महिला हिंसाः सभ्यता पर कलंक

पुष्पा ठाकुर:महिला हिंसा के बढÞते क्रम को किस प्रकार अंकुश लगाते हुए न्यूनीकरण कर एक सुरक्षित और सभ्य समाज में रहने की अनुभूति महिलाओं को हो इस विषय में गम्भीरता से पहल करना वर्तमान अवस्था की आवश्यकता है। परन्तु, विडम्बना यह है कि महिलाओं के विरुद्ध हो रहे अमानवीय हिंसात्मक क्रियाओं के प्रति स्वयं को समाज के उत्थान के लिए अग्रणी माननेवाले यह सोचकर उदासीन एवं संकर्ीण्ा मानसिकता का पर््रदर्शन कर रहे हैं कि यह तो महिलाओं का विषय है, अतः इसके लिए महिलाएँ ही जो करना है सो करें। women crime nepal
समाज का दृष्टिकोण हिंसा पीडित महिलाओं के प्रति नकारात्मक है, जिसके परिणामस्वरुप जघन्य अपराध बलात्कार जैसे कुकृत्य करनेवाले पुरुष कर्ीर् इज्जत तो बरकरार मानी जाती है पर बलात्कृत महिला की इज्जत लूट गई, ऐसा कहा जाता है। यह कैसी मानसिकता है, जिस में अपराधी को लज्जा नहीं होती बरन् पीडित की ‘लाज’ दाँव पर लगती है – क्या यही है हमारी सभ्यता –
इतिहास साक्षी है- जब सीता को अग्निपरीक्षा से गुजरना पडÞा, द्रौपदी का वस्त्र हरण हुआ, और अहिल्या छली गई तब भीषण अकाल पडÞा, महाभारत का संग्राम हुआ और न सिर्फदोषी को दण्ड मिला, बरन् ऐसे कुकृत्य में सम्मिलित एवं सहयोगियों का विनाश हुआ। र्
वर्तमान में न सिर्फएक विन्दु ठाकुर जली है, न सिर्फएक सीता र्राई छली गई है और नहीं सिर्फकिसी एक नाबालिग, किशोरी, या वृद्धा का चीर-हरण हुआ है। आज अनगिनत महिलाएँ बच्ची से लेकर वृद्धा तक अपने घर-आंगन, खेत-खलिहान, हाट-बाजार स्कूल कार्यालय कहीं भी यौन पिपासुओ के कहर से सुरक्षित नहीं है। क्या हमें इन हिंसक अमानवीय कुकृत्यों का कारण या जड की पहचान कर उन्हें खत्म करने के लिए अग्रसर नहीं होना चाहिए या फिर इंतजार करना चाहिए कि महिलाएं अपने साथ हो रहे इन हिंसा रुपी राक्षसी प्रवृत्ति का खात्मा करने के लिए दर्ुगा या फिर काली का स्वरुप धारण करें या फिर अपनी कोख में पुरुष वर्ग को धारण करने से ही इनकार कर दें। और सृष्टि का सन्तुलन ही बिगडÞ जाय – स्त्री-पुरुषों के सहअस्तित्व एवं सहकार्य से ही सृष्टि का संचार चलता आ रहा है। प्रकृति प्रदत्त गुणों का सदुपयोग एवं उपभोग करते हुए ही हम अपनी सभ्यता को उच्च सोपान पर अग्रसर कर सकते हैं। प्रकृति हमें नग्न रुप में ही जगत में प्रवेश कराती है। परन्तु संस्कृति हमें उस नग्नता का पर््रदर्शन करने से रोकती है।
हम संक्रमणकाल से गुजर रहे हैं। संक्रमण राजनीतिक ही नहीं वरन सामाजिक रुपान्तरण का भी है। पुुराना जीवन दर्शन, जीवन शैली, जीवन व्यवस्था आदि तेजी से टूटते जा रहे हैं। परन्तु उनके स्थान पर नया जीवनर्-दर्शन, नई जीवन शैली, नये जीवन मूल्य और नई जीवन व्यवस्था नहीं ले पाये हैं। समाज न पारम्परिक रहा और न पर्ूण्ातः आधुनिक ही बन सका है। परिवर्तन का जिस तेजी से विघटन हुआ है, उससे युवा वर्ग रोजगारहीन, शिक्षित, अर्धशिक्षित, अशिक्षित रोजगार की तलाश में दिशाहीन भटकते हुए अपराध एवं हिंसा के दलदल में फँसते जा रहे हैं। दशकों के द्वन्द्व में दण्डहीनता के संस्कार ने समाज में आपराधिक प्रवृत्ति को बढÞावा दिया है, जिसका शिकार महिलाएं हो रही हैं। समाज में व्याप्त उच्छृखलता, हिंस्रक प्रवृत्ति एवं अनैतिकता के बढÞ रहे प्रकोप का कोई एक कारण नहीं है, अपितु इसके अनेक कारक तत्व हैं।
आर्थिक युग के बढÞते प्रभाव, अपनी कार्य दक्षता से परिवार, समाज एवं देश के लिए कुछ करने का जज्बा, व्यक्तित्व निखारने एवं स्थापित करने का जोश इत्यादि कारणों से महिलाएं आज घर की चारदिवारी से बाहर निकल रही हैं। इक्कीसवीं सदी की महिलाएं घर बारह की जिम्मेवारी निभाने के लिए अग्रसर तो हर्ुइ हैं, परन्तु पितृसत्तात्मक सोच से ग्रसित समाज इसे स्वीकारने के लिए तैयार नहीं है। समाज के द्वारा माहिलाओं के घर से बाहर निकलते कदम को सहज रुप से स्वीकार नहीं करना और दोहरी जिम्मेवारी बहन करनेवाली महिलाओं के प्रति अनुदार होना, इनसे तो महिलाएं जूझ ही रही हैं साथ ही घर के बच्चे भी माता-पिता के द्वारा पर्याप्त समय नहीं मिलने के फलस्वरुप उपेक्षित ही नहीं दिशाविहीन भी हो रहे हैं। घर में आधुनिक सुख-साधनों का उपयोग कितना और किस तरह से बच्चो के द्वारा हो रहा है, या बच्चों की समस्याएं क्या हंै, इनके लिए अभिभावकों के पास समय का अभाव अबोध मस्तिष्क के भटकाव के कारणों मे से एक है। विद्यालयों में भी र्सार्थक नैतिक शिक्षा पाठ्यक्रम में समावेश नहीं है और न ही शिक्षकों के आचरण एवं व्यवहार में ही इसके महत्त्व का पर््रदर्शन होता है ! कोरा किताबी ज्ञान शिक्षित तो करता है पर संस्कार नहीं दे पाता। किशोर अवस्था के कारण मानसिक और शारीरिक रुप से हो रहे परिवर्तन को समझने के लिए, सही-गलत आचरण एवं सही मार्गदर्शन के लिए न तो आज की व्यस्त जिंदगी में अभिभावक के पास समय होता है, और न विद्यालयों में काउंसलिंग की व्यवस्था होती है। ऐसे में कुलत, गलत संगत या अनैतिक कार्यों में संलग्न होने के खतरे तो होगें ही, अतः बच्चों को इनसे बचाने की जिम्मेदारी बडÞों की ही होती है। आये दिन किशोर अवस्था के बच्चे बलात्कारी या बलात्कृत होने की घटनाएँ इन्ही कारणों के फलस्वरुप हैं।
अक्सर पुरुष वर्ग महिलाओं के ऊपर हो रहे इन घटनाओं के लिए उनके आधुनिक भेष-भूषा को जिम्मेवार मानते हैं, जबकि यह सरासर गलत है। यहाँ उत्तेजक भेष-भूषा का पर््रदर्शन उचित नहीं परन्तु भेष-भूषा के कारण ही महिलाएं बलात्कृत होती हैं, जलाई जाती हैं या ‘डÞायन’ जैसी संज्ञा से प्रताडिÞत की जाती हैं, ऐसा नहीं है। ऐसा करनेवाला आपराधिक प्रवृत्ति, मानसिक असन्तुलन या संस्कारविहीन होता है। अतः महिलाओं के लिए इन दकियानूसी तर्कहीन शब्दों का प्रयोग बन्द करना चाहिए। महिलाएं घर की चारदिवारी से निकली हैं तो स्वयं, परिवार, समाज एवं देश की प्रगति के लिए। अतः महिलाओं के प्रगतिशील कदम के लिए सुरक्षित पथ प्रदान करने के लिए उपायों को अपनाना ही आज की आवश्यकता है।
मन के विकारों को विवेक द्वारा लगाम लगाना जब अपर्याप्त हो तो कानून के शिंकजे को कसना ही श्रेयस्कर होगा।
शेष ३२ पेज में
शमहिला हिंसा से सम्बन्धित कानूनों का परिमार्जन, संशोधन एवं आवश्यकता अनुकूल नये कानून का निर्माण के साथ कार्यान्वयन पक्ष का सुधार करने की नितान्त आवश्यकता है। महिला अधिकारकर्मी के द्वारा पीडित महिलाओं को न्याय दिलाने एवं महिला हिंसा के दोषियों को कानूनी दायरे में लाकर कडÞा से कडÞा दण्डसजाय दिलाने के लिए निरन्तर संर्घष्ा के कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। तथा आज की आवश्यकता को देखते हुए कानून आयोग ने भी कानूनविद्, मानव अधिकारकर्मी, राष्ट्रिय महिला आयोग, युएन वूमन, तथा नागरिक समाज एवं इस विषय में गम्भिरतापर्ूवक कार्य करनेवाले कुछ राजनीतिज्ञों के साथ विचार-विमर्श करते हुए कहां, क्या और किस तरह के कानून में संशोधन, परिमार्जन एवं निर्माण करना है, इसके लिए कार्य शुरु किया है, यह सरहानीय कदम है।
महिला हिंसा के अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण किसी भी प्रकार से नहीं दिया जाए। इसके लिए पहल करते हुए अन्तरपार्टर्ीीहिला संजाल की अगुवाई में गठित संयुक्त संर्घष्ा समिति सत्ता में शामिल राजनीतिक दलों एवं सत्ता से बाहर के राजनीतिक दलों के अध्यक्षों से लिखित प्रतिवद्धता लेने का कार्य कर रही है। महिलाएं संगठित हो रही हैं, अपने ऊपर होनेवाले हिंसा का प्रतिकार करने के लिए और विवेकशील पुरुष भी उन के इस अभियान में उनका साथ दे रहे हैं क्योंकि ऐसे पुरुष यह मानते हैं कि यत्र नार्यस्तु पुज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता ः।
देश तभी समृद्ध होगा, जब महिला हिंसा का न्यूनीकरण करते हुए हम अपनी ऊर्जा को विकास की दिशा में प्रयोग करेंगे, अपनी शक्ति, पुरुषार्थ को किसी महिला के दमन में प्रयोग के बदले समाज को उन्नत बनाने में लगाएंगे।

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