मसौदा और संचारकर्मी

नेपाल के संविधान २०७२ का प्रारम्भिक मसौदा अभी चर्चा में है । इस मसौदा के उपर तराई और कुछ पहाड़ी जिला में व्यापक विरोध हुआ है । मधेसी, आदिवासी÷जनजाति, महिला और दलित इस मसौदा पर अपनी असन्तुष्टि जता रहे हैं । मसौदा का विरोध करते हुए राप्रपा नेपाल पार्टी भी आन्दोलित है । इस मसौदा पर पक्ष और विपक्ष में काफी लोग खडे हो चुके हैं । इसी सन्दर्भ में हिमालिनी संवाद्दाता विनय कुमार ने मधेस के राजधानी केन्द्रित विभिन्न मीडिया सञ्चालकों का विचार जानने की कोशिश की ः–

Sitaram Agrahari

सीताराम अग्रहरी, सामना डट कम

यह मसौदा नालायकीपूर्ण, त्रुटिपुर्ण और अपूर्ण है । बहुसंख्यक नेपाली के हित में बिल्कुल नहीं है । इससे सिर्फ मधेसी ही नहीं बल्कि आदिवासी, जनजाति भी आहत हुए हंै । यह बदनीयत मानसिकता से लाया गया मूढ़तापूर्ण मसौदा है । इस का कोई तुक नहीं है, ये बेतुक का नाटक है । मसौदा का लेखन भी अपूर्ण और अधूरा रहा है । नेताओं मे अगर बुद्धि है तो इसे फिर से लिखें । समय बाकी ही है । मसौदा उपर के सुझाव संकलन के क्रम में मधेस ने व्यापक विरोध दिखा दिया है । केन्द्रीय नेता प्रचण्ड और माधव के ऊपर कुर्सी÷पत्थर प्रहार होने से भी मसौदा का अर्थ मालूम पड़ता है । मसौदा में मधेसी, आदिवासी÷जनजाति, दलित और मुस्लिम की भावना को नहीं समेटा गया है । इससे बहुंसंख्यक लोग आहत हैं । काठमाडौं में ही विभिन्न जातियों द्वारा विरोध होना एक ज्वलन्त उदाहरण है । अगर इस मसौदा को सुधारे बिना संविधान जारी हुआ तो नेपाल के लिए ठीक नहीं होगा । नेतागण संकुचित ढंग से सफल हो सकते हैं । बलपूर्वक संविधान तो जारी हो सकता है लेकिन यह टिकेगा नहीं । सब लोगों के अधिकार को नहीं समेटा गया है । इसका पुनर्लेखन करना अति आवश्यक है । –सीताराम अग्रहरी, सामना डट कम

Rajesh Ahiraj

राजेश अहिराज, मधेशवाणी सप्ताहिक

पहली बात यह है कि यह डाक्युमेन्ट दो अर्थ देता है । पहला, मसौदा मधेस में अलगाववादियों को बल पहुँचा रहा है । और दूसरा मधेस में मधेसी नेताओं का स्थान कितना है यह भी दिखाता है । मसौदा के भीतर के अंश से यह जाहिर होता है कि मधेस को हमेशा के लिए उपनिवेश बनाना है । मधेसी को करदाता और मतदाता के रूप में रखने के लिए एक राजनीतिक दस्तावेज के रूप में आया है । शासकों की शासकीय सोच का शाब्दिक रूपान्तरण है यह मसौदा । इस मसौदा से नेपाल में मधेस उपनिवेश है और रहेगा ऐसा सन्देश मिलता है । मधेसी जनता को राज्य से कोई सम्बन्ध नहीं है, अपनत्व नहीं है यह मेसेज दिया है । समानता और अपनत्व की भावना प्रत्याभूति नहीं हो सकती । मधेसी जनता को संघीयता और अधिकार न मिले, शासकों की यही मानसिकता प्रस्तुत हुई है । इस से मधेस में विखण्डन जन्म ले सकता है । मधेसी और पहाड़ी बीच का सामाजिक अन्तरद्वन्द्ध बढ़ेगा, मधेसी नेताओं के प्रति विश्वास घटेगा और अलगाववाद को सहयोग पहुँचेगा इस मसौदा से । – राजेश अहिराज, मधेशवाणी सप्ताहिक

नवीन झा, दलान डट कम

नवीन झा, दलान डट कम

मसौदा के विषय पर मेरी धारणा बहुत स्पष्ट है । मधेसी लगायत जितने सीमान्तकृत समुदाय है उस को सम्बोधन नहीं किया है । इस मसौदा से बने संविधान का कोई तुक नहीं है । इस में व्यापक परिमार्जन की जरुरत है संसोधन से भी नही होगा । अगर ऐसा नही हुआ तो देश के विभिन्न भाग में द्वन्द्ध जन्म ले सकता है । और इस मसौदा से कोई साकारात्मक सन्देश नहीं गया है । इस से सिर्फ मधेस में ही नहीं पूर्व के लिम्बुवान÷खुम्बुवान सहित की जगहों पर द्वन्द्ध होगा । काठमाडौं मे ही नेवार लोग विद्रोह कर सकते हैं । – नवीन झा, दलान डट कम

 

 

जनता के दिए सुझाव की ओर से देखा जाए तो मधेस की उपेक्षा कर के लाया गया है यह मसौदा । जनसंख्या राज्य का एक प्रमुख तत्व है । लेकिन इसका बहिष्कार किया गया है । समावेशी और समानुपातिक सिद्धान्त पर मसौदा तैयार होना चाहिये था । ब्राह्मणवादी सोच को निरन्तरता और हिन्दू राष्ट्र के मुद्दा को उठा कर २०४७ के प्रतिगामी शक्ति को लाना चाहते हंै । मसौदा में अल्पसंख्यक जातजाति की आवाज को सम्बोधित नहीं किया गया है । पुरानी बोतल में नयीं दारु रखकर मसौदा तैयार हुआ है और यह मान्य भी नहीं है । मधेस को उपेक्षित और बहिष्कृत किया गया है । देश को प्रतिगमन की ओर धकेला जा रहा है । – प्रकाश साह, इ–तराई डटकम

 

 

 

हृदयकान्त झा, अप्पण मिथिला

हृदयकान्त झा, अप्पण मिथिला

संविधान का जो मूलभूत विषयवस्तु है इस से बहुत ज्यादा बाहर का मसौदा आ चुका है । मेरा यह कहना है कि शासकीय स्वरूप में प्रत्यक्ष कार्यकारी प्रमुख होना था । इससे जनता का पूर्ण स्वामित्व होता । जनता अपने से एक कार्यकारी प्रधानमन्त्री को चयन कर सकती थी । मेरे विचार से यह पूर्ण प्रजातान्त्रिक होता । दूसरी बात नागरिकता के विषय को विशुद्ध रूप से विवादित बना दिया है । सत्तापक्ष की मानसिकता यह है कि तराई के लोग ज्यादा से ज्यादा भारत से सम्बन्धित हंै । और बेटी रोटी के सम्बन्ध से भारत के लोग नेपाल में आते है । इसलिए नागरिकता के विषय को झन्झटपूर्ण बनाया गया है और यह बहुत बडीÞ गम्भीर समस्या है । नेपाली मुल किस को कहा जाए ? सिक्किम, दार्जलिङ, भुटान मे रहने वाले नेपाली मुल के हो तो वो नागरिकता पा सकते हैं । मगर मधेस में जिसकी शक्ल युपी÷बिहारी जैसी हो वो नेपाली मूल के नहीं हो सकते हैं । नागरिकता में यह सबसे बड़ी समस्या है । इसका ठीक ढंग से व्याख्या होना चाहिये था । संघीयता में भी समस्या है । सत्तापक्ष की एकाग्र मानसिकता के कारण मधेसी लोग अपने अधिकार से वञ्चित हो रहे हंै । संघीयता समावेशी और सहभागितामुलक होना चाहिये । भाषा को भी स्थान देना होगा । इस मसौदा से मधेस में कोई सकारात्मक सन्देश नहीं गया है । मधेसी जनता उत्साहित नहीं है । मधेस में इससे कोई उपलब्धि भी दिखाई नहीं देती है । मधेस की सबसे बड़ी माँग थी ‘स्वायत्त मधेस’ । लेकिन सत्ता पक्ष के नेताओं ने इसको सम्बोधन नहीं किया है । – हृदयकान्त झा, अप्पण मिथिला

BP Sahमसौदा के विभिन्न धारा और विषय एक आपस मे विवादित हैं । चाहे नागरिकता के सवाल में हो चाहे संघीयता के सवाल में । यह असंवैधानिक मसौदा है क्योंकि संविधान की व्याख्या करने वाला सर्वोच्च अदालत के आदेशके विपरीत है । खासकर भविष्य में इस से मूलतः दो वर्गो मे प्रभाव पड़ रहा है । मधेसी और आदिवासी÷जनजाति । अन्तरीम संविधान का मूलमर्म समाप्त किया गया है इस मसौदा में । यह समावेशी के सिद्धान्त के विपरीत है । समावेशी के नाम में मधेसी आदिवासी विभिन्न खस आर्य के अधिकारों का हनन किया गया है । पिछडेÞ वर्गो के पक्ष मे बिल्कुल नहीं है । इस से मधेस से पहाड़ तक द्वन्द्ध सृजना हो सकती है । अधिकार से वंञ्चित लोगों को अगर और भी पीछे छोड़ा गया तो अवस्था एकदम भयानक होगी । मधेस के सवाल में यह मसौदा राष्ट्र को बिखण्डन की ओर रास्ता दिखा रहा है । पहला मधेस आन्दोलन, दूसरा मधेस आन्दोलन का मूलमर्म समग्र मधेस एक प्रदेश, आत्मनिर्णय का अधिकार था । दोनो मुद्दों को छोड़ा गया है । ठीक है थारु ने नहीं माना । थारु ने दो प्रदेश कहा । लेकिन खाका में जो पांच प्रदेश आया है । उस वक्त मधेस राजनीतिक, आर्थिक अवस्था में कमजोर होने पर मधेसी लोग निराश हो कर स्वतन्त्र मधेस के बात कर सकता है । सन् १९५० के सन्धि को मधेसी लोग जन्म दे सकता है की ? मुझे ऐसा लगता है की इस अवस्था से मधेस की स्थिति एकदम भयावहपूर्ण हो सकती है । – बीपी साह, हुलाकी न्युज
कामरेन्द्र बर्मा, युवा डट कम

कामरेन्द्र बर्मा, युवा डट कम

सबसे पहले चार दल द्वारा लाया गया मसौदा मधेस विरोधी है । आदिवासी÷जनजाति, दलित महिला सब के लिए यह मसौदा विरोधी है । भारत और नेपाल के बीच जो बेटी–रोटी का सम्बन्ध है उसपर सबसे बड़ा असर पड़ा है । नागरिकता के सवाल पर ‘पिता या माता’ होना चाहिये था । और जनता ने भी यही सुझाव दिया है । सब के लिए यह मसौदा विरोधी होने पर इस आधार से संविधान जारी नहीं होगा । विभिन्न जातजातियों द्वारा आन्दोलन का बिगुल भी फूँका जा चुका है । – कामरेन्द्र बर्मा, युवा डट कम

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