महान विभूति आचार्यश्री महाश्रमण:कविता दास

कविता दास

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भारत की पवित्र वसुन्धरा ने महान सन्तों को जन्म दिया है । ऐसे ही एक दिव्य संत हैं आचार्यश्री महाश्रमण । अहिंसा यात्रा के प्रणेता आचार्यश्री उन महान संत विचारकों में से हैं जिन्होंने आत्मा के दर्शन को न केवल व्याख्यायित किया है बल्कि उसे आत्मसात् करते हुए जिया भी है । वे जन्मजात प्रतिभा के धनी, सूक्ष्मद्रष्टा, प्रौढ़ चिन्तक एवं कठोर पुरुषार्थी हैं । आपने इस धरा पर १३ मई १९६२ को राजस्थान के एक कस्बे सरदार शहर में अपनी आँखें खोली । ५मई १९७४ को दीक्षित हुए आचार्यश्री महाश्रमण अणुव्रत आन्दोलन के प्रवर्तक आचार्य श्री तुलसी एवं प्रेक्षा प्रणेता आचार्यश्री महाप्रज्ञ की परम्परा में तेरापंथ धर्मसंघ के ११वें आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित हुए । आपका बाह्य और आंतरिक व्यक्तित्व आकर्षक और महत्ता से परिपूर्ण है । आपके व्यक्तित्व में क्षमाशीलता, तेजस्विता, साधना और सिद्धान्तप्रियता का अद्भुत सम्मिश्रण है । आपके जनकल्याण की भावना को देखकर ही पेसिफिक युनिवर्सिटी ने आपको शांतिदूत तथा भारतवर्ष दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी ने श्रमण संस्कृति उद्गाता अलंकरण समर्पित किया है ।
आचार्य श्री महाश्रमण विहारचर्या इसिणं पसत्था इस आगमिक मंत्र को चरितार्थ कर जनकल्याण के लिए गाँवों, कस्बों, नगरों और महानगरों में पदयात्रा करते हुए नई जागृति का संचार किया है । आचार्यश्री एक उच्च कोटि के साधु हैं, संत हैं और विचारक हैं । आपने साधुता के उच्च मूल्यों को सदैव अपने अन्दर समाहित किया हुआ है । आपका जीवन वैयक्तिकता की अपेक्षा निर्वैयक्तिक अधिक है आप समाज के लिए हैं । तेरापंथ धर्मसंघ का कुशल नेतृत्व करते हुए आप हजारों की भीड़ में भी अद्भुत छटा बिखेरते हैं । आपने भारतीय ऋषि परम्परा का निर्वाह किया है । अनुकूल और प्रतिकूल दोनों परिस्थितियों में आपकी समत्व की भावना स्तुत्य है । Acharya_Mahashraman 2
आपकी वाणी में भी एक जादू है । आप एक ऐसे प्रवचनकार हैं जो अपनी शांत, मृदु और गम्भीर शैली से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते हैं । आपके प्रवचन का मूल आधार है जैन आगम । जैनागमों में निबद्ध किसी सूत्र अथवा श्लोक को केन्द्र में रखकर संस्कृत, प्राकृत के श्लोकों, हिन्दी काव्य रचनाओं, कथाओं आदि के माध्यम से विषय को सहज और सरल भाषा में प्रतिपादित करते हैं । आपके प्रवचन सर्वजनहिताय होते हैं । हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, जैन, बौद्ध आदि विभिन्न धर्मावलम्बियों ने आपके उपदेश को आदर के साथ स्वीकार किया है ।
देश के चारित्रिक उत्थान में आपका महत्वपूर्ण योगदान रहा है । आप एक साहित्य सर्जक भी हैं । हिन्दी, अँग्रेजी, संस्कृत, प्राकृत और राजस्थानी भाषा के आप विद्वान हैं । अपनी विद्वता से आप साहित्य जगत की भी अनवरत रूप से सेवा कर रहे हैं । आपके श्रमसाध्य सम्पादन से निष्पन्न जैन पारिभाषिक शब्दकोष विद्वतज्जगत को एम अमूल्य देन है । तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य प्रवर्तक आचार्य भिक्षु द्वारा राजस्थानी भाषा में प्रणीत ग्रन्थों के संरक्षण में अपनी महती भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं । मौलिक और नवीन विचारों से युक्त आचार्य श्री द्वारा रचित साहित्य पाठकवर्ग का सुदर पथदर्शन करता है ।
स्वस्थ और सुन्दर समाज की संरचना के लिए आचार्यश्री महाश्रमण सतत प्रयत्नशील हैं । स्वकल्याण के साथ पर कल्याण आपके जीवन का अभिन्न व्रत है । सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वासों और रुढ़ धार्मिक कर्मकाण्डों का आप हमेशा विरोध करते हैं । समाज में व्याप्त अस्पृश्यता, जातिवाद, धोखाधड़ी, नशा, दहेज, भ्रूण हत्या आदि विसंगतियों के परिष्कार के लिए आप अनवरत प्रयासरत हैं ।
संयम ही जीवन है के उद्घोष को मुखरित करने वाले अणुव्रत आन्दोलन का आचार्यश्री महाश्रमण अणुव्रत अनुशास्ता के रूप में कुशल नेतृत्व कर रहे हैं । साथ ही ध्यान की गहराइयों को छूने वाले प्रेक्षाध्यान पद्धति का आप सफल नेतृत्व कर रहे हैं । प्रेक्षाध्यान की मुख्य निष्पत्ति है— चित्त की शुद्धि । जीवन में सन्तुलन, आनन्द और शांति का अनुभव उपलब्ध कराने में प्रेक्षाध्यान अहम भूमिका निभाता है । मानसिक तनावों से मुक्ति, उर्जा के रूपान्तरण, चेतना के ऊध्र्वारोहण और एकाग्रता के विकास के लिए प्रेक्षाध्यान की उपयोगिता स्वयं सिद्ध हो जाती है ।
sssssशिक्षा के क्षेत्र में भी आपने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है । आचार्यश्री महाश्रमण के आध्यात्मिक अनुशासन में तेरापंथ समाज द्वारा अनेक समाजोपयोगी गतिविधियों में शिक्षा का प्रमुख स्थान है । आचार्यश्री जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय के अनुशास्ता के रूप में प्रतिष्ठित हैं ।
शांत एवं मृदु व्यवहार से संवृत्त, आकांक्षा स्पृहा से विरक्त एवं जनकल्याण के लिए समर्पित युवामनीषी आचार्यश्री महाश्रमण भारतीय संत परम्परा के गौरव पुरुष हैं ।

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