महिला सशक्तिकरणः एक प्रश्न: साध्वी पुष्यप्रभा

महिलाओं का विकास सब को अभीष्ट है । क्योंकि वह सब के विकास की मूलभूत बुनियाद है । महिला एक ऐसा शब्द है, जो अपने भीतर अनेक रूपों को समाहित किए हुए है । एक महिला माँ, बेटी, बहन, पत्नी आदि अनेक रूपों में अपने दायित्व का निर्वहन कर रही है । शिक्षा व संस्कारों की आवश्यकता पुरुष के लिए जितनी है, उससे कई गुना ज्यादा स्त्री के लिए है । एक चीनी कहावत है– पुरुष को शिक्षित करो तो एक व्यक्ति शिक्षित होता है । एक स्त्री को शिक्षित करो तो पूरा वंश शिक्षित होता है । लेकिन क्या महिला सशक्तिकरण की ओर बढ़ते चरण वास्तव  में उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं ?
महिला सशक्तिकरणः बढते चरण
यदि इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों को पलटते हैं तो ज्ञान होता है कि महिला सशक्तिकरण का कार्य वास्तव में भगवन त्रप्षभ के युग से ही प्रारम्भ हो गया था । भगवान त्रप्षभ ने अपनी दोनों बेटियों (ब्राह्नी व सुन्दरी) को क्रमशः लिपिकला व अंकविधा में निपुण बनाया । मध्ययुग में महिला समाज की स्थिति काफी दयनीय हो गई । पर्दा प्रथा, सती प्रथा, दहेज प्रथा आदि अनेक सामाजिक कुरीतियों ने नारी के विकास को अवरुद्ध कर दिया । समय–समय पर अनेक समाज सुधारक हुए, जिसके प्रयास से महिला को घर की चार दिवारी से बाहर कदम रखने का अवसर मिला । बीसवीं सदी के उत्तराद्र्ध में नारी शिक्षा को प्रोत्साहन मिला और कन्याओं को विद्यालयों, महाविद्यालयों में पढ़ने की छूट प्राप्त हो गई । सन् १९७५ का वर्ष अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष के रूप में मनाया गया । डेनमार्क, केन्या, मास्को आदि देशों में समय–समय पर अनेक महिला सम्मेलन हुए । परिणामस्वरूप समाज में महिलाओं को पुरुषों के समकक्ष दर्जा दिया जाने लगा और अनेक नए क्षेत्रों में उनका प्रवेश हो गया । वर्तमान परिप्रेक्ष्य में महिलाओं के कार्यक्षेत्र पर दृष्टिपात किया जाए तो ऐसा लगता है कि कोई भी क्षेत्र महिलाओं के कर्तव्य से अछूता नहीं है ।
भारत सरकार द्वारा भी महिला समाज को सशक्त बनाने के लिए अनेक योजनाएँ बनाई जाती हैं । उनके लिए निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान है । सरकारी कार्यालयों में महिलाओं के लिए अनेक सीटें आरक्षित रहती हैं । यहाँ तक कि देश के प्रधानमन्त्री व राष्ट्रपति के पद पर भी महिलाओं का कर्र्तृत्व उजागर हो चुका है ।
क्या यही है महिला सशक्तिकरण ?
एक भारतीय मां की ममता का एक रूप यह है कि वह अपने विकलांग, विक्षिप्त और बीमार बच्चे का आखिरी सांस तक पालन करती है । वही भारतीय मां अपने अजन्में अबोध भ्रुण को अपनी सहमति से समाप्त कर देती है । सिर्फ इसलिए कि वह एक लड़की है । क्या यही है महिला सशक्तिकरण ?
एक ओर नारी सशक्तिकरण के नारे, दूसरी ओर पोस्टरों, पत्र–पत्रिकाओं और विज्ञापनों में नारी देह की अश्लील प्रस्तुति अपनी सीमाओं को पार कर रही है । फिल्म निर्माता अपनी फिल्म को हिट करने के लिए, पत्रकार अपनी पत्र–पत्रिकाओं को मांग् को बढ़ाने के लिए और वस्तु–निर्माता अपनी वस्तु की ओर उपभोक्ताओं का ध्यान आकर्षित करने के लि नारी देह का उपयोग करते हैं । उससे भी अधिक चिन्तनीय है, महिलाओं द्वारा आवंछनीय प्रवृत्तियों में सहभागी बनना । महिला समाज को सशक्त बनाने के बावजूद देश में बढ़ते हुए बलात्कारों की संख्या बताती है कि महिला कहीं सुरक्षित नहीं है । दिन हो या रात, एकान्त हो या सार्वजनिक स्थान, यत्रतत्र ऐसे हादसे होते रहते हैं ।
आज समाज का सबसे विचारणीय पहलू है– ‘पारिवारिक विघटन ।’ सहिष्णुता व सामञ्जस्य के अभाव में संयुक्त परिवार का स्थान एकल परिवार ने ले लिया है । जिससे एक ही परिवार के लोग दुःख–दर्द में एक–दूसरे का सहयोग नहीं कर पाते । बच्चों को संस्कार देने वाले दादा–दादी अपने पोते–पोतियों का चेहरा देखने के लिए तरसते रह जाते हैं । संस्कारों के अभाव में बच्चों में अपराध चेतना जागृत हो रही है और आतंकवादियों में आत्मघाती महिलाओं की उपस्थिति क्या सन्देश देती है ? समाज की इन सारी स्थितियों को देखते हुए क्या वास्तव में लगता है कि महिला समाज पूर्णतया सशक्त है ?
मूल्यों का जागरण बनाम महिला सशक्तिकरण
टी.वी. इन्टरनेट और मोबाइल के इस युग में महिला समाज बाहर से जितना सशक्त लग रहा है, संस्कारों व मूल्यों के अभाव में भीतर से उतना ही खोखला होता जा रहा है । मूल्यों का संकट किसी एक प्रान्त, शहर या वर्ग में नहीं बल्कि पूरी मानव जाति इसे भोग रही है । जीवन में मूल्यों की प्रतिष्ठा के द्वारा ही सही, मायने में महिला सशक्तिकरण के अभियान को सफल बनाया जा सकता है । सफल महिला समाज को आवश्यकता है–
–    वह उपभोगवाद की संस्कृति से बाहर निकलकर संग्रह वृत्ति को नियंत्रित करे ।
–     प्रदर्शनप्रियता से ऊपर उठकर आत्माभिमुख बनाने का प्रयत्न करे ।
–    अनाग्रही वृत्ति को विकसित करे ।
–     सहिष्णुता, विनम्रता र सकारात्मक सोच को आत्मसात करे ।
केवल बाहरी टिपटोप सशक्तिकरण का आधार नहीं है । बाहरी विकास के साथ–साथ आन्तरिक विकास के सन्तुलित विकास के द्वारा ही कोई स्त्री स्वयं की नई पहचान दे सकती है । तथा शिक्षा और संस्कार दोनों दृष्टियों से सशक्त होकर अपने परिवार, समाज व राष्ट्र के लिए कुछ काम कर सकती है ।

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