मन की पीडा :
खिलानाथ ढकाल

उस रात हमलावरों के चंगुल से भागने का मौका ना मिला होता तो इस तरह से फिर कलम चलाने का मौका भी नहीं मिलता । मैंने तो जिन्दगी से हार मान ली थी और यह सोच लिया था कि अब मेरी मौत निश्चित है । तभी मेरे दिमाग में आए एक आइडिया ने मुझे नयाँ जीवन दिया । मध्यरात में एमाले के युवा संगठन युथफोर्स के कार्यकर्ता द्वारा जो जख्म मुझे दिया गया वह अब धीरे-धीरे ठीक होने लगा है । नोबेल मेडिकल अस्पताल के आकस्मिक कक्ष में उपचार कराते हुए आज तीन हफ्ता होने लगा है । नाक का आँपरेशन होने के बाद थोडÞा सहज महसूस हो रहा है । खाना शुरु किए अभी एक दिन हुआ है । युथफोर्स के विराटनगर स्थित स्थानीय नेता परशुराम बस्नेत के द्वारा मुझे मारने के लिए भेजे गए लोगों में से दो, इस समय पुलिस हिरासत में है ।
प्रेस स्वतंत्रता व घटना के विरोध में देशव्यापी रुप से शुरु हुए आन्दोलन को दबाने के लिए परशुराम व उनके आकाओं की दादागिरी कम नहीं हर्ुइ है । परशुराम के खिलाफ कानूनी कार्रवाही करने का साहस शायद इस सरकार में नहीं है । परशुराम के द्वारा अपराध किए जाने की बात र्सार्वजनिक होने, उसका सबूत मिलने के बावजूद उसके खिलाफ कार्रवाही करना तो दूर उलटे सत्तारुढ दल उसे राजनीतिक संरक्षण दे रही है । कानुनी राज्य की वकालत करने वाली पार्टर्ीीे सत्ता में होने के बावजूद अपराधी को संरक्षण देना लज्जास्पद बात है । अपने को स्वतंत्र प्रेस के पक्ष में होने का दावा करने वाले, कानुनी राज्य के पक्षपोषक लोकतंत्र का साधक कहने वाली पार्टर्ीीारा अपराधी को छिपा कर रखने की बात उस दर्द से भी पीडÞादायी है, जो मुझे परशुराम के लोगों ने दिया था ।
मन्त्री से लेकर पुलिस के आला अधिकारी तक मुझसे मिलने आए । सभी ने एक ही आश्वसन दिया । अपराधी का खोजी कार्य जारी है । अपराधी को जल्द ही पकडÞ लिया जाएगा । हम पूरा प्रयास कर रहे हैं । लेकिन अभी तक कुछ नहीं हो पाया । अपराधी आज भी खुलेआम घुम रहा है और सरकार के ही संरक्षण में रहकर मीडिया वालों को अन्तरवार्ता भी दे रहा है । सरकारी संरक्षण मिलने के बाद आखिर प्रेस के विरुद्ध बोलने में उसे डर कैसा – संचार मंत्री से लेकर गृहमंत्री तक सभी लाचार साबित हुए । मंत्री एवं पुलिस अधिकारियों का आश्वसन महज शब्दों तक ही सिमट कर रह गया है । वास्तविकता तो यह है कि अपराधी को पकडने का कोई भी प्रयास किया ही नहीं जा रहा है ।
र्    वर्तमान सरकार और इसके प्रधानमंत्री झलनाथ खनाल ही इस गुण्डाराज के प्रमुख कारक हैं । और उनके सहयोगी बने हैं एमाले के कुछ और नेता । अस्पताल के बेड पर रहते समय मेरे सामने प्रधानमन्त्री का चेहरा बार-बार सामने आता है । उनके समक्ष कुछ प्रश्नों को पूछने का मन है । यँू तो इस पूरे प्रकरण के दौरान झलनाथ खनाल अपराधियों के ही प्रधानमन्त्री के रुप में दिखाई दिए । वो कहते हैं कि एमाले गुण्डों की पार्टर्ीीहीं है । तो फिर उन्हीं की पार्टर्ीीे सदस्य रहे परशुराम पर अब तक कार्रवाही क्यों नहीं की गई – हत्यारों, लुटेरों व भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने वाली इस सरकार से इससे अधिक और उम्मीद भी क्या की जा सकती है । मेरे शरीर पर लगा घाव तो कुछ महीनों में शायद ठीक हो जाए लेकिन परशुराम के खिलाफ जब तक कार्रवाही नहीं होती मेरा मन शान्त नहीं हो सकता है ।
जेठ २२ गते दोपहर एमाले पार्टर्ीीार्यालय में बुलाकर परशुराम ने मुझे धमकी दी थी । एक समाचार को लेकर नाराज परशुराम ने कहा था कि मेरे खिलाफ कलम चलाने की सजा उसे जरुर मिलेगी । उसी रात परशुराम के निकट सहयोगी मनोज र्राई सहित कुछ युथफोर्स कार्यकर्ताओं ने मेरे ऊपर जानलेवा हमला किया । लेकिन मैं किसी तरह वहाँ से भागने में सफल रहा । मैंने जो समाचार लिखा था, उसमें कुछ भी गलत नहीं है । विराटनगर अदालत परिसर में अभिषेक गिरी पर पेशी के दौरान हुए हमले में परशुराम की संलग्नता होने की बात खुद उन्होंने स्वीकार किया था । मेरे लिखे गए समाचार का खण्डन छापने के लिए काफी दबाव दिया गया । मुझे मारने तक की धमकी दी थी । इतना होने के बावजूद आखिर पुलिस व सरकार किस बात का इंतजार कर रही है । क्यों सरकारी पक्ष द्वारा परशुराम को बचाने की कोशिश की जा रही है –
यदि परशुराम पर कानूनी कार्रवाही नहीं हर्ुइ तो आने वाले दिनों में प्रेस स्वतंत्रता पर और भी हमले हो सकते हैं । सरकार द्वारा परशुराम को संरक्षण देने से मन का पीडÞा कम नहीं हो रही है । शरीर के घावों का जख्म तो फिर भी मर जाए भर सरकार जो जख्म दे रही है, तभी भरेगा जब परशुराम को उसके किए की सजा मिलेगी ।
-लेखकः विराटनगर के नागरिक दैनिक के संवाददाता हैं, जिनपर युथफोर्स कार्यकर्ताओं द्वारा जानलेवा हमला हुआ था ।)

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