महत्वपर् कृतियां:डा. पुष्पलाल सिंह

हिन्दी आलोचना में २०१० का वर्षइलिए विशेष महत्व का माना जाता है कि आलोचना के शिखर-पुरुष डा. नामवर सिंह की इस वर्षतीन पुस्तकें एक साथ आयी है- एक लंंबी चुप्पी को तोडÞते हुए । डा. आशीषा त्रिपाठी के संपादन में ‘प्रेमचंद और भारतीय समाज’, ‘जमाने से दो-दो हाथ’ तथा ‘हिन्दी का गद्य पर्व’ प्रकाशित तीनों पुस्तकें नामवर जी के संबंध में प्रचलित इस मिथक को बुरी तरह भंजित करती है कि वे वाचिक परंपरा के आचार्य है । वस्तुतः ये पुस्तकें उनके गंभीर चिंतक से परिचित कराती है । प्रेमचंद और भारतीय समाज में उनके प्रेमचंद पर समय-समय पर लिखे गए निबंध और व्याख्यान संकलित हैं ।
‘जमाने से दो-दो हाथ’ पुस्तक में नामवर सिंह अपने समय की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा वैश्वीकरण की अनेक स्थितियों पर विचार करते हैं- सही अर्थो में अपने समय से मुठभेडÞ करते हैं । ‘हिन्दी का गर्द्यपर्व’ में नामवर गोल्डमान, रेमंड विलियम्स जैसे साहित्यिक-चिंतकों, हिन्दी नवजागरण, आचार्य शुक्ल के अवदान, आचार्य द्विवेदी के उपन्यासों का मूल्यांकन, शिवदान सिंह चौहन, शिवपूजन सहाय, रामविलास शर्मा, निर्मल वर्मा, भीष्म साहनी, राहुल सांकृत्यायन, सुमित्रानंदन पंत आदि महत्वपर्ूण्ा साहित्यकारों पर वे अपना अभिमत प्रस्तुत करते हैं ।
पिछले वर्षका अंत होते-होते नालंदा मुक्त विश्वविद्यालय का एक महत्वपर्ूण्ा प्रकाशन ‘भारतीय साहित्य की पहचान’ डा. सियाराम तिवारी के संपादन में आया है । जिसमें असमीया, उडिÞया, उर्दू, कन्नडÞ, कश्मीरी आदि सभी भारतीय भाषाओं के साथ संताली जैसी जन भाषा और नेपाली तथा सिंधी जैसी भाषाओं के साहित्य का परिचय २३ विद्वानों द्वारा दिया गया है । सभी स्थानीय विभिन्नताओं के बीच भारतीयता की पहचान का रेखांकन डाँ तिवारी ने अपने ‘भारतीय साहित्य की पहचान’ निबंध में किया है । कहना न होगा कि इस दिशा में एक महत्वपर्ूण्ा समायोजन है । ‘उत्तार समय में साहित्य’ वरिष्ठ आलोचक परमानंद श्रीवास्तव के समय-समय पर प्रकाशित लेखों का संग्रह है । जिसमें उत्तार औपनिवेशक समय में साहित्य, असंस्कृति और साहित्य, स्त्री-लेखन और स्त्री-विमर्श, हमारे समय में समीक्षा जैसी स्थितियों पर विचार किया गया है । राजेश जोशी अपनी ‘समकालीनता और साहित्य’ पुस्तक को एक कवि की दूसरी नोटबुक के रूप में प्रस्तुत करते है जिसमें कविता के साथ-साथ गद्य की कुछ पुस्तकों पर भी उनकी टिप्पणीयां संकलित है । ये आलेख-टिप्पणियां इस दृष्टि से महत्वपर्ूण्ा है कि ये आलोचना की उस प्रचलित लीक से अलग है । जिसमें ‘हल्का अधिक है, र्सार्थक विमर्श कम ।’
इन सबसे अलग प्रतिष्ठित कवि की बेलाग, बेबाक टिप्पणियां प्रभावित करती है, गोदान और कामायनी, त्रिलोचन, ‘उपन्यास और उपन्यास’, ‘हिन्दी उपन्यास की तलाश’, ‘कविता के नए प्रतिमान उर्फएक ग्रुप फोटोग्राफ और नामवर बनाम नामवर’, ‘राचरितमानस को पढेन के सुख और दुख’ उनके पठनीय निबंध है । ‘गल्फ का यथार्थः कथालोचन के आयाम’ सुवास कुमार की कथा-आलोचना की पुस्तक है । जिसमें कथा-समीक्षा में र्सार्थक ढंग से हस्तक्षेप करते हुए प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणु, हरिशंकर परर्साई, श्रीलाल शुक्ल, ज्ञानरंजन, गोविंद मिश्र, मिथलेश्वर आदि के कृतित्व का नए सिरे से मूल्यांकन किया गया है । पुष्पपाल सिंह ने ‘रवीन्द्रनाथ त्यागी’ विनिबंध में रवीन्द्रनाथ त्यागी के कृतित्व के सभी पक्षों का विश्लेषण किया है- इस बात पर बल देते हुए कि त्यागी जी न केवल हास्य-व्यंग्य के सशक्त लेखक हैं अपितु उतने ही श्रेष्ठ कवि हैं और उतने ही श्रेष्ठ आलोचक ।
इस वर्षभी नाट्य-समीक्षा में कुछ बहुत अच्छे कार्य प्रकाशित हुए हैं । वरिष्ठ समीक्षक मधुरेश ने लोकधर्मी नाटककार, हिन्दी और पारसी रंगमंच के बीच की सशक्त कडÞी ‘राधेश्याम कथावाचक’ पर इसी शर्ीष्ाक से इस नाटककार पर पहली बार बडÞे विस्तार से, उनके नाट्यर्-कर्म के सभी पक्षों पर, बहुत गहर्राई को विचार किया है । हिन्दी क्षेत्र में राधेश्याम जितने जनप्रिय रहे है, उन पर यह एक बहुत सुचिंतित पुस्तक है । डा. जयदेव तनेजा की ‘आधुनिक भारतीय नाट्य विमर्श’ पांच खंडों में नाटक और रंगमंच के संसार को समेटती एक महत्वपर्ूण्ा पुस्तक है जिसमें संस्कृत नाट्यकाल से लेकर इक्कीसवीं सदी तक के नाटककारों पर चर्चा की गयी है, उनके नाट्यकर्म के वैशिष्ट्य को लक्षित किया गया है । देवेन्द्र राज अंकुर दर्ीघ समय से रंगकर्म से जुडेÞ रहे हैं, अपने व्यापक अध्ययन, रंगमंच के सुदर्ीघ अनुभव और नाट्य-शास्त्र पर अपनी नयी सोच के आधार पर उन्होंने इस वर्षदो महत्वपर्ूण्ा ग्रन्थ नाट्यालोचन पर प्रस्तुत किए हैं- ‘दूसरे नाट्यशास्त्र की खोज’ तथा ‘सातवां रंग’ । ‘दूसरे नाट्य शास्त्र की खोज’ में वे भारतमुनि के नाट्य शास्त्र के सभी प्रतिपादनों पर गंभीर विश्लेषणा प्रस्तुत करते हुए उनमें समकालीन की दृष्टि से नयाँ जोडÞनेे का प्रयत्न भी करते हैं । ‘सातवां रंग’ उनकी रंगमंच, थियेटर पर केन्द्रित कृति है । रंगमंच के विविध पक्षों पर विचार करने के साथ-साथ विजय तेंदुलकर, हबीब तनबीर, जयदेव हट्टंगडी, मनोहरश्याम जोशी जैसे दिग्गजों के रंगर्-कर्म पर भी प्रकाश डाला गया है ।
विराम चिन्हों को लेकर भी वे विशेष नहीं हैं । विराम चिन्हों के गलत प्रयोग से व्यथित होकर महेन्द्र राजा जैन ने विराम चिन्हः क्यों और कैसे प्रस्तुत की है, जिसकी र्समर्पण पंक्ति ही पुस्तक का उद्देश्य स्पष्ट कर देती है, ‘उन सभी को/जिनकी रचनाएं पढकर/यह सब लिखना पडÞा ।’ ऐसी कृति को महज ‘छात्रोपयोगी’ के खाते में डाल कर दरकिनार नहीं किया जा सकता, न केवल लेखकों अपितु प्रत्येक ‘हिन्दी कर्मी’ के लिए यह पुस्तक दिशाबोधक है । आलोचना में अनुवाद कम ही होते हैं किन्तु इस वर्षडेविड एन. लाँरेजन की ‘निर्गुण संतों के स्वप्न’ पुस्तक आयी है । जिसके अनुवादक धीरेन्द्र बहादुर सिंह हैं । इस शोधपर्ूण्ा कृति में इस विदेशी विद्वान ने कबीर को समझने की एक र्सवथा नयी दृष्टि अपने गहन और व्यापक अध्ययन के आधार पर दी है, साथ ही अन्य संतों व समस्त भक्ति-साहित्य को नयी दृष्टि से खंगाला है । निश्चय ही यह कृति भक्ति-साहित्य के अध्ययन में एक महत्वपर्ूण्ा है । इस प्रकार डा. कमल सिंह की पुस्तक ‘आदिकालीन मानक हिन्दी और गोरखनाथ’ भी भक्ति-साहित्य के अध्ययन का एक नया क्षितिज उद्धाटित करती है । गोरखनाथ के कृतित्व पर यह दृष्टि बिल्कुल नयी है । स्त्री-विमर्श अब साहित्य में एक नया विभाग ही बन चुका है, प्रति वर्षबडÞी संख्या में इस विषय पर पुस्तकें लिखी और लिखायी जाती है । प्रकाशकों के लिए भी यह एक प्रीतिकर ‘उत्पाद’ है । इस वर्षचित्रा मद्गल की ‘तहखानों में बंद अक्स’ शरद सिंह की पत्ताओं में कैद औरतें’ गीताश्री की तथा ‘समय संवाद’ प्रकाशित हुए हैं ।
६३, केसरबाग, पटियाला -पंजाब)

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