महाभारतकालीन बहुपति-प्रथा नेपाल में आज भी कायम

प्रस्तोताःरामाशीष:आपको प्रचीन हिन्दू ग्रन्थ महाभारत की कथा तो याद होगी । इसके साथ ही यह भी याद होगा कि पांचाली, अर्थात दु्रपद नरेश की बेटी द्रौपदी के पांच पति थे । उनके नाम थे- युधिष्ठिर, भीम, अजर्ुन, नकुल और सहदेव । ये पांचों भाई पांडव कहलाते थे । आखिर यह हुआ कैसे – महाभारत कथा के अनुसार पांचों भाई पांडव जब तेरह वर्षके वनवास में थे, उसी समय उन्हें राजा द्रुपद के दरबार में आयोजित राजकुमारी द्रौपदी के स्वयंवर समारोह की जानकारी मिली थी । पांचों भाई पांडव वनवासी के रूप में ही उक्त स्वयंवर में शामिल हुए थे । और, स्वयंवर की शर्ताे के अनुसार महाधनर्ुधारी अजर्ुन ने पानी में दिखती छाया को देखकर नाचती हर्ुइ मछली की आंखों को तीर का निशाना लगाकर, द्रौपदी को जीत लिया था । उसके बाद पांचों भाई राजकुमारी द्रौपदी के साथ अपने गुप्त निवास पर पहुंचे और भारी उत्साह में आकर अपनी माता कुन्ती को थोडÞी दूर से ही आवाज दिया, देखो मां यह क्या लाया हूं – मां, भोजन बना रही थी, इसलिए बिना पीछे देखे हुए ही कहा, पांचों भाई आपस में बांट लो । क्योंकि, उन्होंने समझा कि वन-जंगल से कोई फलफूल ही तो लाया होगा, जो वनवास के दौरान लगभग दिनचर्या बन चुकी थी । लेकिन, माता का उक्त आदेश, पांचों भाईयों के लिए बहुत ही भारी पडÞा था । उन्हें मां के मुंह से अनायास निकले वचन का पालन करने के लिए राजकुमारी द्रौपदी को पत्नी स्वीकारना पडÞा । इसी प्रकार द्रौपदी को भी पांचों पतियों के साथ पत्नर्ीधर्म का पालन करना पडÞा । ramashish
लेकिन, क्या आप विश्वास करेंगे कि उक्त बहुपति विवाह की प्रथा आज भी प्राचीन भारतवर्षके विभिन्न हिस्सों में जीवित है – बहुपति विवाह की प्रथा भारत के हिमंाचल प्रदेश के किन्नौर इलाके में आज भी जीवित है । यह इलाका चीन अधिकृत तिब्बत की सीमा से जुडÞा हुआ है । महाभारत की कथा के अनुसार पांचों भाई पांडव ने अपनी माता कुन्ती के साथ तेरहवें वर्षके गुप्तवास के दौरान इसी इलाके में निवास किया था । किन्नौर क्षेत्र के कुछ अल्पसंख्यक किन्नौरी अभी भी मानते हैं कि वे पांडवों के वंशज हैं । किन्नौरी समाज में आज भी एक ही पत्नी के चार-पांच पति भी हुआ करते हैं । किन्नौरियों का तो यहां तक दाबा है कि उन लोगों के बीच तो महाभारत काल के पहले से ही बहुपति विवाह की प्रथा कायम थी, जिसका वर्ण्र्ााखुद महाभारत में ही है ।
उक्त किन्नोरियों के अलावा बहुपति विवाह की प्रथा भारत के उत्तराखंड राज्य के जौनसार बावर क्षेत्र में भी जीवित है । बताते हैं कि यह प्रथा दक्षिणी कश्मीर के हिमालयी क्षेत्रों के कई जिलों में आज भी कायम है । लेकिन, बावर क्षेत्र की प्रथा के बारे में काफी अध्ययन हुए हैं । यही नहीं, दक्षिण भारत के भी कुछ आदिवासी-जनजाति समुदायों में यह प्रथा जारी है । उनमें नीलगिरि के टोडा, त्रावणकोर के नायर और मालावार हिल्स के इजहेर जातियों के नाम उल्लेखनीय हैं । लेकिन, क्या आप जानते हैं कि बहुपति विवाह की यह महाभारतकालीन प्रथा नेपाल में भी जीवित है – प्रस्तुत है नेपाल के ‘लामा समुदाय’ में कायम बहुपति विवाह प्रथा के जीते-जागते उदाहरणों के साथ एक रोचक रिपोर्ट जो पाठकों के लिए न केवल जानकारीमूलक होगा बल्कि यह एक मानसिक मंथन का विषय भी साबित होगा ।
उत्तरी नेपाल में, तिब्बती सीमा से लगे हिमाली क्षेत्र के हुम्ला जिले के बरगांव निवासी धर्म लामा तीन भाई हैं और उन तीनों भाईयों की केवल एक ही पत्नी हैं । तीनों भाईर्-धर्म लामा, बुद्धि लामा और नर्बु लामा, आपसी समझदारी एवं तालमेल बनाकर पत्नी के साथ ‘सहवास’ करते हैं । तदनुसार, सभी भाईयों को साल के चार-चार महीने पत्नी के साथ जीवन-यापन करने का, अर्थात् सहवास-सुख-भोगने का अवसर मिलता है । एक ही पत्नी, तीनों भाईयों को समान स्नेह, प्रेम, आलिंगन-चुम्बन और पत्नी सुख का आनंद बांटा करती हैंं ।
इस क्षेत्र में इस बहुपति प्रथा को स्वीकारनेवाला यह एक ही परिवार नहीं है । बाहरी दुनिया में अनूठा माने जानेवाली यह परम्परा हुम्ला के काफी अधिक संख्या में ‘लामा परिवारों’ में अभी भी कायम है । बहुपति प्रथा में सबसे बडÞा भाई जिस महिला की मांग में ‘टासी’ अर्थात् चंवरी गाय का घी -सिन्दूर की जगह) लगाकर, उससे विवाह करता है, उसे ही बांकी बचे सभी भाईयों को भी, पत्नी के रूप में स्वीकार करना पडÞता है । और, इसके साथ ही उक्त नवविवाहिता दुल्हन को बांकी बचे भाईयों को पति के रूप में सहर्षअंगीकार करना पडÞता है । यह बहुपति विवाह की परम्परा हुम्ला जिले के लामा समुदाय में अभी भी कायम है ।
बहुपति विवाह प्रथा का एक अपने ही किस्म का अलग संस्कार है । फिर भी, अन्य समुदायों में इसकी प्रथा की बहुत ही अधिक आलोचना-चर्चा चल जाने के बाद, धूमधाम के साथ इस प्रकार के विवाह करनेे की प्रथा वषर्ाें पहले समाप्त हो चुकी है । इस बात को पढÞे-लिखे लोग चुपचाप दबी जुबान में स्वीकार कर लिया करते हैं । क्योंकि वे अब भी इस बात को सीधे स्वीकार करने में शरमाते हैं । जबकि, बरगांव गांव विकास समिति -पंचायत) के पर्ूव अध्यक्ष पदम लामा गौरव के साथ कहते हैं- ‘हमें आखिर अपनी संस्कृति को स्वीकारने में कैसी लाज -‘
लामा जाति के लोग पहले भारी संख्या में भेडÞ-बकरियां और चंवरी गायें पाला करते थे । वे लोग ऊन और जडÞी-बूटी बेचने के लिए तिब्बत जाया करते थे । ऊन और जडÞी-बूटियों से वस्तु-विनिमय प्रणाली -बार्टर एक्सचेन्ज) द्वारा, अन्न और नून बदलने के लिए वे लोग नेपाल के अछाम जिले के नीचले और उपरी भैंसले तक भी पहुंचा करते थे । वहां उन लोगों के लिए सरकारी दस्तावेजों द्वारा प्रमाणित चारागाह क्षेत्र सुरक्षित है । -चंवरी गाय, बर्फीले क्षेत्र की एक प्रकार की दुधारू गाय है, जिसकी पूंछ में सफेद) काले और घने सुन्दर बाल होते हैं । मठ-मंदिरों, गुरूद्वारों और बौद्ध विहारों में, चांदी के हत्थें में मढÞी उन्हीं पूंछों की चंवर को मंद-मंद हिलाकर आराध्यदेवों की आरती उतारी जाती हं । मान्यता यह है कि खुद वह सुन्दर गोमाता, प्रसन्न होकर अपनी पूंछ से भगवान को पंंखे झल रही है) ।
पचपन वषर्ीय लामा बताते हैं विनिमय व्यापार के लिए एक भाई के तिब्बत पहुंचे होते थे तो दूसरे भाई भेडÞ-बकरियों को चराने के लिए अछाम । इसलिए भाइयों के बीच कभी भेंट ही नहीं होती थी । इस प्रकार व्यापार करनेवाले, मवेशियों के साथ जंगल जानेवाले और घर की देखरेख करनेवाले तीनों भाई अलग-अलग हुआ करते थे और तीनों भाइयों एक-आपस में कभी भेंटघाट भी नहीं हुआ करती थी । इसीलिए बहुपति प्रथा सहज थी । लेकिन, सन् १९९० के बाद जो सामुदायिक वन लगाने की अवधारणा आयी, उसके कारण चारागाह के अभाव में भेडÞ-बकरियों और चंवरी गायों को चराना मुश्किल हो गई । सामुदायिक वन के उपभोक्ताओं ने चरवाहों को जर्ुमाना करना शुरू कर दिया । पदम लामा बताते हैं भेडÞ-बकरियों को बेच देने के बाद सभी अपने घरों में रहने लगे और बेरोजगार हो जाने के बाद, पत्नी सहवास के लिए अब लाईन लगना पडÞता है । इसीलिए अलग-अलग पत्नी रखने की प्रथा की शुरूआत हर्ुइ ।
वह बताते हैं तब हमलोग शरद ऋतु -बर्फीले सीजन) में भारत के कश्मीर-श्रीनगर से मूंगा पत्थर लाया करते थे और उसे तिब्बत ले जाकर बेचा करते थे । पहाडÞ और तर्राई क्षेत्रों में जाकर जडÞी-बूटी से अन्न बदला करते थे । जबकि, अन्य भाई, घर की देखभाल करने के लिए घर में रहा करते थे । बहुपति प्रथा का सबसे अच्छा पक्ष तो यह था कि कभी भी आर्थिक संकट पैदा नहीं होता था । लगभग पचास वर्षपहले बरगांव में २४ घर थे जबकि आज ५२ घर परिवार हैं । वह भी, एक ही परिवार के दो-तीन घरों को जोडÞकर । ठीक इसके विपरीत बहुपति प्रथा नहीं माननेवाले ब्राहृमण-क्षेत्री, राजपूत परिवारों के, बरगांव से नीचे ठेहा गांव तक ४५० घर हो चुके हैं । बरगांव हुम्ला जिले का सम्पन्न गांव है तो दूसरी ओर ठेहे सबसे गरीब ।
बहुपति प्रथा के अनेक लाभ हैं, ऐसा बताते हैं गाविस -पंचायत) पर्ूव अध्यक्ष लामा । इस प्रथा को माननेवाले परिवारों में जमीन और जायदादों का बंटबारा नहीं होता । घर नहीं फूटता, मिलजुलकर रहने की संस्कृति बनती है । उनके कथनों का र्समर्थन करते हुए उनकी ५७ वषर्ीया पत्नी निमा यांगजुम बताती हैं – वास्तविकता तो यह है कि परिवार नियोजन ही लामा जाति की बहुपति प्रथा है । चार-पांच भाइयों को चार-पांच बेटे-बेटी हुआ करती हैं । न तो सम्पति का बटबारा करना पडÞता है और न ही झगडÞा-झंझट होता है ।
इसी बीच उच्च शिक्षा और स्वरोजगार पाए हुए कुछ युवकों ने व्रि्रोह कर अलग से विवाह भी किया है । फिर भी, लामा-बहुल गांवों में अभी भी बहुपति विवाह की प्रथा रुकी नहीं है । इसी दौरान बरगांव के नर्बु लामा और याम बहादुर लामा ने एक ही पत्नी को स्वीकारा है । इसी प्रकार लुन्डुप लामा और राया लामा की भी एक ही पत्नी है । लिमी उपत्यका के ४० वषर्ीय युवक कुनजुक छिमी लामा बताते हैं- मेरे एक भाई गुम्बा -बौद्ध मठ) को समर्पित हैं जबकि अन्य सभी भाईयों की एक ही पत्नी हैं । सब कुछ अच्छा-भला चल रहा है ।
बरगांव के ही सुनाम लामा ने व्रि्रोह कर अलग से विवाह कर लिया है । इस व्रि्रोह के कारण सुनाम, अपने परिवार से वहिष्कृत है । परम्परा तोडÞकर अलग पत्नी रखनेवाले, न तो पुश्तैनी सम्पत्ति में कोई हिस्सा पाते हैं और न ही पारिवारिक मिलन कार्यक्रमों के दौरान वे सम्मानित होते हैं ।
पदम अकेला बेटा है । इसलिए निमा यांग्जुम को बहुपति प्रथा नहीं स्वीकारनी पडÞी । उन लोगों के दो बेटे हैं, गोविन्द और काबु । गोविन्द का विवाह हो चुका है, उन्हें दो नाती भी हो चुके हैं । फिर भी पदम यह चाहता है कि छोटा बेटा होने के कारण, पत्नी के रूप में उसे स्वीकार कर ले । ‘मेरी इच्छा है छोटा बेटा उसे स्वीकार कर ले । क्योंकि यदि शौक-मौज के लिए शादी किया तो वह दुःख भोगेगा ।’ उन्होंने सुनाया- एक हाथ और एक कल्छी-छोलनी नहीं हर्ुइ तो औरतें आपस में नहीं मिलेंगी । परिवार टूट जाएगा और सम्पत्ति बांटी जाएगी ।
बहुपति प्रथा से व्रि्रोह कर अलग पत्नी रखनेवाले अधिकांश गांव के बाहर हैं । उनमें से लगभग एक दर्जन युवक अछाम में किराए का डÞेरा लेकर रह रहे हैं । व्रि्रोह करने वालों में अधिकांश सबसे छोटे भाई ही हैं । लेकिन, बरगा स्थित सिमटांग गांव के रिन्ची लामा अपवाद बन चुके हैं जिन्होंने परिवार के ज्येष्ठ सदस्य होने के बावजूद, खुद-ब-खुद व्रि्रोह किया है । परम्परागत ‘मांगी विवाह प्रणाली’ के द्वारा पत्नी के घर में लाने पर भी उन्होंने व्रि्रोह किया । दूसरा विवाह करने के बाद वह घर नहीं लौटे हैं । चार भाई होने पर भी बहुपति प्रथा की पत्नी इस समय केवल मंझले भाई के साथ रहती हंै ।
शिक्षित युवतियां बहुपति प्रथा नहीं स्वीकारतीं । जबकि, कुछ ने परम्परा का निर्वाह करते रहने तथा घर के फूटने-भांडÞने से बचाने के लिए, नहीं चाहते हुए भी, बहुपति विवाह को स्वीकार किया है । २२ वषर्ीया छिरिंग जंगम लामा बताती हैं कि बहुपति विवाह प्रथा, अपनी जाति का संस्कार होने पर भी, वह उसे स्वीकार नहीं करेंगी । इससे महिलाओं पर बहुत अधिक भार हो जाता है । वह बताती हैं घर का काम और बहुत सारे भाइयों की ‘यौन तृष्णा’ को मिटाना कठिन होता है । प्लस टू कक्षा में पढÞ रही लामा इस समय स्थानीय गैर सरकारी संस्था में सामाजिक परिचालिका हैं ।
बरगांव ७ की २१ वषर्ीया छपाल लामा की थोडÞी अलग ही सोच है । वह बताती हैं बहुपति प्रथा, चाहे अन्य जो भी समस्या क्यों न लाए, लेकिन इस प्रथा में महिलाओं को घर मालकिन बनाया जाता है, यह अच्छा लगता है । भाई-भाई को अलग नहीं होना पडÞता है । पूखार्ंे की सम्पत्ति का बंटबारा नहीं होता है । सभी की कमाई एक ही जगह आने के कारण आर्थिक व्यवस्था सुधरती है । वह बताती हैं- पुराना संस्कार है, इसके लाभ और हानि दोनों ही हैं । क्यामा लामा बताती हैं- बहुपति प्रथा के कारण महिलाएं शोषण में पडÞती हैं । जेटीए में अध्ययनरत क्यामा का मानना है कि बहुपति प्रथा के कारण महिलाओं को शारीरिक और मानसिक तनाव होता है । कई भाईयों को खुश-संतुष्ट रखने की बाध्यता एक ओर होती है तो दूसरी ओर उन्हें घर भी सम्हालना पडÞता है । वह बताती हैं- अपने नापसन्द व्यक्तियों को भी पति मानने की परम्परा, युगानुकूल नहीं है ।
सिमकोट, वार्ड नं. ८ बुरउसेकी गांव की बीस वषर्ीया जुमिकत लामा बहुपति विवाह को अच्छा नहीं मानती । मानसरोवर उच्च माध्यमिक विद्यालय की कक्षा १२ की छात्रा जुमिकत बहुविवाह प्रथा के विरुद्ध है । उसका कहना है अपनी इच्छा के विपरीत सभी भाइयों को अपना पति मानने की प्रथा, महिला अधिकार विरोधी है । राज्य को इसे रोकना चाहिए ।
बहुपति प्रथा में व्रि्रोह की शुरूआत विसं ५० की दशक के अन्त से शुरू हर्ुइ, ऐसा माना जाता है । सन् १९९१ के निर्वाचन में हुम्ला से निर्वाचित सांसद छक्क बहादुर लामा ने उसी के आसपास, १९९१ में प्रेम विवाह कर लिया । पांच भाई की पत्नी घर में रहते हुए भी उन्होंने एकल पत्नी को घर में प्रवेश कराया, जिस कारण वह भारी विवाद में फंसे । वह विवाह करने के बाद पढÞने गए । वह बताते हैं घर की श्रीमती अन्य भाइयों के साथ है । मैं ठहरा रमता जोगी । इसलिए बायोलाँजिकल नीड के कारण भी दूसरा विवाह करना पडÞा । मेरे छोटे भाई ने भी व्रि्रोह कर विवाह किया है । वह मानते हैं कि उच्च हिमाली क्षेत्र स्थित ‘कारावान’ अर्थतंत्र के कारण बहुपति प्रथा उपयुक्त रहने पर भी, आधुनिकता के साथ उसे भी हटाना चाहिए ।
बहुविवाह प्रथा के शोधकर्ता खिमु केसी बताते हैं- परम्परागत व्यापार प्रणाली और आर्थिक सामाजिक परिस्थिति के कारण लामा जाति में बहुपति प्रथा आज भी कायम है । हुम्ला में लामा समुदाय की जनसंख्या २४ प्रतिशत है । उनमें से ६० प्रतिशत निरक्षर हैं । इस समुदाय में अभी करीब १५ प्रतिशत विवाह ‘बहुपति प्रथा’ के अनुसार ही हुआ करता है । शिक्षा और आधुनिकीकरण के कारण इस प्रथा की नापसन्दगी के बावजूद पुरानी पीढÞी के दबाब के कारण, हुम्ला के लामा समुदाय में अभी और कुछ वषर्ाें तक बहुपति प्रथा का अस्तित्व कायम रहेगा, ऐसा शोधकर्ता केसी मानते हैं । वह बताते हैं- बहुपति प्रथा, काफी पुरानी संस्कृति है । लेकिन, पर-संस्कृति, चाहे जितनी भी क्यों न बढÞती जाए, गहरी जडÞोंवाली बहुपति विवाह प्रथा के हटने में अभी और कुछ वर्षलगेंगे
-सौजन्यः नेट/कां.पु.)

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