माओवादी का बढता विवाद

श्रीमन नारायण

सत्ताधारी एकीकृत नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी अन्दर का विवाद गहराता जा रहा है। जबसे डा. बाबूराम भट्टर्राई के नेतृत्व में एमाओवादी नेतृत्ववाली साझी सरकार अस्तित्व में आई है, तभी से विवाद कायम है। दरअसल पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ के प्रधानमन्त्री बन जाने के वाद पार्टी बुजर्ुग नेता मोहन वैद्य ‘किरण’ खुद को इस पद का अगला हकदार मान रहे थे। परन्तु उनके नामका प्रस्ताव पार्टी अन्दर से किसी नेता ने नहीं किया। एमाले एवं नेपाली कांग्रेस उनके अडियल रवैये के कारण शुरु से ही उनसे खार खाए बैठी थी। मधेशवादी दल तो उनका नाम भी उच्चरण करना पसन्द नहीं करते। बेचारे वृद्ध व्राहृमण करे भी तो क्या – बाध्य होकर व्रि्रोही तेवर अख्तियार करना शुरु किया।

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माओवादी का बढता विवाद

शुरु में एकीकृत माओवादी एवं संयुक्त लोकतन्त्रवादी मधेशी मोर्चा के साथ हुए चार सूत्री सम्झौते का तो उन्होंने स्वागत किया, परन्तु महिना दिन बीतते-न बीतते सम्झौता का विरोध करने लगे। विपक्षी दल एमाले के द्वारा सम्झौते का विरोध करना तो कुछ हदतक बात समझ में आती है, परन्तु किरण के विरोध का कोई ठोस कारण नहीं दिखता। एमाओवादी एवं सरकार के साथ हुए विभिन्न चार सूत्री सम्झौतों में ऐसा कोई भी प्रावधान नहीं, जिसे नेपाल की एकता और अखण्डता के प्रतिकूल माना जाए। एमाले के ही सुर में सुर मिलाते हुए किरण ने राजा महेन्द्र वाली वही पुरानी पञ्चायती राष्ट्रवाद की पुरानी धुन छेडÞ दी, जिसे आज की नयी पीढÞी बेकार का विषय मानती है। मोहन वैद्य ने प्रधानमन्त्री डा. भट्टर्राई के विकल्प में एक जनजाति नेता रामबहादुर थापा ‘बादल’ का नाम प्रसारित किया जो दो साल पहले असफल रक्षा मन्त्री साबित हो चुके थे। माओवादी इस वृद्ध नेता ने शिविर से अयोग्य साबित हो बहिर्गमन के शिकार हुए पार्टर्ीीे गुरिल्लों को भी काफी उत्तेजित करने का काम किया। पार्टर्ीीध्यक्ष प्रचण्ड पर दबाव बनाने का हर सम्भव प्रयास किया, परन्तु जब उन्हे पता चला कि डा. भट्टर्राई की कर्ुर्सर्ीीजबूत फेभिकल से जुडÞी है, उसके बाद बाध्य होकर काठमांडू की एक जनसभा में उन्हें कहना पडÞा कि हमारी पार्टर्ीीे मतभेद को पार्टर्ीीवभाजन के रुप में देख रहे लोगों को निराशा हाथ लगेगी। हम एक हैं और एक रहेंगे। माओवादी पार्टर्ीीकजूट रहे या चार फाँक इससे दूसरे को क्या लेना – माओवादी के नेता खूद अपनी पीठ थप-थपा रहे थे। नेपाली कांग्रेस, राष्ट्रीय प्रजातन्त्र पार्टर्ीीवं एमाले के अन्दर ऐसा ही विवाद देख चुकी नेपाली जनता को इस तरह के तमाशे में अब कोई दिलचस्पी नहीं है।
जैसे ही तापमान में चढÞाव आया है, नेपाल के राजनीतिक दलों का विवाद भी एक बार फिर से गरमाने लगा है। इसका आगाज सत्ताधारी माओवादी पार्टर्ीीे ही हुआ है। एकबार फिर से वही पुराने नेता व्रि्रोह की कमान थामे हुए हैं। अपनी ही पार्टर्ीीी सरकार को गिराने के लिए वे किसी से भी हाथ मिलाने को तैयार हैं। एमाले एवं नेपाली कांग्रेस से भी वे हाथ मिलाने को तैयार हैं। कमबख्त राजनीति ही वह चीज है, जो बाघ और बकरे में भी दोस्ती कराती है।
अगर बकरे को भी आप बाघ की सवारी करते देखें तो आर्श्चर्य नहीं। कहाँ कट्टर माओवादी मोहन वैद्य और कहा कट्टर कम्युनिष्ट विरोधी नेपाली कांग्रेस। मोहन वैद्य अपने ही प्रधानमन्त्री के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी भी कर रहे हैं। विभिन्न एक दर्जन दलों से गठजोडÞ कर वे आन्दोलन में भी कूदने जा रहे हैं।
मोहन वैद्य बाह्य तौर पर देश में चीन जैसा संविधान लागू करना चाहते हैं। देश की जनता, अन्य राजनीतिक दल या कोई अन्य पक्ष माने या नमानें नेपाल में जनवादी संविधान लागू होना चाहिए, ऐसी उनकर्ीर् इच्छा है। परन्तु मोहन वैद्य को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे देश के अन्तरिम संविधान -२०६३) के प्रावधान एवं शर्तो से बंधे हुए हैं। उनकी पार्टर्ीीाज अगर इस मुकाम तक पहुँची है तो उसी आईने के तहत। न तो उनके गुरिल्लों ने देश के शासन पर कब्जा जमाया है ना ही उनका कथित जनयुद्ध सफल हुआ है। अगर उनको अपने गुरिल्लों की क्षमता पर भरोसा है तो शायद वे गलतफहमी के शिकार हैं। मई २८ तक अगर संविधान नहीं बन सका तो इसका सारा दोष नेपाल के तीन बडÞे राजनीतिक दलों के माथे ही मढÞे जाएंगे। माओवादी ने अगर व्रि्रोही तेबर अख्तियार किया तो सारा दोष अकेले इसी पार्टर्ीीे लेना होगा। वैसे अबतक ये माना जा रहा था कि संघीयता, आरक्षण या नागरिकता जैसे अहम मुद्दों पर मधेशवादी नेताओं की राय से एमाओवादी भी अलग नहीं है, परन्तु वैद्य साहेब का व्रि्रोही तेवर माओवादी को बदनाम कर देगा।
वैसे इसे नेपाल के लिए दर्ुभाग्य ही कहा जाएगा  कि जब भी यहाँ की कोई राजनीतिक दल सत्ता में गई है, वो खुद अपने ही कारणों से सत्ताच्युत हर्ुइ है। सन् १९५२ में मातृकाप्रसाद कोईराला की नेतृत्ववाली नेपाली कांग्रेस की सकार हो या उसके बाद टंकप्रसाद आचार्य के नेतृत्व में बनी प्रजापरिषद की सरकार। सन् १९५२ में बनी नेपाली कांग्रेस की सरकार अपने ही कारणों से तो नहीं गई परन्तु इसमें कुछ भूमिका इसके नेताओं को भी रही।
सन् १९९० के बाद बनी नेपाली कांग्रेस की गिरिजा सरकार या देउवा सरकार, जब भी च्युत हर्ुइ है, अपने ही आन्तरिक कारणों से च्युत हर्ुइ। संविधानसभा के निर्वाचन के बाद बनी माओवादी नेतृत्व की प्रचण्ड सरकार कलह के कारण तो नहीं परन्तु अपने करतूतों के कारण गिरी। माधवकुमार नेपाल की सरकार को गिराने में झलनाथ खनाल अग्रपंक्ति में थे तो खनाल जी की सरकार भी अपने ही कारणों से गिरी। अब अगर डा. भट्टर्राई की सरकार वैद्य के कारण च्युत होती है तो इस में आर्श्चर्य नहीं।
माओवादी का आन्तरिक विवाद देश में जारी शान्ति प्रक्रिया एंव संविधान निर्माण कार्य पर गहरा धक्का पहुँचाएगा। क्योंकि अब महज दो ही माह शेष रह गए है। वैसे नेपाल के लिए यह दर्ुभाग्य ही कहा जाएगा कि सन् १९५० से लेकर अब तक बनी नेपाल की किसी सरकार ने अपना पाँच वर्षका कार्यकाल पूरा नहीं किया।   ±±±

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