महंगी पडेगी नेपाल के प्रति उदासीनता

योगी आदित्यनाथ:पर्वतराज हिमालय की गोद में बसा लगभग तीन करोडÞ आबादी वाला संप्रभुता संपन्न नेपाल, जो सनातन हिंदू धर्म एवं संस्कृति के प्रति अटूट निष्ठा रखता रहा है, आज अपने ही देश के राजनेताओं के बुने जाल में फंसता दिखाई दे रहा है। आज से दस वर्षपर्ूव तक सबसे शांत एवं आध्यात्मिक प्रभाव से ओत-प्रोत रहा यह देश दुनिया के लिए कौतूहल और आर्श्चर्य का विषय हुआ करता था। न जाने किसकी आंखें इस शांत क्षेत्र को लगीं और आज यह विश्व का सबसे अशांत क्षेत्र होने की ओर तेजी से अग्रसर है।
नेपाल से मेरा भावनात्मक लगाव रहा है। और मेरा ही क्यों, भारत व दुनिया के समस्त हिंदुओं के हृदय में नेपाल का एक खास स्थान रहा है। उसके प्रति इसी भावनात्मक लगाव के कारण वहां की घटनाएं हमारे लिए पिछले १० वर्षसे चिंता का विषय हैं।
नेपाल की वर्तमान स्थिति को जानने के उद्देश्य से हाल ही में मैंने काठमांडू में प्रवास किया। प्रवास काल में मैंने वहां के विभिन्न संगठनों और सामान्य नागरिकों से मुलाकात की और प्रसिद्ध देव मंदिरों में दर्शन के लिए गया। एक अनिश्चितता और भविष्य के प्रति चिंता र्सवत्र दिखाई दे रही थी। दो बातें सामान्य थीं। पहली- भारत के प्रति भ्रामक प्रचार और भारत से ही उम्मीद। दूसरी- हिंदू पहचान के साथ ही राजतंत्र और लोकतंत्र को एक साथ लाने के लिए उतावलापन।
साम्यवादी प्रचार तंत्र ने आज हर नेपाली नागरिक को भारत के प्रति शक के घेरे में धकेल दिया है। नेपाल की हर छोटी-बडÞी घटना के साथ भारत को जोडÞना, माओवादी हिंसा के लिए भी भारत को दोषी ठहराना तथा माओवादियों द्वारा भी भारत विरोधी गतिविधियों को खुलेआम अंजाम देना नेपाल में रोजमर्रर्ााी घटना हो गई है। जिस किसी से भी बात हर्ुइ, वह अंत में एक ही बात कहता कि भारत अगर चाहे, तो नेपाल में स्थिति जल्दी सुधर सकती है।
पिछले छह वषर्ाें में नेपाल में स्थिति तेजी से बदली है। गरीबी और अशिक्षा का अभिशाप उसकी वर्तमान अराजकता का कारण तो बना ही था। माओवादियों के खुले संरक्षण में जब अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा वहां चर्च की मदद से धर्मातरण जोर पकडÞने लगा, तो पाकिस्तानी दूतावास ने जेहादी आतंकवाद के नए अड्डे के रुप में नेपाल को स्थापित करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी।
कुछ समय पर्ूव पाकिस्तानी दूतावास के एक कर्मचारी का जाली भारतीय करेंसी के साथ पकडÞा जाना, पिछले छह माह में नेपाल के रास्ते अकेले सुनौली बार्ँडर पर हिज्बुल मुजाहिदीन के ठद्द आतंकवादियों का अलग-अलग तिथियों में पकडÞा जाना, तेजी से बढÞ रही गैर हिंदुओं की संख्या, तर्राई क्षेत्र के हर जनपद में खुलेआम संचालित हो रहे’चाइना स्टडी सेंटर’ के माध्यम से तिब्बत की तर्ज पर नेपाल को हडÞपने का उतावलापन आदि तमाम ऐसी घटनाएं हैं, जिसने आज आम नेपाली नागरिक को सोचने के लिए मजबूर किया है। नेपाल में बातचीत के क्रम में एक वरिष्ठ राजनेता ने बताया कि सत्ता के संरक्षण में काठमांडू स्थित पाकिस्तानी दूतावास पाकिस्तान से आने वाले आतंकवादियों को न केवल प्रश्रय देता है, अपित’ उन्हें भारत-नेपाल बार्ँडर के मदरसों तक पहुंचाने की भी व्यवस्था करता है।
भारत-नेपाल बार्ँडर पर तेजी के साथ मदरसों के विस्तार में पाकिस्तानी दूतावास की बडÞी भूमिका है। इनकी रोजमर्रर्ााी जरुरतों को पूरा करने के लिए आईएसआई हर तरह की मदद करती है। चीन की रुचि भी नेपाल में अचानक नहीं बढÞी है। वह अपनी विस्तारवादी महत्वाकांक्षा के तहत कार्य कर रहा है। पिछले छह वषर्ाे में चीन ने नेपाल में जो पूंजी निवेश किया है और जिस तेजी के साथ वह नेपाल में घुसपैठ बना रहा है, वह भारत के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।
अभी तक जैसा भी हो, नेपाल अपनी सामान्य आवश्यकता के लिए भारत पर पूरी तरह निर्भर है। इस आवश्यकता की पर्ूर्ति उन १४ महत्वपर्ूण्ा केंद्रों के माध्यम से होती रही है, जो नेपाल को जोडÞते हैं। सभी केंद्रों को जोडÞने वाले सडÞक मार्गाे की दर्ुदशा से भारत की नेपाल के प्रति लापरवाही पूरी तरह प्रदर्शित हो जाती है। वहीं चीन पांच बडÞे अंतराष्ट्रीय राजमार्गाे से नेपाल को जोडÞने की तथा ल्हासा से काठमांडू-लुंबिनी रेल लाइन बिछाने की अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना को अंजाम देने के लिए मुस्तैद दिखाई दे रहा है।
दर्ुभाग्य से अगर चीन अपनी योजना में सफल हो गया, तो अपनी सामान्य आवश्यकता के लिए भारत पर नेपाल की निर्भरता पूरी तरह से समाप्त हो जाएगी। राजनीतिक अस्थिरता नेपाल में अराजकता का कारण बनता जा रहा है। आम उपभोक्ता वस्तुओं के मूल्य में भारी वृद्धि और उनका आम जनता की पहुंच से बाहर होते जाना नेपाली समाज को पुनर्विचार के लिए मजबूर कर रहा है। आम जन की चर्चा का विषय है नेपाल की हिंदू पहचान की पीडÞा, तो व्यवस्था से नाराज जनमानस भी लोकतंत्र के साथ-साथ राजतंत्र का हिमायती बनता नजर आ रहा है।
नेपाली कांग्रेस के संस्थापकों में से एक और वरिष्ठ राजनेता राम बाबू परर्साई ने बातचीत में बताया कि पिछले छह वषर्ाें में नेपाल में सभी प्रयोग विफल साबित हुए हैं। जब संविधान सभा नया संविधान निर्माण नहीं कर पाई है, तो ज्ञढढण् में बना संविधान तत्काल लागू होना ही चाहिए। यह अधिकतर लोगों की भावना है। वर्ष१९९० का संविधान चार महत्वपर्ूण्ा बातों के लिए जाना जाता रहा है। ये हैं-हिंदू राष्ट्र, हिंदू राजा, गोवंश की हत्या पर प्रतिबंध और धर्मातरण पर रोक। लेकिन इन सबके बावजूद वहां नेतृत्व का अभाव दिखाई देता है।
विदेश नीति के मोर्चे पर भारत की विफलता नेपाल में साफ-साफ दिखाई देती है। पडÞोस में चल रही गतिविधियों के प्रति अनजान बना भारत का वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व अपनी निष्त्रिmयता से भारत की पूरी उत्तरी सीमा को तो असुरक्षित कर ही रहा है, माओवादियों की आडÞ में भारत को नक्सली हिंसा की चपेट में भी जाने-अनजाने ले रहा है। भारत को नेपाल के सर्ंदर्भ में अपनी भूमिका को पुनस् परिभाषित करना ही होगा, वरना तेजी के साथ अंतरराष्ट्रीय ताकतों की कुत्सित मंशा का अखाडÞा बन रहा नेपाल भारत की सुरक्षा के लिए ही खतरा बन जाएगा।
-लेखक भारत के लोकसभा संसद सदस्य हैं)

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