माओवादी विवादःकितना दिखावा कितना सच:

पंकज दास

देश की सबसे बडी राजनीतिक माओवादी के भीतर इस समय आपसी या आंतरिक संर्घष्ा अपने चरम पर है । पार्टर् भीतर जिस तरह की गुटबन्दी चल रही है वह अब से पहले कभी भी नहीं देखी गयी थी । लेकिन सबसे बडा प्रश्न ये है कि माओवादी के भीतर इस समय जो कुछ भी चल रहा है, वह क्या यथार्थ है या फिर एक प्रयोजित और सुनियोजित नाटक है । कहीं ऐसा तो नहीं कि नई शक्ति आर्जित करने के लिए प्रचण्ड द्वारा रचा गया एक हाईवोल्टेज ड्रामा हो । माओवादी भीतर अपना वर्चस्व बनाने के लिए प्रचण्ड अब तक कई बार इस तहर का प्रपंच रच चुके हैं । कई बार सफल भी हो गए थे लेकिन हर बार सफल हो जाए यह जरुरी नहीं है । इस बार प्रचण्ड को अपना यह दाँव उलटा भी पड सकता है ।
६० वर्षके कम्यूनिष्ट इतिहास को निरंतरता देते हुए माओवादी विभाजन के कगार पर सचमुच पहुँच गई है – माओवादी के भीतर देखे गए इस विवाद को वैचारिक लडर्Þाई कहा जाए या फिर प्रतिष्ठा का प्रश्न – या फिर पार्टर्ीीे भीतर सत्ता व शक्ति पर कब्जा करने की लर्डाई है – पार्टर्ीींचालन में प्रचण्ड वाकई असफल हो गए है या फिर वैद्य पक्ष द्वारा लगाए गए आरोप सही है – कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रचण्ड द्वारा वैद्य पर लगाए गए जडÞसूत्रवाद और उग्रपंथी भडकाव आ गया हो तथा वैद्य पक्षधर नेताओं में क्रांतिकारी रोमांचकता ही काम कर रही है या वैद्य के कहे अनुसार बाबुराम भारतपरस्त और दक्षिणपंथी आत्मर्समर्पणवादी हो गए हैं –
कभी बाबुराम तो कभी वैद्य के नजदीक होकर अपना पल्ला हमेशा भारी रखने वाले प्रचण्ड ने सत्ता व शक्ति का केन्द्र बनकर लगातार दो दशकों तक एकछत्र राज किया है । लेकिन प्रचण्ड के लिए मुश्किल भरा दौर आ गया है । माओवादी के भीतर देखे गए विवाद ने कई प्रश्नों को जन्म दिया है । लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि माओवादी के भीतर देखे गए विवाद और विभाजन की स्थिति की वास्तविकता वही है जो हमें दिख रही है । या जो कुछ मीडिया में आ रहा है वही सच है – या फिर शांति-संविधान तथा सेना समायोजन की बात को टालने तथा नेपाल के राजसत्ता पर कब्जा जमाने की अपनी ही दर्ीघकालिक रणनीति का एक हिस्सा मात्र है । माओवादी पार्टर्ीीो और माओवादी नेताओं को काफी करीब से जानने वाले राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि माओवादी के भीतर जो अन्तरसंर्घष्ा चल रहा है या फिर जो विवाद दिख रहा है, वह एक प्रयोजित रणनीति ही है । अधिकांश विश्लेषक मानते हैं कि यह सब प्रचण्ड की एक सोची समझी चालबाजी है ।
प्रचण्ड ने जब से बाबुराम भट्टर्राई की लाइन पकडÞकर शांति तथा संविधान को अपना कार्यदिशा बनाने की घोषणा की है, तब से ही प्रचण्ड के विरोध में मोहन वैद्य देशव्यापी भण्डाफोर अभियान में जुटे हैं । इसी विरोध स्वरूप मोहन वैद्य ने प्रचण्ड के खिलाफ आरोपों की झडी लगाते हुए १८ बिन्दुओं का एक आरोपपत्र भी र्सार्वजनिक किया है । वैद्य के इस कदम का प्रचण्ड पक्षधर नेता यह प्रतिक्रिया दे रहे हैं कि वैद्य खुद पार्टर्ीीध्यक्ष बनकर, बाबुराम भट्टर्राई को संसदीय दल का नेता बनाने की दाँव में है । वैसे तो अपना अध्यक्ष पद बचाने के लिए प्रचण्ड भी कोई कसर बाँकी नहीं छोडेंगे । इस तरह माओवादी अभी तीन नेताओं की गुटबाजी के चंगुल में जकडा हुआ है । तीनों नेता अपने-अपने पक्षधर नेताओं व कार्यकर्ताओं के साथ अलग-अलग बैठकें और सम्मेलन कर रहे है । इसकी शुरुआत वैसे प्रचण्ड ने ही की । पार्टर्ीीे बडे से बडÞा निर्ण्र्ाालेने से पहले पार्टर्ीीी कोर कमीटी में छलफल करने के बजाए अपने पक्षधर नेताओं को बुलाकर ही अंतिम निर्ण्र्ााकर लेते थे । और इस निर्ण्र्ााको सिर्फऔपचारिकता के लिए कोर कमिटी, स्थाई समिति और पोलिट ब्यूरो से अनुमोदन किया जाता था । प्रचण्ड के इस व्यवहार से नाराज बाबुराम व वैद्य ने भी अलग-अलग बैठक करनी शुरु कर दी ।
इसी बीच पार्टर्ीीे तीसरे उपाध्यक्ष नारायणकाजी श्रेष्ठ भी अपनी गुटबाजी में लग गए हैं । एक दशक लम्बे चले जनयुद्धकाल के समय अंडरग्राउण्ड रहे प्रकाश की पार्टर्ीीें कोई खास पूछ नहीं है । प्रचण्ड की जी हजुरी कर पहले पार्टर्ीीे उपाध्यक्ष पद पर और बाद में संसदीय दल के उपनेता का पद हासिल किया । प्रकाश भी इन दिनों अपनी भूमिका को कमजोर मानकर पार्टर्ीीे भीतर गुटबन्दी में लग गए हैं ।
बाहर देखने पर यह लगता है कि माओवादी में विभाजन अवश्यंभावी है । एक पार्टर्ीीे भीतर रहकर भी उनके भीतर तीन अलग पार्टियाँ होने की बात भी कही जा रही है । लेकिन जब तक औपचारिक विभाजन ना हो जाए तब तक इसे माओवादी की रणनीति ही मानी जाएगी । क्योंकि जनयुद्ध काल से लेकर अब तक माओवादी ने अपने इसी चाल से कई महत्वपर्ूण्ा उपलब्धियाँ हासिल की है । पार्टर्ीीे भीतर चल रहे विवाद को ढाल बनाकर वो दूसरे राजनीतिक दलों को अपने प्रति की रणनीति बदलने पर हमेशा ही मजबूर करती रही है । और फायदा सीधे माओवादी को ही मिला है । माओवादी के भीतर जारी अंतरसंर्घष्ा, विवाद, गुटबाजी की जो खबरे नेपाल की मीडिया में आती है, उनमें से कई तो प्रायोजित होती है और कई बार मीडिया बिना सोचे समझे ही माओवादी के जाल में फँसते जाते हैं । इसलिए माओवादी में तत्काल विभाजन हो ही जाएगा, इस बात में सच्चाई नहीं दिखती ।
एक बात तय है कि इस विवाद से शांति प्रक्रिया, सेना समायोजन तथा संविधान निर्माण के काम पर नकारात्मक असर पडÞा है । सेना समायोजन का काम सही समय पर नहीं हो पाया जैसा कि जेठ १४ गते तीन दलों के बीच हर्ुइ सहमति पर लगता था । इससे यह लगता है कि कही माओवादी के तीनों शर्ीष्ा नेता जानबूझकर तो ऐसा नहीं कर रहे हैं, जिससे शांति व संविधान के काम को प्रभावित कर राज्य सत्ता पर पूरी तरह कब्जा करने में उनको मदत मिल सके । माओवादी अंतरसंर्घष्ा से राष्ट्रीय राजनीति पर भी सीधे असर पडÞ रहा है । अपने आप को विवाद में उलझाकर सारे देश का ध्यान संविधान निर्माण प्रक्रिया से हटाना चाह रहे हैं ताकि समय आने पर लडाकुओं का भय दिखाकर अपने दर्ीघकालिक नीति के तहत वो देश की राज्य सत्ता पर पूरी तरह कब्जा कर सके और अपने हिसाब से ही संविधान जारी कर सके ।
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माओवादी के भीतर रहे विवादित मुद्दे

माओवादी के भीतर अभी कुछ सैद्धांतिक तो कुछ प्राविधिक विषय पर मतभेद है । पिछली बार शांति व संविधान से जुडे विषय में माओवादी के भीतर कुछ ज्यादा ही तनाव देखने को मिल रहा है । इस तनाव के कारण शांति प्रक्रिया व संविधान निर्माण का काम भी प्रभावित हो रहा है । इसमे कोई आशंका नहीं है । संक्रमणकालीन अवस्था में आगे बढÞ रहे समय में संविधान सभा की सबसे बडÞी पार्टर्ीीे भीतर ही मतभेद होने से इसका प्रभाव पूरी प्रक्रिया पर पडÞा रहा है ।
पालंुगटार विस्तारित बैठक के बाद तैयार हुए व्रि्रोह के कार्यदिशा को स्थगित कर प्रचण्ड ने शांति व संविधान के कार्यदिशा को आगे बढÞाने के बाद माओवादी के भीतर मतभेद और तीव्र हो गया है । शान्ति व संविधान में जाने की बात पर मोहन वैद्य किरण द्वारा अपना अलग दृष्टिकोण रखे जाने के बाद विवाद और बढÞ गया है । यह सैद्धांतिक मतभेद अभी शान्त भी नहीं हुआ था कि संविधान सभा की समय सीमा बढÞाए जाने को लेकर जो भी निर्ण्र्ााकिया गया उसमें भी किरण ने अपना विरोध जताया था ।
सेना समायोजन के विषय पर प्रचण्ड द्वारा किए गए समझौते के बाद जो मतभेद था, वह अब मनमुटाव में बदल गया है । माओवादी नेताओं की दोहरी सुरक्षा व्यवस्था हटाने पर भी उपाध्यक्ष किरण पक्षधर नेता असहमत है और अब तक दोहरी सुरक्षा नहीं हर्टाई है । जबकि प्रचण्ड सहित अन्य कई नेताओं ने अपनी लडÞाकुओं की सुरक्षा हटा ली है । सेना समायोजन के विषय पर नेपाली सेना द्वारा प्रस्तावित प्रक्रिया पर ही माओवादी स्थाई समिति में सहमति जताई गई थी लेकिन यहाँ भी वैद्य पक्षधर चार नेताओं ने अपना नोट अफ डिसेन्ट लिखा था ।
मोहन वैद्य का मानना है कि सेना समायोजन की मोडालिटी निर्धारण नहीं किए जाने तक र्रि्रुपिंग में नहीं जाना चाहिए । इसके अलावा सेना समायोजन होने से पहले सुरक्षा संबंधी नीति निर्धारित किया जाना, लडÞाकुओं को अलग या मिश्रति शक्ति के रूप में समायोजन किए जाने व इसका नेतृत्व लडाकुओं द्वारा ही किए जाने, लडÞाकुओं को. सीमा सुरक्षा बल की जिम्मेवारी दिए जाने तथा संविधान निर्माण व सेना समायोजन की बात साथ-साथ आगे बढाने का प्रस्ताव भी मोहन वैद्य द्वारा किया गया है । सेना समायोजन के विषय में प्रचण्ड ने कोर कमीटी व स्थाई समिति से निर्ण्र्ााकरवा लिया है । क्योंकि इन समितियों में प्रचण्ड का बहुमत है । लेकिन मोहन वैद्य पक्षधर नेता इन विषयों को पोलिट ब्यूरो तथा केन्द्रिीय कमीटी से पारित करवाने की चुनौती दे रहे हैं ।
सरकार गठन पर भी प्रचण्ड व मोहन वैद्य के बीच टकरार बढÞ गया है । प्रचण्ड पर मनमानी तरीके से निर्ण्र्ााकरने का आरोप लगाया है । वैद्य पक्षधर नेताओं का कहना है कि मंत्रियों के चयन में न तो जातीय, वर्गीय, क्षेत्रीय संतुलन को बनाया गया और ना ही संगठनात्मक संतुलन को । सुदूरपश्चिम से एक मात्र मंत्री बनाए जाने के कारण उस क्षेत्र के नेता पार्टर्ीीेतृत्व के प्रति आलोचना करते आ रहे हैं । प्रचण्ड के मनमानी तरीके से मंत्रिपरिषद में अपने निकट के ही लोगों को शामिल किए जाने, तथा मंत्रालय बँटवारे का विरोध करते हुए मंत्री बनाए गए वैद्य पक्षधर नेताओं ने अभी तक मंत्री पद का शपथ भी नहीं लिया है ।
प्रधानमंत्री झलनाथ खनाल के इस्तीफे को लेकर भी नेताओं के बीच मतभेद कायम है । बाबुराम भट्टर्राई लगातार इस्तीफे की माँग कर रहे हैं तो प्रचण्ड सहमति बने बिना किसी भी हालात में इस्तीफा ना दिए जाने के पक्ष में हैं । इस विषय पर दोनों नेता अपना-अपना दाँव देख रहे हैं । भट्टर्राई को लगता है कि कांग्रेस, मधेशीवादी और अन्य दलों के र्समर्थन से उनके प्रधानमंत्री पद पर पहुँचने का एक अवसर है । जबकि कई महीनों से पुनः प्रधानमंत्री बनने के लिए जोडÞ तोडÞ कर रहे प्रचण्ड अपने लिए सही मौके की तलाश में हैं । अपने पक्ष में माहौल नहीं बन जाने तक वो किसी भी हालात में खनाल का इस्तीफा नहीं चाहते । उधर इस विषय पर मोहन वैद्य का अलग ही मानना है । वैद्य का कहना है कि राष्ट्रीयता के आधार पर बनी इस सरकार को ही निरन्तरता दी जानी चाहिए ।
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माओवादी विवाद की श्रृंखला
०५२ कार्त्तिक ः- भूमिगत होने से पहले जनयुद्ध के बारे गोरखा में हर्ुइ बैठक में माओवादी नेतृत्व के बीच तीव्र मतभेद । बैठक में देखी गई मतभेद के बारे में पार्टर्ीीे दस्तावेज में ही उल्लेख ।
०५३ साल ः- जनयुद्ध शुरु हुए एक वर्षभी नहीं हुआ था कि पार्टर्ीीे भीतर सांस्कृतिक विचलन आने की टिप्पणी व बहस शुरु हो गई । पार्टर्ीीे केन्द्रीय नेता रामबहादुर थापा बादल, पम्फा भुसाल ओर हरिबोल गजुरेल के ऊपर अनुशासनात्मक कार्रवाही ।
०५५, भदौ ः- माओवादी के चौथे विस्तारित बैठक में नेतृत्व शक्ति के विषय पर विवाद । नेतृत्व को केन्द्रिकृत करने के प्रचण्ड के प्रस्ताव का तीव्र विरोध । हालांकि भट्टर्राई इस मुद्दे पर थोडÞा लिबरल दिखे । पहली बार प्रचण्ड का फोटो पार्टर्ीीे मुखपत्र जनादेश में प्रकाशित ।
०५६ साल ः- केन्द्रिय कमीटी की बैठक में शर्ीष्ा नेतृत्व द्वारा अपने निर्ण्र्ााको जबरन थोपे जाने के विरोध में सात युवा नेताओं ने जोर-शोर से आवाज उर्ठाई । इस को लेकर पार्टर्ीीे भीतर लम्बे समय तक विवाद बना रहा ।
०५७ साल ः- दूसरे राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रचण्ड पथ का सिद्धांत पारित करने में काफी विरोध हुआ । कई केन्द्रीय नेताओं ने इसका विरोध किया था ।
०५९ साल ः- सेना के द्वारा गिरफ्तार किए गए कई नेताओं के द्वारा आत्मर्समर्पण किए जाने की घटना भी पार्टर्ीीे भीतर विवाद का एक बडÞा कारण बना । माओवादी नेताओं के बीच ही आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला । सेना को सूचना देकर पार्टर्ीीे नेताओं की गिरफ्तारी कराए जाने के बात से पार्टर्ीीें अविश्वास का वातावरण शुरु हो गया ।
०६० पुस ः- दिल्ली से पार्टर्ीीे केन्द्रीय नेता मातृका यादव व सुरेश आलेमगर, सिलीगुढी से मोहन वैद्य किरण व चेन्नै सीपी गजुरेल की गिरफ्तारी के बाद पार्टर्ीीें हडÞकम्प मच गया । पार्टर्ीीे नेता द्वारा सूचना देकर इनकी गिरफ्तारी कराए जाने की बात ने विवाद का रुप ले लिया ।
०६१ जेठ ः- पटना से पार्टर्ीीे १ दर्जन केन्द्रीय नेताओं की गिरफ्तारी ने पार्टर्ीीो हिलाकर रख दिया । इस गिरफ्तारी में बाबुराम पक्षधर नेताओं पर आरोप । भारतीय जासूसी संस्था ‘र’ के साथ मिलकर नेताओं की गिरफ्तारी करने के आरोप में कई नेता को शंका के घेरे में रखा गया ।
०६१ भदौ ः- रोल्पा के फुंटरिंग में हर्ुइ विशेष बैठक में इन सभी गिरफ्तारियों का मुद्दा ही छाया रहा । पटना में पार्टर्ीीे एक दर्जन केन्द्रीय नेताओं की गिरफ्तारी में केन्द्रीय नेता देवेन्द्र पौडेल सुनील के खिलाफ कार्रवाही का फैसला, इस फैसले का बाबुराम भट्टर्राई द्वारा विरोध ।
०६१ कात्तिक ः- पार्टर्ीीे मूल कार्यनीति में प्रचण्ड व भट्टर्राई के बीच मतभेद और गहराया । प्रचण्ड ने भारत को प्रधानशत्रु माना तो भट्टर्राई का तर्क था कि निरंकुश बनती जा रही राजतंत्र के खिलाफ युद्ध । प्रचण्ड पक्षधर द्वारा भट्टर्राई पर भारतपरस्त होने का आरोप । ०६१ कार्त्तिक २३ गते भट्टर्राई ने सभी जिम्मेवारियों से इस्तीफा दिया ।
०६१ मंसिर ः- प्रचण्ड की कार्यनीति व उद्देश्य से असहमत होकर नई राजनीतिक बहस करने के लिए भट्टर्राई ने १३ सूत्रीय राजनीतिक एजेण्डा प्रचण्ड को सौंपा ।
०६१ माघ ः- प्रचण्ड व भट्टर्राई के बीच मतभेद इस कदर बढ गया कि दोनों के बीच लम्बे समय तक कोई बातचीत नहीं हर्ुइ । रुकुम के लावांग में हर्ुइ पेलिटब्यूरो बैठक में बाबुराम भट्टर्राई को उनके सभी जिम्मेवारियों से निष्कासित किया गया । इसी के साथ हिसिला यमी और दीनानाथ शर्मा को भी जिम्मेवारी से मुक्त कर दिया गया ।
०६१ माघ ः- पोलिटब्यूरो बेठक में फौजी रणनीति, गुटबाजी को लेकर खुब आरोप-प्रत्यारोप हुआ । प्रचण्ड की कडी आलोचना की गई ।
०६२  श्रावण ः- भट्टर्राई के खिलाफ की गई कार्रवाही वापस ली गई ।
०६२ असोज ः- चुनवांग बैठक के तुरंत बाद पार्टर्ीीेतृत्व के विचार, कार्यशैली से असहमति जताते हुए पार्टर्ीीे केन्द्रिय नेता मणि थाप व रवीन्द्र श्रेष्ठ ने नई सांस्कृतिक क्रान्ति समूह को गठन किया ।
०६२ फागुन ः- समानांतर पार्टर्ीीलाने के आरोप में थापा व श्रेष्ठ पार्टर्ीीे निष्कासित ।
०६३ मंसिर ः- शांति संमझौता के बाद माओवादी सरकार में शामिल हर्ुइ और सरकार में रहकर भी पार्टर्ीीे लिए प्रभावकारी कार्य ना कर पाने पर नेताओं की आलोचना हर्ुइ ।
०६४ श्रावण ः- सरकार में रहने या बाहर होने के विषय पर पार्टर्ीीे बालाजु में हुए पाँचवी विस्तारित बैठक में तीव्र विवाद हुआ । प्रचण्ड व किरण पक्षधर नेताओं के बीच खुब कहा सिनी हर्ुइ ।
०६४ चैत्र ः- माओवादी नेताओं की जीवनशैली को लेकर पार्टर्ीीे भीतर काफी विवाद हुआ । प्रचण्ड सहित उनके पक्षधर नेताओं पर विलासिता व ऐशपर्ूण्ा जीवन शैली रहने को लेकर खुब विवाद शुरु हुआ ।
०६५ मंसिर ः- खरिपाटी में हर्ुइ पार्टर्ीीैठक में सैद्धांतिक मतभेद खुलकर सामने आ गया । प्रचण्ड व मोहन वैद्य के बीच जमकर बहस हर्ुइ । प्रचण्ड शान्ति व संविधान के पक्ष में तो मोहन वैद्य व्रि्रोह में जाने के पक्ष में बहस कर रहे थे ।
०६५ फागुन ः- पार्टर्ीीे भीतर मधेश के मुद्दे को प्राथमिकता नहीं दिए जाने से नाराज मातृका यादव का पार्टर्ीीे व्रि्रोह करते हुए अलग पार्टर्ीीी घोषणा ।
०६६ असार ः- पार्टर्ीीी भावी रणनीति व कार्यदिशा को लेकर प्रचण्ड तथा मोहन वैद्य के बीच विवाद ।
०६६ श्रावण ः- पार्टर्ीीारा बहुपद में जाने के निर्ण्र्ााके खिलाफ ५ सभासदों द्वारा विरोध । इन सभासदों ने बकायदा प्रचण्ड से मिलकर लिखित रुप से अपना विरोध दर्ज किया ।
०६७ जेठ ः- संविधान सभा की समय सीमा, भावी रणनीति, जनव्रि्रोह आदि कार्यनीति पर प्रचण्ड व बाबुराम भट्टर्राई में विवाद । माओवादी को विशेष केन्द्रीय समिति बैठक बुलानी पडÞी । अन्ततः भट्टर्राई के प्रस्ताव को बहुमत मिला ।
०६७ मंसिर ः- पालुंगटार विस्तारित बैठक से पार्टर्ीीपष्ट रुप से तीन हिस्सों में बँट गई थी । पार्टर्ीीे तीनों नेताओं ने अपना-अपना प्रतिवेदन बैठक में पेश किया । बाद में प्रचण्ड ने मोहन वैद्य के साथ मिलकर नया प्रतिवेदन पारित करवा लिया । भट्टर्राई ने नोट आँफ डिसेन्ट लिखा ।
०६८ बैशाख ः- इस बार प्रचण्ड भट्टर्राई के कार्यनीति का र्समर्थन करते हुए शान्ति व संविधान के पक्ष में खडे हुए किरण ने विरोध जाताया ।
मजदुर संगठन ः- माओवादी मजदुर संगठन भी तीन हिस्से में बँट गई । बाद में संगठन को ही भंग कर दिया गया ।
– पार्टर्ीीे तरफ से सरकार में भेजे जाने वाले मंत्रियों के बारे में भी पार्टर्ीीे विवाद हुआ । मोहन वैद्य ने असंतुष्टि जताते हुए अपने पक्षधर नेताओं को शपथ लेने से इंकार किया ।
०६८ जेठ ः- देशभर में पार्टर्ीीे तीनों शर्ीष्ा नेताओं की अपने-अपने पक्षधर नेताओं की गोपनीय बैठकें शुरु ।
– दोहरी सुरक्षा हटाने के निर्ण्र्ााका मोहन वैद्य द्वारा विरोध । वैद्य पक्षधर नेताओं ने अभी तक अपनी दोहरी सुरक्षा नहीं हर्टाई है ।
०६८ अषाढ ः- विवाद इतना बढÞ गया है कि पार्टर्ीीथाई समिति व पोलिटब्यूरो बैठक स्थगित करनी पडÞी । तय समय मे केन्द्रीय कमीटी की बेठक भी नहीं हो पाई । देर से शुरु हर्ुइ बैठक एक घण्टे चलकर स्थगित । तीन दिनों बाद शुरु हर्ुइ बैठक में फिर विवाद ।

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