महतो को मोर्चा से हटाने की कोशिश, तमरा को साथ नहीं लेना गैरजिम्मेदाराना है : श्वेता दीप्ति

आज मधेश का बच्चा–बच्चा बहुत शान से कहता है ‘जय मधेश’ । साथ ही युवा पीढ़ी अब खुद में नेतृत्व की क्षमता का विकास कर रही है क्योंकि, उनका विश्वास अपने नेताओं पर से उठता जा रहा है
श्वेता दीप्ति, काठमांडू , १० फरवरी |

काश किसी ने मधेश और मधेशियों के हित की बात सोची होती तो, आज जो आलम है वो नहीं होता । सबने सिर्फ और सिर्फ अपने स्वार्थ की राजनीति की है । गाँव–घर में एक कहावत कहते हैं, ‘खसी के जान जाय आ खवैया के स्वादे नय’ (बकरे की जान जाती है और खाने वालों को स्वाद ही नहीं) । नाकाबन्दी का पूरा असर भुगता है मधेश की जनता ने, अपने स्वजनों की मौत का दर्द झेला है मधेश की जनता ने और आज मधेशी जनता को मोहरा बनाकर सब सिर्फ अपनी सोच रहे हैं । आज जनता की परेशानियों को दरकिनार कर के नाकाबन्दी खुलने को प्रतिष्ठा का विषय बना लिया है मोर्चा ने । मधेशियों की जानें गईं, पिछले सात महीनों से उनकी आर्थिक अवस्था जर्जर होती चली गई, शिक्षण संस्थान बन्द होने की वजह से छात्रों पर जो असर पड़ा उसका खामियाजा कोई नहीं चुका सकता । जन जन उठ कर खड़ा था अपने अधिकार की लड़ाई में किन्तु नेतृत्वकर्ता अपनी अपनी स्थिति और कद को मजबूत करने के फिराक में लगे हुए थे । जिसका परिणाम आज की परिस्थितियाँ हैं ।

rajendra mahato

किन्तु दुखद तो यह है कि आज जो कदम मोर्चा ने उठाया है वह सिर्फ औरों को हँसने का मौका दे रहा है । आज जिस तरह सद्भावना अध्यक्ष महतो के विरुद्ध में मोर्चा गोलबन्द हो रही है उससे तो यही लग रहा है कि इन्हें बहुत पहले से इस मौके की तलाश थी जो आज हाथ आ गया है और उनकी यह हसरत मोर्चा की विज्ञप्ति में साफ दिख रहा है । यह सच है कि महतो की एक अभिव्यक्ति ने बीरगंज नाका को खोलने में मदद किया पर इसके पीछे वहाँ की जनता की मानसिकता को मोर्चा क्यों नजरअंदाज कर रही है ? आखिर कब तक बीरगंज की जनता नाकाबन्दी की मार को झेलती ? सात महीने कम तो नहीं होते इसमें मोर्चा की क्या उपलब्धि रही ? आज जिस तरह महतो के विरुद्ध में मोर्चा के अन्य नेता सामने आ रहे हैं क्या उन्हें पिछले सात महीनों में महतो द्वारा आन्दोलन के प्रति प्रतिबद्धता नजर नहीं आ रही ? जिस प्रतिबद्धता ने अन्य नेताओं की नींद उड़ा दी थी । जिसकी वजह से वो महतो के साथ एक मंच पर आना नहीं चाह रहे थे । उन्हें अपने कद का छोटा होना स्पष्ट दिख रहा था । यह तो जाहिर सी बात है कि बीरगंज नाकाबन्दी से देश को सिर्फ आर्थिक हानि हुई है राजधानी अपनी पूर्वगति से चलती रही क्योंकि, अन्य नाका सहज थे और कालाबाजारी पूर्णरूप से अपना आधिपत्य जमाए हुए था । हानि किसे हो रही थी राजधानी को या मधेश को ? स्पष्ट है कि यह मार सिर्फ मधेश झेल रहा था और सबसे अधिक बीरगंज की जनता और वहाँ के व्यवसायी । ऐसे में उनकी ओर से दवाब आना लाजिमी था कि नाका सुचारु हो । सीमापार से जो व्यवसायी सहयोग कर रहे थे अब वो भी पीछे हटने लगे थे । ऐसे में यह तो होना तय था ।

इन सब परिस्थितियों से परे आज मधेशी मोर्चा जो वक्तव्य या विज्ञप्ति जारी कर रही है यह गैरजिम्मेदाराना है । क्या उपेन्द्र यादव, महेन्द्र यादव या महन्थ ठाकुर यह नहीं देख पा रहे कि अगर मोर्चा से राजेन्द्र महतो निकलते हैं तो मोर्चा अपने अस्तित्व को खोने की कगार पर पहुँच जाएगा ? जिस नाकाबन्दी के खुल जाने को इन्होंने अपने प्रतिष्ठा का विषय बनाया हुआ है नाका खुलने के बाद वहाँ जाकर नाका पुनः बन्द कराने की आजमाइश में इन्हें आन्दोलन पर अपनी पकड़ का अन्दाजा बखूबी हो जाना चाहिए क्योंकि ये नाका एक घन्टे के लिए भी बन्द कराने में सफल नहीं हो पाए । मोर्चा की बैठक में जहाँ चारो पार्टी के अध्यक्ष मौजुद थे, जमकर महतो पर आरोप लगाए गए । जो आरोप लगाए गए और जिस तरह महतो को मधेश प्रवेश पर रोक लगाने की बात, या माफी मंगवाने की बात या फिर, मोर्चा से निष्कासन की बात ये कह रहे हैं उससे तो यही लगता है कि ये अपना तमाशा खुद बनाने की तैयारी में हैं । सद्भावना को मोर्चा से हटाने की कोशिश, तमरा को साथ लेकर न चलने की नीति यह सब मधेश केी वर्तमान परिस्थितियों के बिल्कुल विपरीत जा रही है । मौके की नजाकत या मधेश की नब्ज को ये नहीं समझ पा रहे हैं । जिस एक्यबद्धता की जरुरत मधेश को है उसे नकार कर ये आपस में ही फूट डालकर बँटने की तैयारी में हैं, जो निश्चय ही मधेश के हित में तो बिल्कुल ही नहीं है । यह कदम दूसरे पक्ष को चुटकी लेने के लिए और मधेश पर हँसने के लिए मसाला ही तेयार कर रहा है । मधेश में एक पूरा जनाधार महतो के साथ है और अब तो नाकाबन्द करने और उसे खुलवाने का श्रेय भी सद्भावना अध्यक्ष को जा रहा है जो मधेश की राजनीति और काठमान्डू की राजधानी में भी अपना महत्व बता रही है । हाँ एक गलती सद्भावना अध्यक्ष ने की अप्रत्याशित रूप से नाका खोलने की बात कह कर । उन्हें यह कहने से पहले मधेश की सम्पूर्ण जनता की मनोदशा को समझना चाहिए था । परन्तु स्थलगत सच तो यह भी है कि सिर्फ बीरगंज नाकाबन्दी क्यों अन्य नाका क्यों नहीं ? जब अन्य नाका से आपूर्ति सहज थी तो ऐसे में बीरगंज नाका के बन्द का भी क्या औचित्य ?

हर बार की तरह नेपाली मीडिया ने इस घटना को अपने तरीके से प्रचारित किया और मोर्चा के नेताओं के बीच महतो की स्थिति को लेकर भ्रम पैदा करने की पुरजोर प्रयास भी किया है जिसकी वजह से मोर्चा के अन्य घटकों में बैचेनी होना स्वाभाविक है । परन्तु मधेश की जनता अपने नताओं से एक परिपक्व राजनीति की अपेक्षा करती है जो मधेश की जनता को एक निष्कर्ष तक पहुँचा सके ।

वर्तमान परिस्थिति में मधेश की युवा पीढी उग्र भी है और निराश भी, साथ ही असमंजस में भी कि अब क्या होगा ? सबसे अहम सवाल है कि जब इतनी मौत और क्षति के बाद भी सत्ता ने मधेश की नहीं सुनी तो क्या नारा लगाकर और रैली निकालकर या लाठी जुलुस निकाल कर सत्ता के गलियारों तक मधेश अपनी आवाज पहुँचा पाएगा ? और जब अंततः यही होना था तो इतनी लम्बी लड़ाई का औचित्य क्या रहा ? इस दौरान अगर कुछ मधेश की जनता ने पाया तो यही कि, उन्होंने अपनी एक पहचान बनाई है विश्व के समक्ष । आज मधेश का बच्चा–बच्चा बहुत शान से कहता है ‘जय मधेश’ । साथ ही युवा पीढ़ी अब खुद में नेतृत्व की क्षमता का विकास कर रही है क्योंकि, उनका विश्वास अपने नेताओं पर से उठता जा रहा है । युवा अब खुद में ही नेतृत्व ढूँढेंगे क्योंकि जो चाह उनके अन्दर पनप गई है, या फिर मधेश के बच्चे ने जो देखा है वो अब इनके दिलो दिमाग से जाने वाला नहीं है यह तो तय है । वक्त लगेगा, पर आग बुझेगी नहीं क्योंकि, बुझती राख में भी जो चिंगारी दबी होती है आशियाना जलाने का ताव उसमें भी होता है ।

 

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