माता-पिता का सम्मान

एक समय वह था, जब पिता की आज्ञा दूसरे के मुख से सुनकर भी पुत्र बडेÞ से बडÞे साम्राज्य को भी लात मारकर जंगल में निकल जाते थे। माता-पिता को कन्धों पर बिठाकर तर्ीथयात्रा कराते थे और उनको भगवान् समझकर नित्य निरन्तर उनकी सेवा, उनकी आराधना में संलग्न रहते थे। पुराणों में कथा आती है- चाण्डाल और व्याध आदि भी केवल माता-पिता की सेवा करके उस उत्तम सिद्धिको प्राप्त हो गए हैं, जिसे आजीवन कठोर तपस्या करके भी प्राप्त करना कठिन है।
शास्त्रों में माता-पिता को उपाध्याय और आचार्य से भी ऊँचा स्थान दिया गया है। भगवान् मनु कहते हैं- पिता प्रजापतिका स्वरूप है तथा माता पृथ्वी की प्रतिमर्ूर्ति है। मनुष्य कष्ट में पडÞनेपर भी कभी इनका अपमान न करें। माता और पिता पुत्र जन्म के लिए जो क्लेश उठाते हैं, उनके पालन-पोषण में जो कष्ट सहन करते हैं, उसका बदला वह सैकडÞों वर्षक उनकी सेवा करके भी नहीं चुका सकता। जिसने माता-पिता और आचार्य को प्रसन्न कर लिया, उसकी सम्पर्ूण्ा तपस्या पूरी हो गई। माता-पिताकी सेवा ही सबसे बडÞी तपस्या है। उनकी अनुमति के बिना कितने ही बडÞे दूसरे धर्म का अनुष्ठान क्यों न किया जाए, वह सफल नहीं होता। माता-पिता और गुरु की भक्ति से मनुष्य तीनों लोक को जीत लेता है। जिसने इनका आदर किया, उसके द्वारा सब धर्मो का आदर हो गया। जिसने इनको अपमानित किया, उसके समस्त शुभ कर्म निष्फल हो जाते हंै। पुत्र के लिए माता-पिता की सेवा ही परम धर्म है और सभी धर्म इसके लिए उपधर्म हैं। जो गुरुजनों को हुंकार, त्वंकार आदि के द्वारा अर्थात् उनको डाँट-डपटकर ‘रे-तू’ आदि कहकर अपमानित करता है, वह निर्जन वन में प्रेत होता है।
इस प्रकार शास्त्रों में माता-पिता की महिमा गाई गई है। उनकी सेवा का महात्म्य बताया गया है और उनके तिरस्कार से घोर पाप की प्राप्ति दर्शायी गई है। यह तो हर्ुइ शास्त्र की बात, लोकदृष्टि से विचार किया जाय तो मनुष्य के लिए माता-पिता से बढÞकर उपकारी ओर हितैषी कौन हो सकता है – उनका अपमान करनेपर किस अभागे पुत्र को ग्लानि नहीं होगी –
आप इसका प्रायश्चित् जानना चाहते हैं – किंतु क्या बताया जाय ! माता-पिता के उपकारों से मनुष्य का रोम-रोम दवा हुआ है। उनके विपरीत आचरण करना भारी कृतघ्नता और विश्वासघात है। कृतघ्न और विश्वासघाती के लिए कोई प्रायश्चित्त ही नहीं है। वह इतना भयंकर पाप है कि प्रायश्चित्त से शान्त नहीं होता। इस पाप के प्रतिकार के दो ही उपाय है- अपनी भूलों के लिए सच्चे हृदयसे पश्चाताप हो और माता-पिता की ओर से क्षमा मिल जाए। क्षमा जबरदस्ती नहीं, उन्हे सेवा से प्रसन्न करके प्राप्त की जा सकती है। जब पुत्र पिता-माता की इतनी सेवा सुश्रूषा करे, जिससे उनका रोम-रोम उसके लिए आशर्ीवाद दे और उनके अन्तस्करण में पुत्र के लिए स्वभावतः ही मंगलकामना होती रहे तो उस पुत्र का जन्म र्सार्थक मानना चाहिए। यों तो माता-पिता स्वभावसे ही पुत्र की भलाई चाहते, करते और विचारते हैं। परन्तु पुत्र तभी उनके ऋण से मुक्त होता है, जब सेवा और आज्ञा पालन से उन्हें निरन्तर सन्तुष्ट रखे।
शास्त्रों का वचन है-
जीवतो वाक्यकरणात् क्षयाहे भूरिभोजनात्।
गयायां पिण्डदानाच्च त्रिभिः पुत्रस्य पुत्रता।।
पिता के जीते जी उनकी प्रत्येक आज्ञा पालन करे उनकी मृत्यु हो जाने पर प्रति वर्षमृत्यु तिथिपर एकोदिष्ट करके ब्राहृमणों को पर्ूण्ा भोजन से तृप्त करे और गया में पिण्डदान दे- इन तीन बातों से पुत्र का पुत्रत्व र्सार्थक होता है।
किसी भी पाप के लिए पश्चाताप की आग में जलना उत्तम प्रायश्चित है। किये पर पछतावा हो, आगे वैसा कार्य न करने का दृढÞ संकल्प हो और भगवान् की पर््रार्थना की जाए, उनकी शरण में जाकर उन्ही की प्रसन्नता के लिए सर्त्कर्म का अनुष्ठान किया जाए तो सभी पाप भष्म हो सकते हैं। भगवान् के नाम का जप पापों का अमोघ प्रायश्चित्त है।
मनुजी ने एक जगह लिखा है-
हुङ्कारं बाहष्णस्योक्त्वा त्वङ्कारं च गरीयसः।
स्नात्वा˜नश्नन्हः शेषमभिवाद्य प्रसादयेत्।।
मनुस्मृति ११।२०४
अर्थात् जो बाहृमण को डाँट बताए, गुरुजनों को ‘तू’ कहकर अपमानित करे, उसके लिए यह प्रायश्चित है, वह स्नान करके उस दिन उपवास करे और उन गुरुजनों के चरणों में पडÞकर अपने अपराध के लिए उनसे क्षमा माँगे।
माता-पिता को गाली देना तो इससे भी बडÞा अपराध है। अतः इसके लिए भी यही उचित है कि अपराध के अनुसार दो एक दिन उपवास किया जाए। माता-पिता के चरणों में गिरकर किए हुए अपराध के लिए क्षमा माँगी जाए और भविष्य में फिर कभी ऐसी धृष्टता न करने का दृढÞ संकल्प लेकर सदा अपनी सेवाओं से माता-पिता को सन्तुष्ट रखा जाए। साथ ही भगवन्नाम-जप और भगवान की पर््रार्थना भी चलती रहे।
-कुपुत्रो जायेते क्वचिदपि कुमाता न भवति- दर्ुगासप्तशती)

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