माओवादी विवाद पर अल्पविराम

पंकज दास

hindi news nepalलम्बे समय से अर्न्तर्संर्घ में रहे माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड और उपाध्यक्ष मोहन वैद्य के बीच कार्यक्रमगत एकता होने के बाद देश की शान्ति प्रक्रिया और संविधान निर्माण कार्य के अवरूद्ध होने का लक्षण दिखाई देने लगा और लोगों ने इसे महसूस भी किया। अपनेआप को शान्ति प्रक्रिया और संविधान निर्माण के पक्ष में होने का दावा करने वाले प्रचण्ड द्वारा जनव्रि्रोह की आवश्यकता पर जोड  देना और मोहन वैद्य की लगभग सभी शर्ताें को मानने के बाद शान्ति और संविधान निर्माण कार्य में अडÞचन आना स्वाभाविक है।
संविधान सभा में संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र में सहमति जताने वाले प्रचण्ड रातोंरात जनता की संघीय गणतंत्र में की बात पर सहमत हो गए हैं। इसी तरह वैद्य के ही कहे अनुसार सामन्तवाद – साम्राज्यवाद विरोधी सारतत्व होने वाले जनसंविधान का निर्माण करने पर भी प्रचण्ड सहमत हो गए हैं। भारत के साथ किए गए बीपा समझौते सहित अन्य सन्धि समझौते का भी मूल्यांकन कर असहमत होने पर खारिज करने के लिए प्रचण्ड ने अपनी मंजूरी दे दी है।
इसी तरह लडÞाकुओं के सम्मानजनक समायोजन के वैद्य पक्ष के अडान पर भी प्रचण्ड झुक गए हैं। दोनों नेताओं के बीच हर्ुइ सहमति के बाद ही वैद्य पक्ष ने वर्तमान सरकार में सहभागी ना होने और वर्तमान सरकार को भंग कर राष्ट्रीय सरकार निर्माण का पहल किए जाने पर तैयार हुए हैं। सहमतिअनुसार ही आइन्दा अध्यक्ष प्रचण्ड के द्वारा भविष्य में कभी भी कार्यकारी अध्यक्ष की हैसियत से अकेले कोई भी फैसला करने का अधिकार नहीं होने की बात वैद्य पक्ष की मांग पर भी प्रचण्ड राजी हो गए हैं। अब से पार्टी
कोई भी आधिकारिक फैसला पार्टी
कमीटी जिसमें अध्यक्ष प्रचण्ड, वरिष्ठ उपाध्यक्ष मोहन वैद्य किरण, उपाध्यक्ष डा। बाबुराम भट्टर्राई और नारायणकाजी श्रेष्ठ, महासचिव रामबहादुर थापा बादल तथा सचिव सीपी गजुरेल और पोष्टबहादुर बोगटी के र्सवसम्मत फैसले को ही पार्टी
आधिकारिक फैसला माना जाएगा। इस सहमति से यह साफ है कि अध्यक्ष प्रचण्ड को प्रभावहीन और महत्वहीन बना दिया गया है।
प्रचण्ड की रणनीतिक चाल
पार्टर्ीीेन्द्रीय कमिटी की बैठक के बाद अपने प्रस्ताव को बहुमत होने के बावजूद पारित नहीं करवाना प्रतिद्वंद्वी वैद्य के सभी शर्ताें को मंजूर करना, केन्द्रीय कमीटी की बैठक में पेश किए गए दोनों प्रतिवेदनों को पार्टर्ीीे निचले स्तर तक ले जाते हुए बहस करवाना इन सभी में यह अनुमान लगाया जा रहा है कि प्रचण्ड की इससे हार हर्ुइ है और कई मायनों में वैद्य की जीत हर्ुइ है। लेकिन माओवादी को खासकर प्रचण्ड को निकट से जानने वाले राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि यह प्रचण्ड की रणनीतिक चाल हो सकती है। हमेशा से प्रचण्ड का यह रवैया रहा है कि वो जब भी अपने दल की घेराबन्दी में पडÞते हैं तो उस समय पराजय को सहज ही स्वीकार कर लेते हैं और मौका मिलते ही उसी से फिर बदला भी चुका लेते हैं। मोहन वैद्य को र्साईज में लाने के लिए वो भट्टर्राई से हाथ मिलाते हैं और भट्टर्राई को दरकिनार करना हो तो वैद्य से जा मिलते हैं। यह प्रचण्ड की पुरानी आदत है।
मोहन वैद्य द्वारा लडÞाकुओं को एकमुष्ट रकम देकर स्वेच्छिक अवकाश में जाने वाले लडÞाकुओं को विदाई देने की बात भी प्रचण्ड और प्रधानमंत्री भट्टर्राई ने मान ली है। समायोजन में जाने वाले लडÞाकुओं को सेना में दिए जाने पद को लेकर अभी भी प्रचण्ड और वैद्य पक्ष में मतभेद बरकरार ही है। वैद्य चाहते हैं कि लडÞाकुओं को आसानी से सेना में प्रवेश मिले और उन्हें कम से कम एक लेफि्टनेण्ट जेनरल का पद अवश्य दिया जाना चाहिए। जबकि प्रचण्ड इस बात पर अडÞे हैं कि अन्य दलों से सहमति के आधार पर अधिकतम जो लिया जा सकता है वह लिया जाए।
इतने मतभेद के बावजूद प्रचण्ड द्वारा सहज ही वैद्य के सभी बातों में हां में हां मिलाने को किसी भी नजर से ठीक नहीं कहा जा सकता है। केन्द्रीय समिति की बैठक में अपने पक्षधर नेताओं द्वारा काफी दबाब दिए जाने के बावजूद स्पष्ट बहुमत होते हुए भी अपना प्रतिवेदन पास नहीं करवाने के पीछे प्रचण्ड का खतरनाक मंसूबा दिखाई देता है। हालंाकि कुछ नेताओं का मानना है कि पार्टर्ीीो विभाजन से बचाने के लिए यह कदम उठाया गया है। लेकिन जिस आर्श्चर्यजनक ढंग से दोनों के बीच एकता हर्ुइ है वह अपने आप में देश के भविष्य के लिए खतरा है। इसका असर सीधे सीधे शान्ति प्रक्रिया और संविधान निर्माण पर पडÞने वाला है और इसकी शुरूआत भी हो चुकी है। दलों के बीच हुए ऐतिहासिक सात सूत्रीय समझौते के बाद शान्ति प्रक्रिया और संविधान निर्माण का काम तेजी से पटरी पर आ गया था। लेकिन माओवादी ने हर बार की तरह इस बार भी पार्टर्ीीें विवाद का नाटक खडा कर शान्ति प्रक्रिया और संविधान निर्माण को ओझल में डाल दिया है।
कृत्रिम एकता कब तक –
२ महीने की लम्बी जद्दोजहद के बाद आखिरकार माओवादी की केन्द्रीय कमिटी की बैठक से आम जनता और अन्य राजनीतिक दलों को एक बडी आशा थी। सभी यह सोच रहे थे कि कोई बडा फैसला कर माओवादी सभी को चकित कर देगी या फिर शान्ति और संविधान निर्माण फिर से अपनी पटरी पर आजाएगा। लेकिन माओवादी ने दो महीने बाद जो फैसला सुनाया उससे खोदा पहाड और निकली चुहिया वाली कहावत चरितार्थ हर्ुइ। माओवादी के भी नेता कार्यकर्ताओं को लगा कि जिस पार्टर्ीीकता का राग उनके शर्ीष्ा नेता अलाप रहे हैं उससे कृत्रिम एकता के अलावा और कुछ भी नहीं कह सकते हैं। इस एकता की घोषणा के अगले ही दिन से मोहन वैद्य और उनके र्समर्थकों ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया था। पार्टर्ीीकता की घोषणा के ही दिन मोहन वैद्य ने कहा था कि भट्टर्राई सरकार को भंग करने के बारे में फिलहाल कोई भी चर्चा नहीं की जाएगी और उनके र्समर्थक भी सरकार में सहभागी होकर भट्टर्राई सरकार को ही राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करेंगे। लेकिन इसके अगले ही दिन जब पार्टर्ीीोर कमिटी की बैठक हर्ुइ उसी बैठक में वैद्य ने एक बार फिर से भट्टर्राई सरकार को भंग किए जाने की मांग की और कांग्रेस एमाले को मिलाकर नई सरकार गठन का प्रयास किए जाने पर अडे रहे। साथ ही वैद्य ने साफ कर दिया कि उनका कोई भी नेता भट्टर्राई के रहते मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होगा।
माओवादी नेताओं के इस रवैये से राजनीतिक विश्लेषक भी यह कह रहे हैंकि माओवादी का यह एकता महज दिखावा है और अधिक दिनों तक यह टिकने वाला नहीं है। खुद वैद्य के निकट रहे पार्टर्ीीचिव सीपीगजुरेल ने साफ कर दिया कि पार्टर्ीीी यह एकता की घोषणा होने के बाद भी विचार का बहस अभी पूरी तरीके से नहीं रूका है और वह आगे भी जारी रहेगा। कारण भी है जैसे ही प्रचण्ड और वैद्य के दस्तावेजों को निचले स्तर तक ले जाने का फैसला किया गया वैसे ही यह साफ हो गया है कि पार्टर्ीीें एकता नहीं बल्कि बहस यानि विवाद को पार्टी
शर्ीष्ा नेताओं के बीच ही सिमट कर ना रखते हुए उसे निचले स्तर तक के कार्यकर्ताओं तक में ले जाया जाए। माओवादी में हुए इस एकता को उनके ही कार्यकर्ता संक्रमण एकता का नाम दे रहे हैं।
वैद्य पक्षीय पोलिट ब्यूरो सदस्य खड्ग बहादुर विश्वकर्मा ने भी पार्टर्ीीर्ीष्ा नेताओं के द्वारा एकता की घोषणा किए जाने पर आर्श्चर्य व्यक्त करते हुए कहा था कि इससे पार्टर्ीीक है या नहीं यह तो स्पष्ट ही नहीं होता है। प्रचण्ड पक्षीय एक नेता ने भी कहा है कि पार्टी
एकता होने की घोषणा के बाद भी दोनों ही पक्ष अपने अपने अडÞान पर कायम ही हैं तो फिर पार्टर्ीीी यह एकता कितने दिनों तक टिकेगी यह कहना मुश्किल है। ±±±

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