मस्ती और उमंगों का पर्व होली

रमेश झा:प्रकृति की लीलास्थली यह धरती वडÞी ही विचित्र है। खासकर आर्यावर्त खण्ड का हर मौसम उत्सव, पर्व और त्यौहार है। हर ऋतु में उत्सव है त्यौहार है। उनके पीछे जीवन दर्शन छिपा है, जीवन का दृष्टिकोण है। यहाँ का जनजीवन पर्वों के उल्लास, उमंग में प्रसन्न रहता है। इस उमंगमय जीवन को और मादकतापर्ूण्ा बनानेवाला पर्व है होली, जो समाज में समता और आनन्द की अनुभूति कराता है। इस पर्व से जीवन में एक उल्लासभरा परिवर्तन दिखाई देता है। जनमन एकाकार हो जाता है।
होली का पर्व तब मनाया जाता है, जब धरती फागुन महीने में बासन्ती ऋतु की मादकता से सराबोर हो उठती है। धरती का हर कोना रंगविरंगी लताओं, इन्द्रधनुषी जैसे विविध पुष्पों, कलियों, रेशम जैसे नवकिसलयों से सुसज्जित हो जनमानस को बरबस अपनी ओर खीच लेता है और भावुक मन संवेदनशील बन जाता है। इसीलिए तो होली का उत्सव बौराये मञ्जरियों के मदिर गंध, फाग गीतो के अल्हड स्वरों के बीच किस को फगुआने का मन नहीं चाहेगा। गाँवों की होली का ब्रज की रसिया और गाँव की गोरी का चोली दामन का रिश्ता है। वैसे तो होली का खेल हर क्षेत्र में अपने-अपने प्रकार से खेला जाता है, पर उद्देश्य एक ही होता है- वासन्ती ऋतु सनसनाती, मदहोस भरती मादकता से सराबोर हो जीवन को समरस बनाना।
वैसे तो होली स्थान विशेष के आधार पर भी प्रसिद्ध है। जैसे राजस्थान का व्यावर नगर रसीली और नखरीली होगी के लिए प्रसिद्ध है। व्यावर नगर जयपुर से जोधपुर जानेवाले मार्ग के बीच अवस्थित है। यहाँ के मोचियों की कोडÞामार होली बहुत प्रसिद्ध है। इस नगर में बसन्त पञ्चमी के दिन से ही अर्थात् १० दिन पहले से ही गेर नृत्य ढÞोल नगारो के डकों की चोट पर होने लगती है। गेर नृत्य १५-१६ व्यक्तियों के समूह में जमीन पर लेटकर, बैठकर किया जाता है, उस समय एक अद्भुत वातावरण उपस्थित हो जाता है। यह घूमर गेर-नृत्य पूरे राजस्थान में प्रसिद्ध है। इसी राजस्थान में सोटामार होली भी खूब प्रसिद्ध है। देवरों की दिल्लगी पर भाभी की रसभरी जैसी मुखाकृतियों पर लाल लाल होली की छटाएँ दर्शनीय हो जाती है। बीच-बीच में भाभी देवरों की पीठ पर सडाÞसडÞ कोडÞे सेकने का दृश्य अपर्ूव होता है। इसी व्यावर में बादशाही वीरबल की सवारी निकलती है। इसी सवारी के पीछे सम्राट अकबर के दरबार के नवरत्नों मंे एक रत्न थे राज टोडर मल, जो जाति से अग्रवाल थे। ये अकबर के कृपापात्र थे। कहाजाता है एक बार अकबर दलबल के साथ शिकार खेलने जंगल गए। घनघोर जंगल में शिकार के समय बादशाह -अकबर) को धन की जरुरत पडÞी। वहाँ उस समय कैसे  धन प्राप्त होता – उस समय कृपापात्र टोडर मल ने अपने चमत्कारी प्रयोग से उसे पूरा किया। साथ ही कई दर्ुलभ वस्तुएं उपलब्ध करायी। टोडरमल के चमत्कारिक गुण को देखकर राजा खुश हुए। खुश होकर सम्राट अकबर ने जिद की कि माँगों हम खुश है, इनाम माँगों। कहा- सुना जाता है कि नवरत्नों का सदस्य टोडरमल तीन घंटों या तीन दिनों के लिए अकबर की बादशाहत मांगी थी। जिसे अकबर ने पूरा किया था। तभी से यह बादशाही होली की सवारी निकलती है और तीन चार घण्टों तक रंगीली नशीली होली की धूम मचती है, जिस में बादशाह बीरवल के साथ साथ सम्मिलित सभी लोग शिव बूटी को जमकर पीते है और होली के तरंगों का लुफ्त उठाते है।
बादशाह होली के हुडÞदंगी भीडÞ पर गुलाल फेंकता रहता है। बादशाह द्वारा फेंका गया गुलाल -कुकुम) शुभकारक माना जाता है। लोग इसे पाने के लिए लालायित रहते हैं। सुना जाता है कि बादशाह के हाथ से जिसे गुलाल प्राप्त हो जाता है, वह अपने को धन्य समझता है। प्राप्त गुलाल को लोग सम्भाल कर सालभर अपने-अपने गुल्लक में रखते हैं। लोगों की मान्यता है कि ऐसा करने से लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। आधि-व्याधि दूर हो जाती है। परिवार में सुख, शान्ति र्छाई रहती है।
भारत की ब्रजभूमि की होली की अधिक महत्ता है। बज्रभूमि राधाकृष्ण की रंगीली होली के रंगो से लाल हो जाती है। वसन्त पञ्चमी से ही ब्रज भूमि में होली का रंग चढÞने लगता है। होली से १८ दिन पर्ूव ही राधारानी के मेले की शुरुवात हो जाती है। होली ५ दिन पर्ूव से ही बरसाना में ब्रहृमेश्वर पवर्त की चोटी पर अवस्थित लाडली -राधा) जी के मन्दिर में कुमकुम-गुलाल की होली होने लगती है। बरसाना जो राधारानी का गाँव है, यहाँ नगाडÞे ढÞोल-मजीरों पर ढÞाप मार-मार कर रसिया गीतों के साथ अनूठी लठ्ठमार होली की हुडÞदंग मचती है। यहाँ होली के आठ दिन बाद तक भी हुडÞदंगी होली चलती रहती है। यह पर्व लोक जीवन से अविच्छिन्न रुप से जुडÞा हुआ था। फागुनी बयार से पर्ूव ही जनमन पर होली की मस्ती का मदमस्त रंग छाने लगता था। पर आजकल लोक जीवन से जुडÞी होली पर्व भौतिकवादी विचार प्रधान युग में जनमानस से विछुडÞती जा रही है। यहाँ भी मस्ती का रंग कम हो गया है।
बुंदेल खण्ड की धरती तो सांस्कृतिक परम्पराओं की जीती जागती धरोहर है। यहाँ के पारंपरिक लोकगीत, लोकनृत्य, जनमानस को भरपूर आनन्द देने में र्समर्थ है। फाग के दिनों में बसन्त ऋतु जब अपने पूरी निखार पर होती है, तब यहाँ के किसान लोगों के पैर फागु -होली) के मस्ती भरे वातावरण में अपने आप थिरकने लगते हंै। फाग के दिनों में यहाँ का पारंपरिक लोकनृत्य ‘र्राई’ यहाँ के देहाती जीवन को मनोरंजनपर्ूण्ा बनाने में कोई ममी नहीं छोडÞता है।
मिथिलांचल की होली भी बहुत धूम मचानेवाली होती है। मिथिलांचल में होली की शुरुवात वसन्त पञ्चमी अर्थात् सरस्वती पूजा के दिन से ही हो जाती है। यहाँ के किसान अपने-अपने खेतों में परिश्रम के पसीने से उगाई गई गेहू, दलहन जैसे अनाजों को घर में लाकर मुग्ध रहते हैं। और फागुनी बयार से मस्त हो वसन्त पञ्चमी से लेकर फागुनी पूणिर्मा तक रात के सात बजे से लेकर नौ-दश बजे यानी तीन चार घण्टे प्रतिदिन समूह टोल नेगाडÞो पर धाप मारकर सुरीली आवाज में जोगिडÞा गाते हैं। इस जोगिडÞा में राधाश्याम की भक्ति तो रहती ही है, होली के हुडÞदंगी मनोरंजनपर्ूण्ा हास्य-व्यंग्य भी रहता है, जो सुनने में बडÞा आनन्द देता है। जनकपुर की होली भी बहुत प्रसिद्ध है। जनकपुर की होली फागु पूणिर्मा के दिन अन्तगृही परिक्रमा खत्म होने के एक दिन बाद होती है। होली के लोग डफली की ताल पर समूह में रंगों से सराबोर हो नाचते, उछलकूद करते हुए फागु गीत जोगिडÞा स र ˜˜˜ मस्ती में गाते हैं। हर तरफ मस्ती ही मस्ती दिखती है। मस्ती करते हुए इस प्रकार के गीत गाते हैं-
होरी खेले राम जनकपुर में, होरी खेले।
किनके हाथ कनक पिचकारी किन के हाथ अबीर झोरी
रामजीके हाथ कन पिचकारी सीता जी के हाथ अबीर झोरी
राजा जनक के राज भवन में अबीर गुलाल मचे होरी।
होली की मस्ती से लोक जीवन ही मस्त नहीं होते अपितु हिन्दी साहित्य एवं लोक साहित्य के कविगण मस्त हो अपनी अपनी कविताओं के द्वारा पाठक को आनन्दानुभूति कराते नहीं थकते हैं। कविगण अवश्य ही होली गाए अपनी अपनी कविताओं के माध्यम से ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ इस महामन्त्र के उद्देश्य को उद्भासित करते दिखाई देते हैं तो स्वयं कविमन इस महामन्त्र से प्रभावित हुए दीखते हैं। अनेक कवियों ने भक्ति से भरे हृदय से होली के पुनीत एवं मनोमुग्धकारी गीतों से अपने नायक-नायिकों को परस्पर होली खेलाकर अपने मनोगत भावों को व्यक्त किया है। बज्रभूमि के रसिक कवि सूर का निश्छल निष्कपट हृदय तभी तो गा उठता है-
श्याम-श्यामा खेले दोउ होरी।
फागु मच्यौं अति ब्रज की खोरी।।
मस्ती और उमंगों का पर्व होली में छेडÞछाड न हो, भंग का तरंग न उठे, परस्पर हास्य परिहास की बौछारें न हों तो होली का त्यौहार कैसा – चारों ओर ‘रंग बरसे भीगे चुनरवाली रंग बरसे’ वाली स्थिति पैदा हो जाती है। हरेक व्यक्ति का अर्न्तर्मन होली की मादकता से मस्त हो उठता है, शरीर का पोर-पोर अलौकिक आनन्द से झूम उठता है। होली की मादकता ने महाकवि बिहारी को भी नहीं छोडÞा। उनका अर्न्तर्मन मचल उठा और गाने लगे-
ज्यों ज्यों पटु झटकति हठति हँसति नचावति नैन।
त्यो त्यो निपट उदारहूँ फगुआ दैत बैन।।
काका हाथरसी कहते हैं-
नाचने क्लब में आ जाए कोई नमकीन हीरोइन
तो हेरोइन से भी दुगुना नशा छा जाए होली में
न होली में, न गोली में न उनकी व्यंग्य बोली में
ठहाकों का मजा पाओगे काका की ठिठोली में।

loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz