मानव अधिकार आयोग सिर्फ तलब और सुविधाओं के लिए नहीं : कैलाश महतो


कैलाश महतो ,परासी | मानव अधिकार की बात आते ही मानव विकास और उसकी सभ्यता की ओर हमारा ध्यान चला जाता है । वैज्ञानिकों की मानें तो मानव का मानव शरीर धारण भी संघर्ष के मैदान से ही निर्मित है । वैज्ञानिक दाबे के अनुसार पानी में सर्व प्रथम स्व–आविष्कारित अमिबा नामक जीव से ही विभिन्न श्रेणियों को पार करते हुए मानव रुप में विकसित मानव के शुरुवाती जंगली और जलीय जीवन भी संघर्ष और अनेक उतार चढावों से लैस दिखती है । संघर्ष के क्रम में ही शक्ति निर्माण, उसका प्रयोग और दुरुपयोग तथा बलवान और कमजोर मानव हैसियतों का निर्माण होकर अन्याय और अत्याचारों का सिलसिला भी आरम्भ हुआ ।
महाभारत के अनुसार सशक्त और असक्त मानवों द्वारा निर्मित समाज को सूत्रबद्ध और न्यायपूर्ण बनाने हेतु तत्कालिन समय के अनेक प्राचीन महापुरुषों ने जिम्मेबारी सम्हाली थी । मानव बीच उत्पन्न होते रहे तानातान, शक्ति प्रयोग और असमानता के कारण विश्व समाज अनेक युद्धों का शिकार भी होता रहा । उसी क्रम में ईश्वर और शैतान, राम और रावण, कौरव और पाण्डे, प्रल्हाद और हिरण्य कश्यप युद्ध लगायत पहला और दूसरा विश्वयुद्ध को भी मानव समुदाय भुगतने को बाध्य रहा ।
Jack  Donnell y के अनुसार प्राचीन काल में परम्परागत समाज में एक प्रकार की स्वस्फूर्त न्याय, राजनीतिक कानुन और मानव विकास की अवधारणा तय हुई जिसका सम्बन्ध मानवीय मूल्य, मान्यता और उसके महत्व से था ।
भले ही उस समय मानव अधिकार शब्द का प्रयोग नहीं रहा हो । मगर इसके महत्व और अधिकारों को मानव जीवन में उतारने के लिएConstitution of Medina -622_, Al-Risalah aj-huquq -659-713_, Magna Carta -1215_, the Twelve Articles of Mammingen -1525_, the English Bill of Rights -1689_, the French Declaration of the Rights of Man and the Citizen -1789_, and the Bill of Rights in the United States Constitution -1791_ की निर्माण हुई थीं ।
McIntyre के अनुसार Right शब्द का जिक्र सन् १४०० से पहले किसी भी भाषा में होने का प्रमाण नहीं है ।Magna Carta के मध्ययुगिन परिच्छेद समेत में मानव अधिकार का चर्चा नहीें है । अध्ययन से यही मिलता है मानव अधिकार का अवधारणा प्राकृतिक अधिकार से सम्बन्धित है जो प्राकृतिक कानुन से अवतरित हुआ है । उसे सार्वभौम और सर्वव्यापी अधिकार के रुप में परिभाषित किया गया जिसका नेतृत्व (१६वीं सदी में) स्पेन के Fransisco de Victoria cf}/ Bartolome de Las Casas ने किया था ।Las मानव समुदायों के अधिकारों को समान रुप से व्यवस्थित होने का वकालत करते थे । वे Aristotle के विचारधारा को मानकर मानव समुदाय में रहे दास प्रथाओं को अन्त करने के पक्षपाती रहे ।
१७वीं शदी में एक अंगे्रज दार्शनिक व्यजल John Locke ने अपने एक किताब में लिखा कि मानव समुदाय और राज्य दोनों में मानव के जीवन स्वतन्त्र होना चाहिए और इस अधिकार का रक्षा सार्वभौम रुप में होनी चाहिए ।
१८वीं शदी में मानव अधिकार से ओतप्रोत दो बडे प्रमुख घटनाएँ घटींUnited States Declaration of Independence cf}/  French Declaration of the Rights of Man and Citizen जिन्होंने मानव अधिकार रक्षा के लिए क्रान्तिकारी भूमिका निर्वाह की ।
१९वीं शदी में मानव अधिकार स्थापना तथा दासता से मुक्ति का विषय संसार के लिए एक अहम केन्द्र विषय बन गया । ब्रिटीश संसद के सदस्य William Wilberforce ने Atlantic  क्षेत्र में व्याप्त मानव तस्करी और मानव दासता अन्त के लिए जोडदार वकालत की जो तुरन्त संसारभर में फैल कर एक अन्तर्राष्ट्रिय मुद्धा बना और सन् १८३३ में दास मुक्ति कानुन का निर्माण हुआ । संयुक्त राज्य ने दास व्यापार के सारे संस्थायें बन्द कर दी ।
२०वीं शदी के दो विश्वयुद्धों ने भयंकर मानवीय और वैश्विक क्षतियों का कुरुप तस्वीरें पेश कीं । मानवता की धज्जियाँ उडीं । और तब जाकर विश्व समुदायों ने मानव अस्तित्व और उसके जीवनी आयामों को सुरक्षा देने की आवश्यकताओं को महशुश किया । मानव अधिकार रक्षा हेतु अनेक संयन्त्रों के स्थापना के साथ प्रथम विश्वयुद्ध पश्चात् सन् १९१९ में  League of Nations की स्थापना हुई । दूसरे विश्वयुद्ध पश्चात् उस विश्वयुद्ध में सम्बद्ध राष्ट्रों की सहमति से सन् १९४५ में United Nations की स्थापना की गयी जिसका मुख्य उद्देश्य संसार में शान्ति, मानव अधिकार की ग्यारेण्टी, भातृत्व सम्बन्ध तथा मेलमिलाप की भावनाओं को विकसित करना रहा । साथ ही सारे सम्बद्ध राष्ट्रों के सहमति में अन्तर्राष्ट्रिय मानवीय कानुन तथा अन्तर्राष्ट्रिय मानव अधिकार के कानुनों के निर्माण हुए ।
Analyst Belinda Cooper के अनुसार पूर्बी और पश्चिमी भू–क्षेत्रों के शीतयुद्ध के बाद सन् १९९० में मानव अधिकार संगठन ने काफी विकास के साथ सराहना भी पाया ।
Ludwig Hoffmann बताते हैं कि २०वीं शदी के मध्य में इस संगठन की प्रसिद्धि काफी बढी थी जब इसने मानव को राजनीतिक दावों की भाषा प्रयोग की अधिकार और प्रत्याधिकार, उदार पजातन्त्र, सामाजवादी और औपनिवेशिक उन्माद के विरुद्ध आवाज उठाने की अधिकार मानव को प्रदान की ।
नेपाली राज्य और उसके शासन द्वारा शदियों से मधेशियों पर लादे गए राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषिक, शैक्षिक, अवसरीय लगायत रंगभेद, जातिभेद, नश्लभेद और चेहराभेद के विरुद्ध मधेशी समुदाय ७ दशकों से संघर्ष करता आ रहा है । यह बात नेपाल के राष्ट्रिय मानव अधिकार आयोग तथा राष्ट्रिय अन्तर्राष्ट्रिय सम्पूर्ण मानव अधिकार संघ संस्थाओं को अवगत है । ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार नेपाली शासन के चरम उपनिवेश में रहकर दासता की जिन्दगी बिताने को बाध्य मधेशी जनता दासता से मुक्त होकर स्वतन्त्रत मधेश के नागरिक बनना चाहता है । स्वतन्त्र मधेश के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के अन्तरराष्ट्रिय मानव अधिकार चार्टर के मर्म, भावना, निर्देशन और अधिकारों को पूर्णतः पालन करते हुए नेपाल के संविधान २०७२ समेत द्वारा प्रदत मौलिक हक अधिकारों को सम्मान के साथ पूर्ण संवैधानिक, लोकतान्त्रिक और शान्तिपूर्ण रुप में अपने आवाजों को नेपाल सरकार, अन्तर्राष्ट्रिय जगत तथा आम नागरिक समाज में रखने, शान्तिपूर्ण प्रदर्शन, जुलूस, र्याली, सभा सम्मेलन, छलफल तथा अन्तरकृया कार्यकमों को करने पर नेपाल सरकार द्वारा रोकने, हस्तक्षेप करने, वाक स्वतन्त्रता पर रोक लगाने ही नहीं, अपितु अपने घर, गाँव और शहर आये सामाजिक तथा धार्मिक तीर्थ यात्रियों समेत को सेवा करने, पानी पिलाने एवं अपने गाँव और शहर तथा टोल पडोस में रहे गन्दगियों को हटाने के लिए जुटे स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन के नेता तथा कार्यकर्ताओं को पुलिसिया गिरफ्तारी बारम्बार होता रहा है ।
पुलिस के गिरफ्त में रहे स्वराजियों के साथ हिंसक तथा अमानवीय व्यवहार होता रहा है । उनके साथ क्रुर मारपीट, बेइज्जती, गाली गलौज, भेदभाव तथा नश्लिय भाषाओं का प्रयोग होना आम बात हो गयी हैं । नेपाल सरकार तथा उसके प्रहरी प्रशासन द्वारा होे रहे उन सारे दुव्र्यवहारों के पुलिन्दा और सप्रमाण राष्ट्रिय मानव अधिकार आयोग लगायत राष्ट्रिय अन्तर्राष्ट्रिय मानव अधिकार आयोग, नेपाली संचार क्षेत्र आदि को जानकारी कराने तथा मधेशियों पर बारम्बार हो रहे अत्याचारों पर गंभीर होने के लिए अनुरोध करने बावजुद राष्ट्रिय मानव अधिकार आयोग चुप्पी लाद कर बैठा हुआ है ।
मानव अधिकार आयोग किसी जात, धर्म या राष्ट्र विशेष का नहीं, विश्व के सारे मानव समुदाय के समान अधिकार के लिए वकालत करता है । उस मानव अधिकार के धर्म और कर्तव्यों को पूर्णतः पालन करने का शपथ लिए हुए मानव अधिकार आयोग तथा उसके नेतृत्वों का चुप लगना आश्चर्य की बात है ।
बेहिचक हम कह सकते हैं कि वे आयोग न सिर्फ भौतिक रुपों से सजी सजाउ होने के लिए, न उनके नेतृत्व और अधिकारकर्मी सिर्फ तलब और सुविधाओंके लिए नियुक्त हैं ।
हम विश्वास करते हैं कि जिस संयुक्त राष्ट्र संघ के अन्तर्राष्ट्रिय मानव अधिकार पुस्तक में उल्लेखित मूल्य, मान्यता तथा निर्देशनों को पालन करने हेतु शपथ लिया गया है, इमानदारी पूर्वक नैतिकता के साथ काम होगा । तब ही मानव अधिकार दिवस मनाने का सार्थकता पूर्ण होगा । नहीं तो हम यही मानेंगे कि मानव अधिकार दिवस मनाने के बहाने रकम की दुरुपयेगिता होगी । जय मानव अधिकार… ।

 

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