मसीहा की महायात्रा और मधेशी राजनीति

हरेक युवा को चोट पहुँची है जिन्होंने मधेश का सकारात्मक काया पलट का सपना अपने आँखो में संजो के रखा था


उपेन्द्र जी की अभिव्यक्ति जो बार–बार मधेशियो के लिए कर्ण पीड़ादायी है कि प्राप्त उपलब्धि को बचाने के लिए चुनाव में जाना पड़ा है, यह बिल्कुल आधारहीन सा लगता हैUpendra-yadav

नेपाल का दक्षिणी मैदान, यानि की मधेश । अभी मैदान में दो प्रकार की गरमाहट है । पहला प्राकृतिक तापमान आसमान छूने को है, वहीं दूसरी है, सियासी सरगरमी । नेपाल के स्थायी सत्ता के द्वारा रचित चुनावी प्रपंच के जाल में सिर्फ मधेशवादी नेतागण नहीं फसे हंै, बल्कि मधेश के अधिकार प्राप्ति की लड़ाई भी कमजोर होती दिख रही है । नवजात संघीयता पर काले बादल मंडरा रहे हैं ।

मधेश खून के आँसू रोने को विवश है । हारा हुआ सा महसूस कर रहा है आज सारा मधेश और इसके बहुत सारे कारणों में से एक है संघीय समाजवादी फोरम, नेपाल का गैरसंबैधानिक चुनाव में भाग लेना
साल आता है, आखिर यह हुआ कैसे ? इस सवाल का जवाब देना न तो सरल है और ना ही कठिन । मधेशवादी राजनीति का उदय कालखण्ड से ही चर्चा करने की आवश्यकता है । परंतु वर्तमान में मधेश राजनीति के कुछ स्वघोषित मसीहा लोग कैसे इस प्रपंचकारी चुनाव को रातों रात समर्थन देने लगे हैं इस बात की चर्चा यहाँ आवश्यक है । क्योंकि मधेशवादी दलो के अड़ान के कारण ही नेपाल सरकार ने स्थानीय तह के निर्वाचन को दो चरणों में कराने का निर्णय लिया था ।


मसीहा की यात्रा
अन्तरिम संविधान को जलाकर रातो रात मसीहा के रूप में उदय हुआ था, उपेन्द्र यादव का । लोगों में एक उम्मीद थी कि अब मधेश अधिकार सम्पन्न हो कर रहेगा । प्रथम मधेश आन्दोलन अचानक से रुक गया था । उस वक्त भी आम मधेशी, आन्दोलन को बिना उपलब्धि रोकना नहीं चाहते थे । कहा जाता है कि उपेन्द्र जी के कारण ही उपलब्धिविहीन तरीके से आन्दोलन का अवसान हुआ था । खैर, अब बात करें वर्तमान की ।
मसौदा संविधान बाहर आने के वक्त से ही मधेश आन्दोलित था । मसौदे के विरोध में जनता स्वतःस्फूर्त रूप में सड़क पर उतर आए थे । मधेशवादी दल को आधार जनता ने दिया था काठमाण्डौ के विरुद्घ आन्दोलन करने का । इसबार के आन्दोलन में नाकाबन्दी तक लगाया गया था । आन्दोलन के दौरान सबसे ज्यादा कोई कड़े मिजाज में प्रस्तुत होता था तो वह थे उपेन्द्र यादव । यह अलग बात है कि उनके गृह जिला मोरङ्ग स्थित जोगबनी नाका वो एक दिन भी नहीं बन्द करा सके । एक दो दिन के अलावा बिराटनगर में रोडशेष और महावीर चौक से बाहर के इलाकाें में आन्दोलन नहीं कर पाये । लेकिन फिर भी उपेन्द्र यादव मधेश आन्दोलन के फ्रन्टलाइनर के रूप में चित्रित होते रहे और यह कहने से कभी पीछे नहीं हट रहे थे कि संविधान में संसोधन की नहीं बल्कि पुनर्लेखन की आवश्यकता है । और जब नेपाल के स्थायी सत्ता के द्वारा स्थानीय तह निर्वाचन का आगाज हुआ तब भी वह कहते थे की यह चुनाव गैरसंबैधानिक है । धारा २३५(२) को आधार बनाते हुए कहते थे कि केन्द्र द्वारा यह चुनाव सम्भव नहीं है । यह चुनाव तो सिर्फ प्रदेश सरकार ही करवा सकता है ।

मानो उपेन्द्र जी अगर चुनाव में नहीं जाते तो नेपाल में राजतन्त्र का पुनःआगमन हो जाता । संघीयता समाप्त हो जाती

परंतु रातोरात उपेन्द्र जी को क्या हुआ, वही बता सकते है । फिर भी उनके लाचरी का कारण उनके प्रधानमंत्री बनने का सपना है यह कहा जा रहा है । अशोक राई और बाबुराम भट्टराई के चंगुल में उपेन्द्र जी बुरी तरह से फँस चुके है, यह आज के तारीख का आम विश्लेषण हो चुका है ।
प्रश्न यह है कि क्या कोई नेता प्रधानमंत्री बनने का सपना भी नहीं देख सकता ? बिल्कुल देख सकता है और देखना भी चाहिये । ऐसी परिस्थिति में एक प्रतिप्रश्न आना भी तो लाजमी है कि, अधिकार की राजनीति में लगे नेता को इतना बड़ा सपना देखने से पहले यह नहीं सोचना चाहिये कि जिस समुदाय के लाशाें की सीढ़ी बनाकर कोई सियासत के उच्च पद पर विराजमान होना चाहते हंै उस समुदाय को अधिकार का ‘अ” भी प्राप्त हुआ की नहीं ?
अगर मधेशवादी छ दलाें का एकीकरण से उपेन्द्र जी भयभीत हुए होंगे तो यह अति दुखद बात होगी । राजपा गठन से मधेश आन्दोलन को अलग ढंग से उर्जा प्राप्त हो ही रही थी और उसी बीच संघीय समाजवादी फोरम, नेपाल का गैरसंवैधानिक चुनाव में भाग लेना उन सबको निराश करना साबित हुआ हो जिनका अपना मधेश आन्दोलन के नाम पे शहीद हो गया है । हरेक युवा को चोट पहुँची है जिन्होंने मधेश का सकारात्मक काया पलट का सपना अपने आँखो में संजो के रखा था÷है और उपेन्द्र जी की अभिव्यक्ति जो बार–बार मधेशियो के लिए कर्ण पीड़ादायी है कि प्राप्त उपलब्धि को बचाने के लिए चुनाव में जाना पड़ा है, यह बिल्कुल आधारहीन सा लगता है । ऐसा लगता है मानो उपेन्द्र जी अगर चुनाव में नहीं जाते तो नेपाल में राजतन्त्र का पुनःआगमन हो जाता । संघीयता समाप्त हो जाती, आदि । उपेन्द्र जी को कौन बतलाएगा कि नेपाल में अभी भी राजा का ही बोलबाला है, आन्तरिक रूप से और रहेगा । संघीय समाजवादी फोरम का गैरसंवैधानिक चुनाव में भाग लेना संघीयता के ऊपर काले बादल को मंडराने के लिए खुली छूट देने की तरह है । सोलह सूत्री संघीयता पर प्रहार था । हाल ही में जो बजट आया है यह संघीयता विरोधी बजट है । एकात्मक नेपाल में जिस तरह से बजट आता था उसी तरह का बजट इस बार भी आया है । जब दिन दहाड़े संघीयता पर कोड़ा मारा जा रहा है तो महज किस उपलब्धि को संस्थागत करने में लगे है ? बातें बहुत हैं । आज मधेश खून के आँसू रोने को विवश है । हारा हुआ सा महसूस कर रहा है आज सारा मधेश और इसके बहुत सारे कारणों में से एक है संघीय समाजवादी फोरम, नेपाल का गैरसंबैधानिक चुनाव में भाग लेना ।

आगे क्या ?

वैसे तो नव एकीकृत राजपा से थोड़ी बहुत उम्मीद थी कि वे अड़ान लेंगे संविधान संशोधन के मुद्दो पर परंतु सम्भावना अब उसका भी नहीं लग रहा है । मधेश कम से कम पचीस साल पीछे है अधिकार प्राप्ति के मामले में । राजपा भी मजबूरन चुनाव में जायगा ही और इसका सीधा फायदा मिलेगा कथित राष्ट्रीय पार्टियों को । हालाँकि इन दलाें में रहे मधेशी नेताओ को कोई फर्क नहीं पड़ता मधेश अधिकार सम्पन्न हो या न हो । बस पार्टी में प्रमोशन मिलते रहना चाहिए ।
मधेशी जनता की जज्बा पर प्रश्न उठाना क्रांतिकारी शक्तियों को नेस्तनाबूत करने जैसा होगा । परंतु एक सच्चाई है जो सभी को बोलना चाहिए । वह यह है कि, आखिर मधेशी जनता कब तक राष्ट्रीय पार्टियाें को अपना मूल्यवान वोट देता रहेगा जहाँ से आजतक न उन्हें किसी प्रकार का अधिकार प्राप्त हुआ न कुछ और ही । वैसे आज के दिनों में नेपाल की सारी पार्टियाँ मधेश को ठगती आ रही हैं । मधेशवादी दलों के द्वारा भी ठगी के सिवा कुछ प्राप्त नहीं हुआ । परंतु इस के आन्तरिक कारण को समझना होगा । आजतक मधेशवादी दलों को अच्छा बहुमत नहीं मिला है । संविधान सभा हो यायवस्थापिका संसद आजतक अच्छा खासा बहुमत न मिलने के कारण से भी मधेश का राजनीतिक शिकार होता आ रहा है ।
सच्चाइ यह है कि मधेश का मुद्दा अभी भी सतह पर ही है । आक्रोष की चिङ्गारी बुझी नहीं है । मधेशवादियाें को अपना एजेण्डा छोड़ने से या स्थाइ सत्ता के मधेश विरोधी प्रपंचो से छोटे समय के लिए देश को निकास मिलता हुआ दिख सकता है । परंतु मधेश नहीं हार सकता है । स्वराज का नारा आगे के दिनों में और ज्यादा गुञ्जायमान नहीं होगा, कहना मुश्किल है । शायर नीरज की चंद पंक्ति आज के सन्दर्भ में—
कुछ सपनों के मिट जाने से जीवन नहीं मरा करता है । दिपाें के बुझ जाने से आंगन नहीं बुझा करता है । चंद खिलोने खो जाने से बचपन नहीं मरा करता है और कुछ पानी के बह जाने से सावन नहीं मरा करता है

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