महिला शोषण रोकने के लिए सामाजिक परिवर्तन आवश्यक

करुणा झा:जब हवाई जहाज बनाने के लिए पहला कदम उठाया गया था, उस समय की सोच व विचारो का विश्लेषण करके हवाई जहाज तैयार किया गया था । जैसे-जैसे विचारो में वदलाव आते गए तो नये नये विचारांे की परिकल्पनाएं होती गई, परिणाम स्वरुप हवाई जहाज में भी नए-नए परिवर्तन आते चले गए ।
किसी भी समाज को उन्नति के शिखर र पहुँचाने के लिए पूरी आवादी को एकजूट होकर संर्घष्ा करना चाहिए । मगर हमारे समाज में आधी-आवादी -महिलाओं) कोर् इस संर्घष्ा में दूर रखा जाता है । जिसके परिणामस्वरुप बलवान पुुरुष वर्ग कमजोर स्त्री वर्ग का शोषण करने से नहीं हिचकते । यहाँ यह कहावत सिद्ध होती है कि पेन्सिल चुराते सात साल के बच्चे को अगर दण्ड न दिया जाय तो वह बडÞा होकर चोर डाकू वन जाता है । उसी प्रकार अगर महिलाओं का शोषण करने वालों को रोका नहीं गया और महिलाओं को मानसिक रुप से मजवूत नहीं किया गया तो घर की महिलाओं का शोषण करनेवाले के हौसले बढÞते चले जाते हैं । और वह चारदिवारी के वाहर भी अपने अनैतिक विचारो की मानसिकता फैलाने से नहीं हिचकते ।
एक ऐसे ही केस में चार-पाँच दरिन्दो ने मिलकर एक महिला की मदद से एक लडÞकी को कही बुलाया और हाथपांव वाधकर निर्वस्त्र कर उसके साथ बलात्कार करना चाहा । लेकिन उसकी महिला साथी ने समय पर पुलिस बुला ली और दरिन्दे पकडÞे गए । पुलिस ने वुरी तरह घायल लडकी को चादर से ढÞककर अस्पताल पहुँचाया । लेकिन उन दरिन्दों पर कारवाही नहीं हर्ुइ । कुछ दिन वाद आत्मग्लानी से लडÞकी मर गई ।
उस देश में बलात्कार पर हायतौवा मची हर्ुइ है, जहा हर ६ महीने में नौ देवियों का पर्व मनाकर, बेटियो को पूजा जाता है । जहाँ दर्ुगापूजा सबसे बडÞा पर्व होता है, उस देश में दिन प्रति दिन महिलाओं का बलात्कार होना, यह हमारी कैसी मानसिकता को दिखाता है –
हम अन्तरात्मा से पाखण्डी हैं । हमारे अनेक धार्मिक प्रतीक बलात्कारी थे । और हमने उन्हें भगवान मान लिया । हम धडल्ले से द्रौपदी, कुन्ती की वेदना को क्यों नहीं कभी उभार सके – जब कभी किसी महिला का शोषण करनेवाला बेनकाव होने लगा तो धर्म की आडÞ लेकर वह बच निकला । पहले के आदिम युद्धरत समाज में पुरुषों का दायित्व था कि वह अपने समाज की स्त्रियों को सुरक्षा दे और स्त्रियां समाज को सन्तति, सौर्न्दर्य और संस्कार देती थीं । धीरे-धीरे सभ्यता का विस्तार हुआ और युद्ध कम होते गए । लेकिन युद्धके समय हिंसा करनेवाले पुरुषों की मनोवृत्ति बाद में भी समाज में दिखने लगा । जिस के कारण पुरुष महिला को सुरक्षा देनेके बजाय उनका शोषण करने लगे । फिर धीरे-धीरे समय बीता, सामाजिक नियमों में परिर्वन हुआ । और पैसे लेकर देह बेचने वाले पुरुष-वेश्याए, यानी दहेज लेकर शादी करने वाले दूल्हे दिखाई देने लगे । पुरुष का पुरुषत्व इस प्रकार दिखने लगा । पर हर सामाजिक कुरूपता में सम्पर्ूण्ा समाज जिम्मेवार होता है, केवल पुरुष या स्त्री नहीं । पुरुष अगर बलात्कारी हो तो निश्चय ही पुरुष दोषी है । वात्स्यायन के कामसूत्र के तमाम समकालीन संस्करण से लेकर इंडिया टुडे और आउटलुक तक सभी देह ब्यापार से अपना बाजार तलाश रहे हैं ।
मिडिया, अखवार फेसवुक में भी पीडित का नाम उजागर कर हर कोई अपना व्यापार बढÞाने में लगा है । महिलाएं एक बार नहीं बार-बार बलात्कृत होती हंै । मरने के बाद भी आत्मा को चैन नहीं मिलता । मरने के बाद उसके परिवारवालों को भी घृणा की दृष्टिसे समाज देखा करता है । अगर हो सके तो पुरुष हर नारी में अपनी मा वहन और बेटी की छबी देखे तो कुछ सकारात्मक परिवर्तन आ सकता है ।

loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz