महिला सशक्तिकरणः आज की अपरिहार्य आवश्यकता

राधा कायस्थ:नेपाल के अन्तरिम संविधान २०६३ में महिला एवं पुरुष दोनों को समान स्वतन्त्रता एवं समानता का हक प्रदान किया गया है । परन्तु, सामाजिक परिवेश, प्रथा एवं संस्कार के चलते महिला समान रुप से आगे बढने में अर्समर्थ रही । परिणामस्वरुप राज्य संचालन एवं निर्ण्र्ाा तह में महिलाओं की सहभागिता न्यून ही रही । यद्यपि सभ्यता एवं समाज विकास क्रम मंे हरेक क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों के समान ही योगदान देती आ रही हैं । तथापि महिला होने के कारण ही सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, नागरिक एवं राजनीतिक क्षेत्रों में उनके साथ विभेद एवं असमानता पर्ूण्ा व्यवहार होता आ रहा है । अपने उत्तरदायित्व निर्वाह क्रम में स्रोत, साधन सूचना और कार्य स्वतन्त्रता में भी महिलाओं के ऊपर बन्देज लगाया गया । फलस्वरुप आज सबसे बडा गरीब, अशिक्षित समुदाय महिलाओं का ही है ।

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महिला सशक्तिकरणः आज की अपरिहार्य आवश्यकता

महिला सशक्तिकरण
सशक्तिकरण का अर्थ समता, आत्मबल का स्वाभिमान सम्पन्न बनना, स्वःस्फर्ुत रुप में सक्रिय सहभागिता की अवस्था है, जिसका अन्तिम लक्ष्य व्यक्तित्व विकास जिस में आत्म विश्वास बढÞाना, सामाजिक अन्तरक्रिया, स्ा्रोत-साधन बाँटने का निर्ण्र्ााकरने का अधिकार, कौन पेशा अवलम्बन करंे,  कैसे जीवन यापन करें, कैसे विषयों में स्वयं फैसला करना आदि । महिलावादियों के अनुसार निर्ण्र्ाा प्रक्रिया में महिला की पहुँच होना मात्र सशक्तिकरण नहीं है, बल्कि ये तो ऐसी वृहत प्रक्रिया है, जिसमें महिलाओं की आन्तरिक क्षमता अभिवृद्धि कर सामाजिक एवं राजनीतिक शक्ति केन्द्रो में उन की जगह बनाना है । महिला मुक्ति आन्दोलन पश्चात् विशेषतः सन् १९८० के बाद महिला सशक्तिकरण शब्द व्यापक रुप में आया है । यूर्एनईपीए रिपोर्ट-१९९७ के अनुसार नेपाल के सर्न्दर्भ में सशक्तिकरण के भीतर चार पक्ष समाहित हैं ।
अिार्थिक अवसर तथा स्रोत में महिला का पहुँच होना । जैसे रोजगार, भूमि, प्रविधि के साथ गैर आर्थिक स्रोत जैसे- शिक्षा, स्वास्थ्य, जो कि मानव विकास के अभिन्न अंग है ।
सिंगठन ऐक्यवद्धता एवं सामूहिक कार्य के माध्यम से, मिहला का राजनीतिक शक्ति अभिवृद्धि करना ।
ििवद्यमान सामाजिक, सांस्कृतिक, कुरीति विरुद्ध महिला में सचेतना का विकास करना ।
मिहिला के आत्म विश्वास को मजबूत बनाना ।
राष्ट्रिय अन्तर्रर्ाा्रय प्रतिवद्धता
नेपाल के अन्तरिम संविधान २०६३ के धारा १३ अनुसार लिंग के आधार में महिला पुरुष बीच भेदभाव न होना एवं महिला वर्ग के संरक्षण, विकास और सशक्तिकरण        के लिए विशेष कानूनी व्यवस्था कर सकने का प्रावधान रखा गया हो साथ ही सकारात्मक विभेद को राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्त एवं नीति में उल्लेख्य किया गया हो । जेष्ठ १६ गते का अन्तरिम व्यवस्थापिका संसद ने राज्य के सम्पर्ूण्ा क्षेत्र में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम से कम ३३ प्रतिशत रहने का प्रस्ताव पारित किया । वि.सं. २०५२ में महिला बाल बालिका तथा समाज कल्याण मन्त्रालय स्थापना पश्चात् ये मन्त्रालय, महिला विकास सम्बन्धी उच्च स्तरीय राष्ट्रिय  विन्दु के रुप में करते आ रहा है । राष्ट्रिय महिला आयोग -२००२) इत्यादि राष्ट्रिय सयंत्रों का निर्माण एवं परिचालन देश में महिला हकहित संरक्षण, सर्ंवर्द्धन तथा सशक्तिकरण में मन्थर गति से अपना योगदान देते आ रहे हैं । साथ ही विभिन्न अन्तर्रर्ााट्रय महासन्धि-१९७९, यूएनएससीआर-१९२५ एवं बेइजिङ घोषणा पत्र, बेइजिङ प्लेटफार्ँम आँफ एक्शन, सभी में महिला विरुद्ध भेदभाव उन्मूलन एवं महिला अधिकार सुरक्षा की प्रतिवद्धता जाहिर की जा चुकी है । इसके अतिरिक्त महिला आन्दोलनों एवं गैर सरकारी संघ-संस्थाओं ने ग्रासरुट स्तर में महिला सशक्तिकरण के लिए उल्लेखनीय कार्य किया है ।
नेपाल में महिलाओं की जनसंख्या, पुरुषों से ज्यादा है, तथापि विभिन्न क्षेत्रों में महिला सहभागिता अत्याधिक न्यून ही है । महिला जनसंख्या ५१.४४ प्रतिशत, पुरुष ४८.५६ प्रतिशत, आयु अनुपात महिला ५९.८० प्रतिशत, पुरुष ५९.३० प्रतिशत, शिक्षा में महिला ५१.४०, पुरुष ७२.२ प्रतिशत । परन्तु महिलाओं की अवस्था किसी भी क्षेत्र में संतोषप्रद नहीं है । महिलाएं आर्थिक क्रियाकलाप के विभिन्न पक्ष में योगदान करती आ रही हैं, परन्तु उनकी सम्भव्यता का मूल्यांकन नहीं किया जा सका है, शिक्षा तथा दक्षता के अभाव में महिलाएं बेरोजगार होने जैसी अवस्था है । ७० प्रतिशत से ज्यादा घरेूु काम महिलाएं ही करती है । लेकिन आर्थिक स्रोत में उन की पहुँच नहीं है । पुरुषों की तुलना में महिलाओं की अवस्था काफी कमजोर है । कुल जनसंख्या का आधा से ज्यादा संख्यां में रही महिला विकास के बिना देश का विकास सम्भव नहीं है । नेपाल में प्रतिव्यक्ति आय कम होने एवं व्यापक गरीबी होने में मुख्य कारण भी आर्थिक एवं राजनीतिक क्रियाकलाप में महिलाओं की संलग्नता कम होना ही हैं ।
महिला सशक्तिकरण में बाधक कारण
वास्तव में कानून द्वारा समान अधिकार प्राप्ति पश्चात् भी महिलाएं शक्ति एवं राजनीतिक केन्द्र से पीछे ही है । नीति निर्माण, निर्ण्र्ाा कार्यान्वयन में क्यों उनकी सहभागिता नहीं बढा – क्यों महिलाओं की स्थिति में इच्छित सुधार नहीं दिख रहा – क्या सच में महिलाएं आलंकारिक ही हैं – वर्ग, जाति, समुदाय, धर्म, सामन्तवादी व्यवहार, घर परिवार, समाज का पुरातन पंथी सोच और बहुत से प्रमुख निर्ण्र्ााें में महिला के सलाह की आवश्यकता महसूस न होना तथा महिला का पुरुष प्रभावकारिता से बाहर नहीं निकल सकना भी है । इस के विभिन्न कारण हैं-
जिागरुकता की कमी
सिामाजिक, आर्थिक सशक्तिकरण की कमी
रिाजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी
किमजोर कार्यान्वयन पक्ष
लिंैगिक संस्कृति का विकास न होना ।
इन्ही विभिन्न कारणों से महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में इच्छित प्रतिफल नहीं दिख रहा है । परन्तु कारण जो भी रहा हो, महिला सशक्तिकरण एवं लैंगिक समानता ही महिलाओं को सक्रिय विकास के मूलधार में ला सकती है । इसके लिए महिला पुरुष बीच शक्ति संतुलन भी आवश्यक दिखता है ।
आवश्यक प्रयास
महिलाओं की सशक्त स्थिति के लिए र्सवप्रथम महिला शिक्षा मे विशेष जोडÞ देना चाहिए । क्योंकि शिक्षा के माध्यम से एक ओर चेतना अभिवृद्धि एवं दूसरी ओर महिलाओं को विकास निर्माण कार्य में सहभागिता कराते हुए उनकी आर्थिक अवस्था में क्रमिक सुधार लाया जा सकता है । और इस सम्बन्ध में राष्ट्रिय स्तर में ही ठोस निर्ण्र्ाालेना आवश्यक है । साथ ही राष्ट्रिय रुप में महिला विषयक विद्यमान असमान कानुनों का संशोधन अथावा नया कानून निर्माण, महिला हक अधिकार सम्बन्ध में ज्यादा आर्थिक सहयोग उपलब्ध करवाना, कम खर्च में प्रभावकारी एवं उत्पादनशीलन कार्यक्रमों का संचालन, लैंगिक समाता सम्बन्ध में जनचेतना अभिवृद्धि करना भी नितान्त आवश्यक है । समाज की मूल मान्यता में सकारात्मक परिवर्तन एवं सकारात्मक सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक, राजनीतिक सशक्तिकरण द्वारा ही ज्यादा से ज्यादा महिलाएं राजनीति में आ सकती हैं । परन्तु इसके लिए सबसे महत्वपर्ूण्ा औजार शिक्षा एवं आर्थिक स्वयं निर्भरता ही है । जिससे महिला वर्ग को दक्ष, सक्षम, सशक्त प्रतिस्पर्धावान, विभिन्न समस्या खासकर राजनीतिक समस्या सधान करने में सफल बन सके । उदाहरणस्वरुप भारत में ग्राम पंचायत में ३३ प्रतिशत आरक्षण, महिलाओं की सहभागिता बढÞाने में सफल रहा है ।
निष्कर्षनिष्कर्षके रुप में कहा जा सकता है कि कुछ हद तक महिलाएं अपनी पराम्परिक भूमिका से रुपान्तरण के क्रम में हैं । एक सकारात्मक परिवर्तन दिख रहा है, लेकिन वास्तव में महिलाओं की स्थिति में पर्ूण्ा सुधार तभी होगा, जब महिला स्वयं अपना विकास करने में सक्षम हों और प्रत्येक अवसर को पकडÞकर पहले से ज्यादा, सशक्त, सक्षम हो आगे बढÞने का प्रयास करे । आज आधुनिक टेक्नोलोजी के युग में महिलाओं का पिछडÞापन देश विकास की गति को पीछे धकेलना है ।
आज तक, महिलाएं, आर्थिक एवं शैक्षिक रुप से कितना भी सक्षम क्यों न हो, उन्हें कहीं न कहीं विभेद का शिकार बनाया जाता रहा है, अतः महिला शसक्तिकरण का सबसे उपर्युक्त कसौटी वो होगी, जिस में महिलाएं अपने मुल्य-मान्यता अनुकूल स्वयं नीति निर्माण, उसकी व्यख्या एवं कार्यान्वयन करने, करवाने में सफल हो सकें ।

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