महाभूकम्पः शोक में डूबा देश

Baburam Paudel

बाबूराम पौड्याल

चौबीस अप्रैल २०१५ तकरीबन पौने बारह बजे नेपाल में आये विध्वंशकारी भूकम्प ने देश की सांस्कृतिक, भौतिक और आर्थिक बुनियाद को अन्दर से हिलाकर रख दिया । उसके बाद लगातार आए छोटे बड़े कई झट्कों ने कहर बरपाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ा । इस विपदा ने हजारों नेपालियों को दर्दनाक मौत की नींद सुला दिया, हजारों को बेघर, लावारिस और अंग–भंग कर दिया । सारा नेपाल शोकमग्न हो गया है । हिमाल, पहाड़ और तराई समूचा देश मर्माहत हो गया । दुनिया के हर कोने से इस पीड़ा पर मानवीय संवेदना जग उठी । सहयोग के लिए कई हाथ आगे आ रहे हैं ।
काठमांडू की सांस्कृतिक धरोहर भीमसेन स्तम्भ जैसे कई पुरातात्विक भवन, ऐतिहासिक मन्दिर और पवित्र स्थल देखते–ही–देखते मलवे में तब्दील हो गये । हिन्दु और बौद्ध मंदिरों के शहर के रूप में दुनियां में परिचित पर्यटकीय शहर काठमांडू को कुदरत ने अब कुरुप बना दिया है । पौराणिक काल से निरन्तर चली आ रही सांस्कृतिक विरासत की कई अहम् गवाह अब जमीनदोज हो गयीं है । अब काठमांडू को एक बार फिर दुनिया के सैलानियों को लुभानेवाले स्वरुप में लाने में और फिर से दूरुस्त बनाने में हम कामयाब हो पाऐंगे यह एक गंभीर सवाल बन गया है । अकेले काठमांडू की बात नहीं है, गोरखा जिले से पुरब के सभी पहाड़ी जिलों में भी भारी तबाही हूई है । भारी मात्रा में लोग हताहत हूए हैं । उसी अनूपात में आशियाने गिर गये हैं । दस साल लम्बा अथर््ातन्त्र को तहसनहस करता सशस्त्र द्वन्द और उसके बाद उतने ही समय तक चलती संक्रमणकालीन लम्बे राजनीतिक झगड़ और अस्थिरता से उब रहा नेपाली जनमानस इस हादसे की पीड़ा से कैसे उबर पाएगा, कहना कठिन है । प्रतिकूलताओं को झेल रहे नेपाल के लिए यह सचमुच एक और गहरा झट्का था ।
नेपाल ने इससे पहले भी कई बार भूकम्प की तबाही को झेला है । नेपाल एक प्राचीन भूखण्ड है और पौराणिक ग्रन्थों में इसके कई बयान Nepal_011 20nepalpic_2015_4_27_10215 19nepalpic_2015_4_27_10354 Nepal_004मिलते है फिर भी नेपाल का प्रमाणिक इतिहास लिच्छवी काल से शुरु होता है । इतिहास में मल्लकाल में काठमांडू के भूकम्प से प्रभावित होने का जिक्र मिलता है । इसका मतलब यह कतई नहीं है कि मल्लकाल से पहले इस क्षेत्र में कभी भी ऐसी विपदाएं नही आई ।
अभय मल्ल के राज्यकाल में १२५५ जून ७ के दिन आये विनाशकारी भूकम्प में बडेÞ तादाद में लोगों की मृत्यु हुई थी । जाहिर है तब काफी अन्य भौतिक नुकसान भी हुआ होगा । इसी तरह जयस्थिति मल्ल (१३८२–९५) द्वारा भूकम्प से हुई तबाही की ओर ध्यान देने का जिक्र इतिहास में आता है । इस प्रसंग से उनके राज्यकाल में भी भूकम्प की विनाशलीला का अन्दाजा लगाया जा सकता है । और जयप्रकाश मल्ल (ई.१७३६–६८) के शासनकाल में भी काठमांडू भूकम्प विपदाओं से आक्रान्त हो गया था । बताया जाता है जयप्रकाश मल्ल के गोरखा राज्य से पराजित होने में भूकम्प की क्षति भी एक कारण था । आधुनिक नेपाल में नरेश राजेन्द्रविक्रम शाह के शासन काल में २६ अगस्त १८३३ को नेपाल और भारत के बिहार राज्य में ८.० म्याग्नेच्यूट के भूकम्प ने बडे पैमाने विनाश किया । नेपाल के भक्तपुर में ज्यादा ही क्षति हुई थी । दुसरे ही साल जुलाई १८३४ में भी भूकम्प के दहशत का उल्लेख है । नेपाल में जंगबहादुर के समय ७ जुलाई १८६९ के दिन काठमांडू में ६.५ मेग्नेच्यूट के भूकम्प से कई घर गिर गये थे । राणा प्रधानमंत्री चन्द्रशमसेर के समय २८ अगस्त १९१६ को गये ७.७ मेग्नेच्युट के भूकम्प ने नेपाल और तिब्बत में भारी क्षति किया । इसी तरह सन् १९३४ जनवरी १५ तारीख को जब नेपाल के प्रधानमंत्री जुद्धशमसेर थे, उनके समय में भी ८.० मेग्नेच्यूट की महाविनाशकारी भूकम्प ने समूचे नेपाल ही नहीं तिब्बत और भारत के बिहार राज्य को भी बुरी तरह प्रभावित किया, विशेष कर काठमांडू को तबाह कर दिया और कई लोगों की जानें गईं । नेपाली संस्कृति के जानकार सत्यमोहन जोशी और राष्ट्रकवि माधवप्रसाद घिमिरे जैसे कई वयोवृद्ध नागरिक उस विपदा की आज भी बयान करते पाये जाते हैं । उस समय भी भूकम्प ने धरहरा के साथ–साथ अन्य कई घर, भवन और मन्दिरों को धराशायी कर दिया था । आंकड़ों के मुताबिक नेपाल भर १७ हजार ८ सौ ७१ लोगों की मौत हो गयी थी । घायल और जख्मी लोगों की संख्या ३ हजार ३ सौ ७९ बतायी गई थी । भौतिक क्षति में ३ लाख ३७ हजार ९ सौ ४६ घर नष्ट हो गये थे । तकरीबन डेढ महीने बाद राणा प्रधानमंत्री जुद्ध शमसेर ने टुँडिखेल मे लोगों को सम्बोधित करते हुये पीडि़तों के राहत के लिए पीडि़तोद्धारक संस्था का ऐलान किया । सरकार की ओर से लोगों को घर निर्माण के लिए बिना सूद के ऋण दिया गया था । बाद में ऋण से मुक्त भी कर दिया गया था । काठमांडू का घरहरा, घण्टाघर और पाटन का देगुतले, महाबौद्ध जैसे सांस्कृतिक अहमियत रखनेवाले मन्दिरों को सरकार ने जीर्णोद्धार करवाया था । नरेश महेन्द्र के शासनकाल में २७ जून १९६६ नेपाल और भारत के सीमा क्षेत्र में ६.३ मेग्नेच्यूट का भूकम्प के झट्के आये और दोनों तरफ कुल ८० लोगों ने जानें गंवायीं । सन् १९८० जुलाई २९ को आये ६.५ म्याग्नेच्युट के एक और भूचाल ने नेपाल और भारत के कुछ हिस्से को प्रभावित किया और २ सौ से अधिक लोगों की जानें लीं । काठमांडू और भारत के बिहार राज्य को बुरी तरह प्रभावित करनेवाला भूकम्प २० अगस्त १९८८ को आया जिसकी कम्पन ६.६ म्याग्नेच्युट था । उसमें कुल मिलाकर एक हजार से अधिक लोगों की जानें चली गईं थी और काठमांडू घाटी के अन्दर विशेषकर प्राचीन शहर भक्तपुर जिले को हिलाकर रख दिया था । कई लोगों की मौत हो गयी थी । इस बार के दिल दहला देनेवाले महाभूकम्प की क्षति का विवरण आना अभी बाकी है । इस तरह की कई प्राकृतिक विपदाओं से नेपाल जूझता ही आ रहा है । तकरीबन सताइस साल बाद इसबार भूकम्प के रूप में प्रकृति ने सारे नेपाल और उसके आसपास मौत और विनाश का कहर बरपाया ।
जानकारों का कहना है कि अक्सर पचास से सौ साल के अन्दर नेपाल और इसके आसपास का क्षेत्र विनाशकारी भूूकम्प के चपेट में आता रहा है । नेपाल और उसके आसपास में ऐसा क्यों हो रहा है, सवाल उठना स्वभाविक है । कहा जाता है कि हजारों साल पहले हिमालय क्षेत्र समन्दर का हिस्सा हुआ करता था । इस जल क्षेत्र को अब टेथिस सागर का नाम दिया गया है । भू–वैज्ञानिकों के मुताबिक इस क्षेत्र के भूगर्भ में उत्तर की युरेशियाई वा तिब्बती और भारतीय प्रायःद्वीप की चट्टानें मिलती हैं और दोनों के बीच आपस में टकराव व दबाव बना रहता है । जिसके चलते ये चट्टानें सालाना कुछ सेंटीमीटर आगे की ओर खिसकती है । नतीजा यह होता है कि भूगर्भ में भौगोलिक गतिविधियां सक्रिय रहती हैं । इसी सक्रियता के कारण टेथिस सागर का भू–सतह बीते किसी कालखण्ड में उपर उठा और हिमालय बना और टेथिस सागर का अस्तित्व ही समाप्त हो गया । भूगर्भ की सक्रियता इतने बड़े प्रलय को अन्जाम दे सकता है तो निश्चित है हम जोखिम भरे जमीन के वासी हैं अ‍ौर हमें सतर्कता बरतनी ही चाहिये । भूगर्भ की सक्रियता पर हम सिर्फ बातें कर सकते हैं । उसकी परिणति को भुगतने के अलावा मानव के पास दूसरा चारा नहीं है । एकबात और भी साफ हो जाती है कि हिमालय के आसपास की जमीन की संरचना नई और कमजोर भी है । इन सभी कारणों का मिलाजुला परिणाम जमीन पर, भूस्खलन और हिमालय क्षेत्र में हिमस्खलन, हिमतालों के फटने जैसे तमाम मानव प्रतिकूल विपदाओं का जन्म हो रहा है । हमारे वश में सिर्फ इतना है कि हम भूकम्प के दौरान क्षति न्यून करने के लिए जागरुक रहें और हमारे विकास को अनुकूल बनाएं । इसबार नेपाल में आई भूकम्प की तबाही इसी भौगोलिक सक्रियता और प्रतिकूल मानवीय सक्रियता जैसे तमाम नतीजों की अलग अलग कडि़यों में से एक है ।
इतने संवेदनशील भूखण्ड नेपाल, भारत, बंगलादेश, भूटान, बंगलादेश, म्यानमार, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान और चीन जैसे देशों को सावधानी बरतने की जरुरत तो बहूत पहले से है । परन्तु इस ओर सरकारें और योजनाकार ही नही आम लोगों ने भी बिल्कुल नजरअन्दाज किया है । सर पर लटकते खतरे की तलवार के बावजूद विपदाओं के बाद एक दो साल पश्चाताप करना फिर सबकूछ भुला देना ही हमारा काम बन गया है ।
नेपाल की राजधानी, पर्यटकों का चहेता शहर और संस्कृतिक विरासत से सम्पन्न मन्दिरों का शहर काठमांडू और इसके आसपास इसबार भारी तादाद में धनजन की क्षति हो चुकी है उसको कम करने में कहां चुक हुई है इस ओर भी थोड़ा सोचना उचित होगा । शासकों ने सभी अवसरों और सभी सेवाओं को अपने आसपास काठमांडू में ही सीमित कर सारे नेपालियों के लिए इस शहर को इकलौते गन्तव्य के रूप में विकास किया । पंचायत के जमाने में काठमांडू को जब देश के अन्य क्षेत्र के साथ सुगम सड़क संजाल से जोड़ा गया तब वहां की जनसंख्या में दिन दुनी रात चौगुनी वृद्धि होने लगी । इस प्रवृति में पंचायत के पतन के बाद और भी तीव्रता आई । भौगालिक क्षमता से बहुत अधिक लोगों का काठमांडू में जमावड़ा हो गया । नीतियों की खामियां देखिए, यह राजधानी शहर में तकरीबन अस्सी फीसद लोग अस्थाई तौर पर रहते है । रोजगार, व्यापार में संलग्न लोगों की गांव से शहर केन्द्रित मनोवृत्ति के कारण घर और ईमारतों का बनना स्वभाविक हो गया । बढ़ती आबादी को व्यवस्थित करने के लिए योजनाकार और सरकारों के पास कोई प्रभावकारी दृष्टिकोण का अभाव रहा । सड़क, पानी, पर्यवरण की सहज उपलब्धता और घरों और इमारतों का अनुगमन पर कोई ध्यान नहीं दिया गया । विकास के नाम पर ऊंचे अपार्टमेंन्टों को प्रोत्साहन दिया गया । काठमांडू की भौगोलिक स्थिति को देखते हुये यह शहर जितना ओभर पोपुलेटेड है उससे कहीं अधिक अव्यवस्थित भी है । यहां व्यवस्था नाम की कोई तदानूरुपता है ही नहीं । ऐसी बात नहीं की लोग इसके लिए आवाज नहीं उठाते हैं बल्कि उनकी आवाज को नजरअन्दाज कर दिया जाता है । नतीजा, बागमती नदी को एक नाली के रूप में तब्दील कर दिया गया । उसके स्वभाविक फैलाव को अतिक्रमण कर संकुचित कर दिया गया । बोरिङ के जरिए जमीन के अन्दर का स्वभाविक जल बड़ी तादाद में निकालकर जमीन को कमजोर किया गया । शहर में हरियाली, खुली जमीन की अहमियत को कभी समझने का प्रयास नही हुआ । क्या आनेवाले दिन में दिल दहला देनेवाली इस विपदा से सीख लेकर नेपाल और उसके पड़ोसी एक साथ आगे बढ़ पाएंगें ?
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