माओवादी के चक्रव्यूह में कांग्रेस

नेपाली कांग्रेस ने माओवादी पर  विश्वास कर  एक बडा धोखा खाया है । यह जानते हुए कि माओवादी इतनी आसानी से सत्ता छोडÞने वाले नहीं है फिर  भी कांग्रेस के शर्ीष्ा नेताओं ने ना सिर्फमाओवादी पर  आँख खुली र खकर  विश्वास किया बल्कि उसके चक्रव्यूह में फँसते चले गए ।
माओवादी को करीब से जानने वाले यह अच्छी तर ह समझते हैं कि उनका अंतिम लक्ष्य नेपाल की सत्ता पर  प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से अपना कब्जा कर ना है और  उसी लक्ष्य को लेकर  वो आगे भी बढÞ र हे हैं । चाहे संविधानसभा को भंग कर ने की बात हो या फिर  चुनाव को टालने की । किसी पार्टर्ीीें विभाजन की बात हो या फिर  किसी को जेल भिजवाने की उनकी हर  चाल के पीछे एक ही मकसद र हता है ।
माओवादी नेताओं का बाहर  में अलग-अलग बोलना, एक ही मुद्दे पर  अलग-अलग विचार  र खना, पार्टर्ीीे भीतर  गुटवाजी की खबर , अपने ही नेताओं की बुरर् ाई कर ना और  सामने जो पार्टर्ीीै, उसे खुश कर नेवाले बयान देना यह माओवादी की र णनीति है । इसी र ाणनीति के तहत प्रचण्ड ने नेपाली कांग्रेस को प्रधानमन्त्री पद का पहले तो ख्वाब दिखा लाया । वो भी एक नहीं तीन-तीन नेताओं को । कभी कोइराला को कभी पौडेल को और  कभी देउवा को । लेकिन इन में से देउवा ने माओवादी र णनीति पहले ही समझ ली और  प्रधानमन्त्री की र ेस से खुद को अलग कर  लिया । प्रधानमन्त्री की उम्मीदवारी छोडने के एवं में देउवा ने पार्टर्ीीे कार्यबाहक सभापति पर  अपनी दावेदारी कर  दी । देउवा को यह अच्छी तर ह पता है कि माओवादी पार्टर्ीीोइर ाला को कभी प्रधानमन्त्री बनने नहीं देगी । लेकिन कार्यबाहक सभापति पर  तो उसकी दावेदारी प्रवल होती र हेगी । उधर  पौडेल भी व्यंग्य मार ते हुए अपनी दावेदारी छोडकर  पीछे हट गए । कृष्ण सिटौला जैसे हारे हुए नेता की संगति में कोइर ाला के भीतर  प्रधानमन्त्री पद की लालसा इस कदर  जागी कि एक समय उन्हें लगने लगा कि अगले कुछ दिनों में वह प्रधानमन्त्री बन ही जाएंगे ।
प्रचण्ड ने सुशील कोइराला को इस कदर  ख्वाव दिखाया कि कोइर ाला उस में फँसते ही गए । यह जानते हुए कि प्रचण्ड की बातों पर  विश्वास नहीं किया जा सकता है । यह जानते हुए कि माओवादी में प्रचण्ड का अकेले निर्ण्र्ाालेना संभव नहीं है । यह जानते हुए कि बार  बार  माओवादी बैठकों में यह निणय किया जा चुका है कि कांग्रेस को किसी भी हालत में सत्ता का नेतृत्व नहीं सौंपा जा सकता है । सिर्फमाओवादी ही नहीं उसको र्समर्थन दे र ही मधेशी मोर्चा भी कांग्रेस के पक्ष में नहीं है । सत्तारुढ गठबन्धन ने भी सत्ता नहीं छोडÞने का और  छोडÞना ही पडेÞ तो कांग्रेस के नेतृत्व को स् वीकार  नहीं किए जाने का निर्ण्र्ााकिया है । यह सब जानते हुए भी कोइर ाला को कांग्रेस पार्टर्ीीे और  खुद कोइर ाला की प्रधानमन्त्री बनने की महत्वकांक्षा ने चक्रव्यूह में फँसा दिया है । कोइर ाला का फिलहाल प्रधानमन्त्री बनना मुश्किल है । सत्ता लेने के चक्कर  में सर कार  के विरुद्ध हो र ही आलोचना को भी स् थगित कर ना पडÞा । कोइर ाला की स् िथति अभी ‘माया मिली ना र ाम’ जैसे हो गई है ।

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