माओवादी एकता के लिए चीन का दबाब

पंकज दास :चीन के स्टेट काउंसलर यांग जर्ेइची के नेपाल भ्रमण की पर्ूव संध्या पर चिनियां राजदूतावास की तरफ से उनके मुलाकात के लिए जो समय निर्धारण को अन्तिम रूप दिया जा रहा था, उसमें एकीकृत नेकपा माओवादी के अध्यक्ष पुष्प कमल दहाल प्रचण्ड और इनसे अलग होकर गए नेकपा माओवादी के अध्यक्ष मोहन वैद्य के लिए विशेष समय की व्यवस्था की गई। इतना ही नहीं चिनियां दूतावास की तरफ से यांग के भ्रमण पर काठमांडू अवतरण से पहले ही इन दोनों नेताओं को साफ साफ बता दिया गया था कि यांग के साथ मुलाकात के दौरान उनका एजेण्डा क्या होने वाला है। नेपाल में चीन के राजदूत योंग हाउलान ने प्रचण्ड और मोहन वैद्य दोनों से ही अलग-अलग मुलाकात कर चीन की आन्तरिक इच्छा को व्यक्त कर दिया था। समान विचारधारा होने के कारण यह स्पष्ट है कि चीन माओवादी नेताओं के साथ अपनी निकटता चाहता है। आमतौर पर कूटनीतिक रूप से यह होता है कि जो पार्टर्ीीत्ता में रहे उसके साथ पडÞोसी देश या किसी भी अन्य देश का संबंध रहता है। लेकिन जब इसके परे किसी देश की सरकार किसी एक पार्टर्ीीी एकता के लिए इतनी पहल करे तो कई सवाल खडÞे होते हैं। खास कर नेपाल जैसे देश में जहां उसकी सीमा १७ सौ किमी से अधिक की खुली सीमा एक ऐसे लोकतांत्रिक देश के साथ जुडÞी हर्ुइ हो जहां माओवादी को आतंक का पर्याय माना जाने लगा हो। ऐसे में चीन के एक शक्तिशाली नेता या यूं कहे कि चिनियां सरकार की ही तरफ से जब नेपाल में माओवादी की जडÞंे मजबूत करने और माओवादी में पडÞे दरार को पाटने के लिए ना सिर्फसहयोगात्मक पहल किया जाए बल्कि निर्देशनात्मक आग्रह किया जाता हो तो चिन्ता होना स्वाभाविक है।

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माओवादी एकता के लिए चीन का दबाब

चीन के स्टेट काउंसलर यांग जर्ेइची वहां के विदेश मामलों के पांच र्सवाधिक शक्तिशाली नेताओं में से एक हैं। यांग इससे पहले की सरकार में विदेश मंत्री भी रह चुके हैं और नेपाल की राजनीतिक अवस्था के बारे में अच्छा ज्ञान होने के अलावा उनके दोनों ही नेता प्रचण्ड और मोहन वैद्य के साथ काफी अच्छे संबंध भी है। यह भी एक कारण हो सकता है कि चीन की तरफ से आधिकारिक तौर पर भी दोनों ही माओवादी को फिर से एक ही पार्टर्ीीनाने के लिए जोडÞ डÞाला जा रहा हो। अपने दो दिनों के भ्रमण के दौरान यांग जर्ेइची ने पहले एकीकृत नेकपा माओवादी के अध्यक्ष प्रचण्ड से मुलाकात कर उन्हें तत्काल से मोहन वैद्य को मनाकर वापस पुरानी पार्टर्ीीें लाने को कहा। इसके बाद हर्ुइ मोहन वैद्य के साथ मुलाकात के दौरान चिनियां स्टेट काउंसलर ने उनसे भी अपनी जिद को त्याग कर प्रचण्ड के साथ समझौता करने को कहा था। इस आग्रह का असर इतना जल्दी हुआ कि चिनियां स्टेट काउंसलर के नेपाल रहते ही दोनों नेताओं की मुलाकात हर्ुइ। एकता के पक्षधर रहे कृष्णबहादुर महरा के निवास पर प्रचण्ड और मोहन वैद्य के बीच पार्टर्ीीवभाजन के बाद से यह पहला मौका था, जब सीधे सीधे बात एकता के लिए हर्ुइ। वैसे तो इन के बीच पहले भी कई बार मुलाकात हो चुकी है और उन मुलाकातों में दोनों के बीच संपत्ति के बंटवारे और कार्यकर्ताओं के आपसी झगडÞे की ही बात होती थी। लेकिन चीन के दबाब के बाद पहली बार प्रचण्ड ने मोहन वैद्य के सामने एकता का प्रस्ताव रखते हुए उनसे शर्ते पूछी थी। करीब डेढÞ घण्टे तक चली इस मुलाकात के दौरान एकता नहीं होने पर भी आगामी चुनाव में मोर्चाबन्दी कर साथ में ही चुनाव लडÞने का प्रस्ताव भी रखा गया। प्रचण्ड के करीबी सूत्रों की मानें तो उन्होंने मोहन वैद्य को खुश करने के लिए और उनसे एकता करने के लिए बाबूराम भट्टर्राई और नारायणकाजी श्रेष्ठ तक को छोडÞने की बात कह डÞाली। मतलब साफ है कि प्रचण्ड यह दिखाना चाह रहे हैं कि पार्टर्ीीें विभाजन उनके कारण नहीं बल्कि भट्टर्राई और श्रेष्ठ के कारण ही हर्ुइ है। खुद को एकता का सबसे बडÞा हिमायती दिखाने के लिए प्रचण्ड ने इस गोपनीय मुलाकात को अपने सहयोगियों के जरिये मिडिÞया में र्सार्वजनिक कर दिया। और ढिÞंढÞोरा पीटा कि मोहन वैद्य के साथ उनकी मुलाकात और बातचीत काफी सकारात्मक हर्ुइ है और दोनों दलों के बीच संभव हुआ तो पार्टर्ीीकता और नहीं हुआ तो मोर्चाबन्दी तो हो ही जाएगी। हो सकता है कि प्रचण्ड का यह तरकीब चिनियां अतिथि को खुश करने के लिए की गई हो। उन्हें शायद लगा कि इस पर मोहन वैद्य खामोश ही रहेंगे। लेकिन वैद्य ने कुछ ही देर में अपनी खामोशी तोडÞते हुए बता दिया कि प्रचण्ड के एकता-प्रस्ताव को उन्होंने ठुकरा दिया है। इतना ही नहीं मोर्चाबन्दी कर चुनाव में जाने की उनकी बात में भी कोई दम नहीं है। मोहन वैद्य ने साफ कर दिया कि उनकी कुछ शर्ते हैं जो पूरा होने के बाद ही चुनाव में सहभागी होने या पार्टर्ीीकता या मोर्चाबन्दी के लिए बात आगे बढेÞगी। वैद्य की शर्ते भी कुछ कम खतरनाक नहीं हंै। उनकी पहली शर्त ही वर्तमान सरकार की बर्खास्तगी है। दूसरी शर्त यह है कि माओवादी का मधेशी मोर्चा के साथ कोई गठबन्धन नहीं होना चाहिए। और उनकी आखिरी शर्त है- संविधान सभा निर्वाचन के लिए जो अन्तरिम संविधान में जो भी बदलाव किए गए हैं, उन्हें रद्द किया जाना चाहिए।
अब यह तीनों ही मांगें वैसे तो असंभव हंै। खुद के द्वारा ही प्रधान न्यायाधीश के नेतृत्व में सरकार गठन करने का दावा करने वाली एकीकृत नेकपा माओवादी के लिए रेग्मी की सरकार को हटाना या उसकी बात करना मुश्किल है। कम से कम अगहन तक तो मुश्किल ही होगी। यह तभी संभव है, जब अगहन में किसी तरह से चुनाव को टाल दिया जाए। जिसके लिए ये पार्टियां लगी भी हर्ुइ हैं। इसके अलावा मधेशी मोर्चा के साथ गठबन्धन की बात करें तो वह लगभग टूटने के ही कगार पर है। हालांकि अपनी तरफ से माओवादी इसे नहीं तोडÞना चाह रही है लेकिन मधेशी मोर्चा में आई दरार के कारण ही इसके टूटने की संभावना बढÞ गई। बस औपचारिक घोषणा होना बांकी है। और मोहन वैद्य की तीसरी शर्त भी अगहन से पहले पूरी नहीं हो सकती।
चीन के द्वारा माओवादी एकता के लिए जो दबाब दिया जा रहा है, उसका मतलब यह तो नहीं कि दोनों दलों में एकता कराकर संविधान सभा चुनाव ही नहीं होने दिया जाए। और मोहन वैद्य की तरफ से जो शर्तें रखी गई है, वह अगहन के बाद उनकी योजना का ही एक हिस्सा है। माओवादी को करीब से जानने वाले राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि संविधान सभा चुनाव को किसी भी बहाने टालकर रेग्मी की सरकार को अस्थिर बनाना, और यह दिखाना कि प्रधान न्यायाधीश के नेतृत्व में बनी सरकार भी असफल हो गई और उसके बाद अपने ही नेतृत्व में फिर से सरकार गठन करना ही उनका लक्ष्य है। कहीं माओवादी की यही योजना है और चीन सिर्फइसलिए एकता के लिए दबाब डÞाल रहा है ताकि अगहन में चुनाव नहीं होने की स्थिति में माओवादी के पक्ष में माहौल बनाकर उसे बिना चुनाव के ही सत्ता पर फिर से काबिज कराया जा सके, तो यकीन मानिए यह काफी खतरनाक खेल माओवादी की तरफ से खेला जा रहा है, जिसमें चीन की भूमिका संदिग्ध लग रही है।

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