मां लक्ष्मी से खास अन्तर्वार्ता

बैठे ठाले मुझे सूझा इस दीपावली के अवसर पर क्यों न माँ लक्ष्मी जी से कुछ बातचीत कर ली जाए। एक बहुत बडेÞ ठेकेदार से माता जी का ‘हँट लाइन’ भी मिल गया। मैंने नम्बर ठोक दिया। माँ लक्ष्मी से मेरी क्या बातचीत हर्इ, उसे आप भी जान लें। क्योंकि कहा जाता है, दोस्तों से माल और हकीमों से हाल नहीं छुपाना चाहिए। इस दर्ुलभ अन्तरवार्ता को आप भी जरुर पढेÞं। यह आप के आर्थिक सेहत के लिए फायदेमन्द हो सकता है। कहीं दीपावली के रोज लक्ष्मीजी ने पूछ दिया, तुमने मेरी अन्तरवार्तार् हिमालिनी में पढी थी – तो क्या उस वक्त आप लक्ष्मीबाहन की तरह मुंह लटकाए खडे रहेंगे –
अन्तरवार्ता कुछ ऐसी रही ः-
माँ- हेलो ! नर्कलोक से किसने मुझे याद किया – -ऊपरवाले लोकों में हमारे इस मर्त्यलोक को नर्क लोक ही कहते हैं।)
हिमालिनी- माते ! क्षमा करें ! कुसमय में कष्ट दिया ! मैं हिमालिनी मासिक से उसका एक क्षुद्र सेवक मुकुन्द आचार्य बोल रहा हूँ। मेरे द्वारा पूछे गए प्रश्नों का सरल संक्षिप्त उत्तर देने की कृपा करें, माते !
माँ- अच्छा, तो तुम मेरी अन्तरवार्ता लेने की धृष्टता कर रहे हो – आज लक्ष्मीपूजा होने से जाओं  तुम्हें माफ किया। प्रश्न पूछो और मैं जो उत्तर दूंगी उसर्ेर् इमानदारी से छापना। अपनी ओर से नमक मर्ीच न लगाना। कुछ भी गडबड की तो इस जनम में तो मैं ने तुम्हारी ओर देखा ही नहीं, दूसरे जनम में भी ठेंगा दिखा दूंगी। जरा सम्भलकर बेटा।
हिमालिनी- वैसा अपराध मैं कदापि न करुंगा, हे नारायण प्रिये ! सागरपुत्री माते ! मेरा पहला प्रश्न ये रहा, धनी रातों रात और धनी हो रहे हैं और गरीब दिन भर मेहनत करके भी दिनों दिन गरीब ही हो रहे हैं ! आप का यह कैसा जादू है माता –
माँ- यह प्रश्न राजनीतिर्-अर्थनीति दोनों से जुड हुआ है। इसका उत्तर तो बहुत पहले से, कार्लमार्क्स, माओत्सेतुंग, एडम स्मिथ, अनेक देशों के अर्थशास्त्री जो ‘नोबेल प्राइज से सम्मानित होते रहते हैं- सबों ने अपनी-अपनी बुद्धि अनुसार दिया ही है। मैं दूसरों के मामले में दखल नहीं देना चाहती। अलबत्ता एक बात मैं आगाह कर देना चाहती हूँ। लोगों ने राजनीति और अर्थनीति दो नीतियों को तो पकडÞ लिया लेकिन धर्मनीति को बिल्कुल भुला दिया। यह बहुत बडÞी बेहूदगी हैं।
हिमालिनी- हे विश्वविजयिनी माते ! आपने हमारे प्रधानमन्त्री की तरह बडÞी सस्ती सवारी पसन्द की है। पेट्रोलियम की महंगी से या … –
माँ- देखों बेटे ! मैं जिसे अपना स्नेह प्रदान करती हूँ, पहले उसे उल्लू बना देती हूँ। फिर उस पर अपनी सवारी गांठती हूँ। उल्लू खुद अपने लिए शिकार कर लेता है। मुझे कोई टेन्सन नहीं रहता। हाँ, उसकी आँखें बडÞी डरावनी होती हैं। मगर उसकी आँखों में एक सन्देश छुपा है। लोग कुछ सीखना ही नहीं चाहते तो मैं क्या करुँ –
हिमालिनी ः वो क्या माते –
माँ- जो किसी से नहीं डरता-न कानून से, न धर्म से, न लोक लज्जा से और न उल्लू की आँखों से, वैसे ही वीर मुझे प्राप्त कर सकते हैं। मेरी सवारी यही सन्देश देती है। इस बात का मतलव तुम ऐसे भी निकाल सकते हो। जो मेरे लिए मानवता परित्याग कर पर्ूण्ा उल्लूपन स्वीकार कर ले, उसके त्याग की कदर करते हुए मैं उसे अपना लेती हूँ। उसे मेरी कृपादृष्टि मिल जाती है !
हिमालिनी- माँ ऐसा नहीं हो सकता – आप सभी को एक ही पैकेज में धनी-मानी सुखी सम्पन्न बना दें तो क्या हर्ज है – र्सर्वे भवन्तु सुखीनः
माँ- तब तो मुझे कोई नहीं पुछेगा, साल में एक बार तो मेरी पूजा होती है, वह भी तुम बन्द करवा देना चाहते हो – इस के अलवा भी एक बात और है। सब को मैं धनी बना दूँ तो इस दुनियाँ में कोई किसी से सुमधुर सम्बन्ध रखेगा ही नहीं। लक्ष्मी चंचला होती है, इस बात को जानते हुए भी लोग इतना पाप, अन्याय, अत्याचार, दुराचार करते हैं तो लक्ष्मी यदि स्थायी रुप से अपना हाथ-पैर तोडÞकर एक जगह बैठ जाय तो अभिमान, गर्व, अहंकार यह सभी मिलकर मानवता को खा जाएँगे। तब क्या बचेगा दुनियाँ में – जितने भी युद्ध-संग्राम हुए उस के मूल में यही अहंकार तो रहता आया है।
हिमालिनी- दुनिया आपके लिए पागल है और आप दुनिया का भला सोच-सोच कर पागल हर्ुइ जा रही हैं। मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा है माते !
माँ- लगता है, मुझसे वार्तालाप करते ही तुम मंे उल्लूपन बढÞ रहा है। तुम भी अब वार्तालाप को विराम दो। वर्तमान नेपाली सरकार की आयु की तरह इसे बढÞाते मत जाओ।
हिमालिनी- माते ! अब एक अन्तिम प्रश्न, दुनिया में जितने अपराध होते हैं, प्रायः सभी के मूल में धन प्राप्ति-शुभलाभ यही सब रहता है। ऐसा क्यों माते –
माँ- मेरा स्वरूप इतना सुन्दर है, जिसे देखकर सब मोहित हो जाते हैं। इस में मेरा क्या कसूर – अर्थ के पीछे जब लोग अनर्थ करते हैं, तब मुझे भी अपने सौर्न्दर्य पर जरा सा गर्व होता है।
अच्छा वचवा ! अब मैं फोन रखती हूँ। दूसरे नम्बर पर एक बहुत बडेÞ उद्योगपति मेरे आशर्ीवाद के लिए उताबले हो रहे है।
हिमालिनी- जो आज्ञा माते ! श्रीचरणों में मेरा प्रणाम !

 

मुकुन्द आचार्य

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