मानव तस्करी पर नो अब्जेक्सन समझौता : देश के लिये सरदर्द

traficing-1श्वेता दीप्ति , १२ फरबरी,काठमाण्डू । यों तो कोई भी कानून और समझौता देश हित के लिए ही बनाया जाता है, या किया जाता है । किन्तु सवाल ये है कि यह कितना कारगर सिद्ध होता है । क्योंकि नेपाल के सन्दर्भ में यह अक्सर देखा गया है कि कई एक निर्णय बिना किसी गृहकार्य के और जल्दबाजी में कर लिया जाता है । २८ गते पोखरा में सम्पन्न नेपाल–भारत सीमा व्यवस्थापन सम्बन्धी संयुक्त कार्यदल के ११वें बैठक में यह निर्णय लिया गया कि भारत होते हुए तीसरे देश में जानेवालों को भारत स्थित नेपाली दूतावास से नो आब्जेक्सन पत्र लेना होगा । पहली नजर में यह निर्णय सही ही जान पड़ता है । जो अवैध तरीके से इस राह को चुनते थे, उनके लिए यह निर्णय उचित हो सकता है किन्तु औरों के लिए यह सरदर्द और एक लम्बी प्रक्रिया से गुजरने के सिवा कुछ नहीं है । इसका सबसे अधिक प्रभाव अगर कहीं पड़ेगा तो वह सीमाक्षेत्र और तराई क्षेत्र है । क्योंकि उनके लिए भारत की राह चुनना सहज होता है । मानव तस्करी को रोकने के लिए सरकार ने यह कदम उठाया है । किन्तु क्या इतने मात्र से यह रुक जाएगा ? मानव तस्करी अर्थात् अवैध रूप से महिलाओं को अन्य देशों में ले जाकर बेचना । इसके मूल में क्या है सरकार को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता थी । गरीबी और अशिक्षा ये दो वो मूल वजहें हैं जिसकी वजह से दुर्गम और सुदूर क्षेत्र की महिलाएँ इसका शिकार होती हैं । कभी शादी का बहाना करके तो कभी नौकरी दिलाने का लालच देकर उन्हें शारीरिक व्यापार के दलदल में धकेला जाता है । क्या इस ओर सरकार को कोई ठोस कदम नहीं उठाना चाहिए ? भारत की राह से जाने वालों के साथ ही सिर्फ गलत नहीं होता, नेपाल से होकर जो जाते हैं, उनके साथ भी गलत हो रहा है और  सरकार उनकी  सुरक्षा के प्रति उदासीन है ।

t-2रेमीटेन्स पर ध्यान होता है पर जनता की सुरक्षा से उनका वास्ता नहीं होता । आए दिन विदेशों में दुर्घटना का शिकार महिला और पुरुष दोनों हो रहे हैं । महिलाएँ मैनपावर के द्वारा जाती हैं किन्तु घरेलु कामदार बनकर शोषण का शिकार होती हैं और कभी मानसिक रूप से विक्षिप्त होकर लौटती हैं, तो कभी उनकी लाश आती है । युवावर्ग पलायन कर रहे हैं और वहाँ जाकर आत्महत्या कर रहे हैं और हमारी सरकार खामोशी से तमाशा देख रही है । नो अबजेक्सन पत्र लागु करने के पीछे अधिकारियों की दलील है कि भारत की राह होकर अवैध रूप में नेपाली जनता को विदेशों में भेजा जा रहा है, जिसकी वजह से विदेशों में नेपालियों की स्थिति दयनीय हो जाती है वो ना घर के होते हैं और ना घाट के । यह मान भी लिया जाय तो भी यह सवाल पीछा नहीं छोड़ती कि जो नेपाल होकर जाते हैं सरकार उनकी कितनी गारंटी लेती है । भेड़ बकरियों की तरह उन्हें कई कई महीने रखा जाता है ।  विदेश जानेवाले अपना घरबार सभी गिरवी रखकर जाते हैं उनके ऊपर इस नए निर्णय से शुल्क का एक और नया दवाब पड़ने वाला है । दूतावास से पत्र लेना सहज तो बिल्कुल नहीं होगा इस स्थिति में मानसिक, शारीरिक और आर्थिक ये सभी भार नेपाली जनता पर पड़ने वाली है और अधिकारियों की जेब भरने वाली है  यह तो तय है । गरीब जनता अपनी जेब कितनी खाली कर सकती है और खजाना कितना भर सकता है इस ओर सोचने से ज्यादा अच्छा होता कि सरकार जनता के हित और प्रगति के लिए सोचती । अगर वाकई जनता के हित में सरकार कुछ करना चाहती है तो उसे देश में ही स्थिति सुधारनी होगी  । जबतक गरीबी है और अशिक्षा है तो पलायन होता रहेगा चाहे वह सही तरीके से हो या गलत तरीके से क्योंकि गलत करने वालों के लिए कानून एक बनाया जाता है पर वो उससे बच निकलने के सौ उपाय ढूंढ लेते हैं ।

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