन काँप गया । मन मार कर तमाशा देखने के अलावा वो कर भी क्या सकता है ।
हमेशा उसे अपने गाँव की याद आती है । उसे याद कर उसका मन हमेशा व्यथित होता है । अपनी जन्मभूमि अपनी मिट्टी याद आती है । उसे वो कभी भूल नहीं पाया । वो हमेशा कहता है, “मैं अपने प्राण से प्यारे गाँव को छोडÞकर यहाँ जरूर हूँ पर मेरा मन मेरे गाँव से कभी विस्थापित नहीं हो पाया है और न हीं कभी हो सकेगा मेरा मन आज भी वहीं है ।”
-नेपाली भाषा से अनूदित)

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