मातृदेवो भव

वर्ष्ा का सबसे उत्तम मास आश्विन मास को माना जाता है। यों तो हर पल, हर क्षण की अपनी महत्ता होती है, अपनी गरिमा होती है। हर महीने का अपना महत्त्व होता है, पर हिन्दर्ूधर्म में आश्विन मास और इस मास में पूजित होने वाली अखिल जगत की जननी माँ दर्ुगा का महत्त्वपर्ूण्ा स्थान है। यह हमारा धर्म ही है जो कि हमें सिखाता है कि नारी हर रूप में पूज्या है। शक्ति, विद्या और धन प्राप्ति हेतु हम जिनकी अराधना करते हैं वो स्त्रीरूपा ही तो हैं। महाशक्तियों में जो पाँच प्रमुख शक्तियाँ हैं( लक्ष्मी, सरस्वती, काली, तारा और विश्वस्वरूपा दर्ुगा, ये सब की सब अत्यन्त प्रभुताशाली हैं।
नारी मातृदेवता है। हिन्दू संस्कृति ने उसको माता के रूप में उपस्थित कर इस रहस्य का उद्घाटन किया है कि वह मानव के कामोपभोग की सामग्री न होकर उसकी वन्दनीया एवं पूजनीया है। इसी नाते मानव धर्मशास्त्र में जननी का गौरव उपाध्याय से दस लाख गुना, आचार्य से लाख गुना तथा पिता से हजार गुना बढÞ कर बताया है। नारी का स्त्रीत्व मातृत्व ही है। सन्तान चाहे कुपुत्र निकल जाय, परन्तु जन्मदात्री माता कभी कुमाता नहीं बनती- ‘कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।’ उसका स्नेह और वात्सल्य अपनी सन्तान तक ही सीमित नहीं रहता। प्राचीन काल में जब गुरुकुल से छात्र भीक्षावृत्ति के लिए आते थे तो उन्हें मातृवत् सप्रेम भीक्षा देकर वह उनको ‘मातृवत् परदारेषु’, अर्थात् परायी स्त्री को माता समझने का पाठ पढÞाती थी। आज के सर्न्दर्भ में परिदृश्य अवश्य बदला है पर माता की भावना आज भी वही है।
नारी को यह मातृत्व पुरुष के साथ समानता के सिद्धान्तानुसार किए गए किसी बँटवारे में नहीं मिला है। यदि ऐसा होता तो वह वन्दनीया नहीं हो पाती। शास्त्रीय दृष्टि में उसका या मातृत्व दयामयी जगन्माता का प्रसाद है, जिनका रूप कहलाने का गौरव सम्पर्ूण्ा नारी समाज को मिला है और वो नारियाँ जिन्होंने किसी न किसी रूप में इतिहास के पृष्ठों को अलंकृत किया है और आदर्श स्थापित किया है वे जगन्माता की ही विशिष्ट विभूतियाँ हैं। इस मर्म को न समझ कर पाश्चात्य शिक्षा से प्रभावित लोग धर्म शास्त्रों के उन वचनों की दुहाई देकर, जिन में नारी के जीवन का भार क्रमशः पिता, पति और पुत्र पर डÞाला है, यह भ्रम फैलाने का दुःस्साहस करते हैं कि हिन्दुओं ने नारी के अधिकारों की हत्या की है। वस्तुस्थिति इससे र्सवथा विपरीत है। पाश्चात्य सभ्यता ने आदिम मनुष्य के एक अंग से नारी की उत्पत्ति की कल्पना की और अपने व्यवहार से उसको मनुष्य के सुखोपभोग का यन्त्र बनने के लिए विवश कर अत्यन्त दुखद अवस्था तक पहुँचा दिया है। इसके अनुकरण से आर्य जननी की भी दर्ुदशा हर्ुइ और हो रही है। आवश्यकता इस बात की है कि मानव समाज नारी समाज का समादर एवं संरक्षण करे। महषिर् याज्ञवल्क्य ने आज्ञा दी है(
भतर्ृभ्रातृपितृज्ञातिश्वश्रुश्वशुरदेवरैः।
बन्धुभिश्च स्त्रियः पूज्या…………..।।
अर्थात् पति, भ्राता, पिता, कुटुम्बी, सास, ससुर, देवर, बन्धु बान्धव इस प्रकार स्त्री के सभी सम्बन्धियों का कर्तव्य है कि वे उसका सभी प्रकार से सम्मान करे।
प्रत्येक मनुष्य के इस वैयक्तिक कर्तव्य का र्समर्थन करते हुए धार्मिक वाङ्मय ने व्यष्टि सृष्टि के अर्धभाग से पुरुष की और अर्धभाग से नारी की उत्पत्ति प्रमाणित कर दाम्पत्य जीवन में पति पत्नी की एकात्मता स्थापित की है और पति को पत्नी व्रत और पत्नी को पत्रि्रत में रहने का आदेश दिया है। भगवती श्रुति की घोषणा है- मातृ देवो भव अर्थात् माता को देवता मानो। इसी घोषणा में माता की आराधना का विधान किया गया है। इसी का विराट एवं व्यापक रूप है- शक्ति स्वरूपा माँ दर्ुगा के हर एक रूप की आराधना।
विश्वेश्वरि त्वं परिपासि विश्वं
विश्वात्मिका धारयसीति विश्वम्।
विश्वेशवन्धा भवती भवन्ति
विश्वश्रेया ये त्वयि भक्तिनम्राः।।
विश्वेश्वरि ! तुम विश्व का पालन करती हो। विश्वात्मिका हो, अतः समस्त विश्व को धारण करती हो। तुम विश्वाधिपति की भी वन्दनीया हो। जो लोग भक्तिपर्ूवक तुम्हारे सामने सिर झुकाते हैं, वे सम्पर्ूण्ा विश्व के आश्रयरूप हो जाते हैं।

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