मानव सेवा ही सच्ची ईश्वर सेवा है – लियो टॉलस्टाय

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रूस के एक गाँव में एफिम और एलिशा नाम के दो व्यक्ति रहते थे। वे बड़े घनिष्ठ मित्र थे। एफिम गंभीर और बुद्धिमान था। वह बहुत धनी था। उसका परिवार बड़ा था, परंतु वह अपने परिवार की देखभाल बड़े ध्यान से करता था। एलिशा न धनी ही था और न ही निर्धन। वह मधुमक्खियाँ पाल कर अपने परिवार का पेट पालता था। वह बहुत दयालु था और सदा प्रसन्नचित्त रहता था। वह अपने परिवार व पड़ोसियों के साथ प्रेमपूर्वक रहता था। बहुत पहले दोनों मित्रों ने साथ-साथ जेरुसलेम की तीर्थ यात्रा करने का निश्चय किया था। एलिशा तो सदा चलने को तैयार रहता था, परंतु एफिम को समय नहीं मिल पाता था। उसके पास सदा कुछ न कुछ काम रहता। एक काम समाप्त होता तो दूसरा शुरू हो जाता।

एक दिन एलिशा ने जोर देते हुए कहा- “क्यों मित्र, हम प्रतिज्ञा कब पूरी करेगे?” एफिम का चेहरा उदास हो गया। वह बोला- “अभी हमें प्रतीक्षा करनी होगी।
मेरे पास यात्रा के लिए पैसा नहीं है।”

एलिशा हँसा और बोला – “मित्र! तुम्हारे पास मुझसे दस गुना अधिक धन है और फिर भी तुम ऐसी बात करते हो। आत्मा की पवित्राता से बढ़कर और कुछ नहीं है। तीर्थ यात्रा से आत्मा पवित्र होती है। हमने तीर्थ यात्रा की प्रतिज्ञा की है, अतः हमें अवश्य चलना चाहिए।”
अंत में एलिशा अपने मित्र को समझाने में सफल हो गया। एफिम ने अपने साथ बहुत-सा धन लिया। एलिशा ने केवल उतना ही लिया, जितना आवश्यक था। दोनों यात्रा पर चल दिए। लेकिन जहाँ एलिशा प्रसन्न और बेफिक्र था, वहाँ एफिम अशांत था। उसे अपने घर की चिंता हर समय लगी रहती थी।

चलते-चलते दोनों एक छोटे से गाँव में पहुँचे। उस गाँव में अकाल के कारण त्राहि-त्राहि मची हुई थी। उन्हें झोंपड़ी में से लोगों की चीख-पुकार सुनाई दी।
उन्होंने दरवाजा खटखटाया, लेकिन किसी ने नहीं सुना। एलिशा ने दरवाजे को धक्का दिया तो वह खुल गया। वे अंदर घुस गए। झोंपड़ी के अंदर का वातावरण बहुत ही दुर्गंधपूर्ण था। एक स्त्री भूमि पर मरणासन्न अवस्था में पड़ी थी। स्त्री ने पूछा – “आप लोग कौन हैं? क्या चाहिए? हमारे पास तो कुछ भी नहीं है।”

उसी समय एक बच्चा बोला – “बाबा, हम भूखे हैं, हमें रोटी दो।”

तभी एक पुरुष लड़खड़ाता हुआ आया और बोला- “हमें रोग और भुखमरी ने घेर रखा है। मेरा पुत्रा भूख से मर रहा है।”
एलिशा ने अपना थैला खोला और उसमें से एक रोटी लड़के की ओर बढ़ाई।
लड़का रोटी पर टूट पड़ा और देखते-ही-देखते वह पूरी रोटी खा गया। उस स्त्री और पुरुष को भी उसने दो-दो रोटियाँ खाने को दीं। फिर वह कुएँ से पानी भर लाया और उन्हें पिलाया।

एफिम झोंपड़ी के बाहर ही बैठा रहा, वह अंदर भी नहीं आया। एलिशा ने उसे सारा हाल कह सुनाया। एफिम बोला – “क्या हम इस गंदी झोंपड़ी में ही रुके रहेंगे?
ऐसा करने से तो हम भी बीमार हो जाएँगे। हमें जेरुसलेम भी पहुँचना है। व्यर्थ में समय नष्ट करना ठीक नहीं होगा।”
एलिशा ने उत्तर दिया – “मित्र, आप चलें। मैं इन लोगों को ऐसी दशा में छोड़कर नहीं जा सकता। मुझे कुछ दिन यहीं रुक कर इनकी सेवा करनी ही होगी।” एफिम अकेला ही चल दिया।

एलिशा उन तीनों प्राणियों की सेवा में लग गया। सुबह होते ही उसने घर की सफाई की, चूल्हा जलाया और भोजन बनाया। घर के लिए आवश्यक सामग्री खरीद लाया। एक दिन, दो दिन और फिर तीन दिन बीत गए। उसे समझ में नहीं आता था कि क्या करे। एक ओर वह सोचता कि मुझे जाना चाहिए, लेकिन दूसरी ओर उन लोगों की दशा देखकर उनका हृदय भर आता था। अंत में एलिशा ने उन लोगों के साथ ही रुकने का निश्चय किया। उसकी सेवा से उन तीनों प्राणियों में शक्ति आ गई।

एलिशा ने उन लोगों के दूध् के लिए एक गाय और खेत जोतने के लिए एक घोड़ा खरीदा। साथ ही फसल आने तक के लिए अनाज भी खरीदकर रख दिया। एक दिन एलिशा ने सुना कि बूढ़ी स्त्री अपने बेटे से कह रही थी – “बेटा! यह मनुष्य नहीं, देवदूत है। ऐसे भले मनुष्य संसार में अधिक नहीं हैं।” एलिशा ने जब अपनी प्रशंसा सुनी तो उसने सोचा कि मुझे यहाँ से चल देना चाहिए। इन लोगों के लिए मैंने अगली फसल तक के लिए प्रबंध् कर ही दिया है।

अगले दिन जब घर के सब लोग गहरी नींद सो रहे थे, वह चुपचाप चल पड़ा।
उसके पैसे समाप्त हो चुके थे। इसलिए उसने जेरुसलेम जाने का विचार छोड़ दिया और घर की ओर चल पड़ा। घर पहुँचने पर उसके परिवार के लोग बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने पूछा – “क्या आप जेरुसलेम हो आए? एफिम कहाँ है?” एलिशा ने उन लोगों को कुछ नहीं बताया, केवल इतना कहकर टाल दिया कि ईश्वर की इच्छा नहीं थी कि मैं वहाँ जाऊँ। मेरा सारा धन मार्ग में ही समाप्त हो गया, अतः मैं एफिम के साथ नहीं जा सका और रास्ते से ही लौट आया।

उधर एफिम झोंपड़ी छोड़ने के बाद जितना शीघ्र हो सका, जेरुसलेम की ओर चला। वहाँ पहुँचकर वह प्रार्थना करने के लिए चर्च में गया। चर्च में बड़ी भीड़ थी। उसे सदा अपने धन की चिंता लगी रहती। प्रार्थना के समय भी वह जब-तब टटोलकर देख लेता कि कहीं भीड़ में उसकी कोई जेब न काट ले। पैसों की चिंता में प्रार्थना में उसका मन ही न लग रहा था।
चर्च के भीतरी भाग में छत्तीस दीपक जल रहे थे। किसी भी तीर्थ यात्री को वहाँ तक जाने की अनुमति नहीं थी, परंतु दीपकों के प्रकाश के पीछे उसने एक ऐसा दृश्य देखा जिससे वह आश्चर्यचकित रह गया। वहाँ उसे एक वृद्ध पुरुष की झलक दिखाई दी। वह बिलकुल एलिशा की तरह था।

एफिम सोचने लगा कि यह एलिशा कैसे हो सकता है। उसे तो मैं पीछे छोड़ आया हूँ। परंतु जब उसने फिर उसकी ओर देखा, तो उसे पूर्ण विश्वास हो गया कि वह एलिशा ही है। अपने मित्र को देखकर उसे बड़ी प्रसन्नता हुई। वह सोचने लगा कि एलिशा बड़ा भाग्यशाली है। उसके मन में आया कि अगले दिन मैं भी अपने मित्र की सहायता से चर्च के भीतरी भाग में पहुँच सकूंगा।

एफिम तीन सप्ताह जेरुसलेम में रहा। वह प्रतिदिन चर्च में जाता। वहाँ अपने मित्र को विशेष स्थान पर खड़ा देखता परंतु उसके बाद उसका कहीं पता न चलता।

अब एफिम अपने घर की ओर चला। रास्ते में वह उसी गाँव में पहुँचा, जहाँ एलिशा रुका था। झोंपड़ी के दरवाजे पर एक बूढ़ी स्त्री दिखाई दी। वह बोली – “आइए बाबा, हमारे साथ ठहरिए और भोजन कीजिए। हम सदा अपने यहाँ यात्रियों का स्वागत करते हैं। एक यात्री ने ही हमारी प्राण रक्षा की थी।”

एफिम समझ गया कि वह स्त्री एलिशा के बारे में ही बात कर रही है। जब एफिम ने एलिशा के बारे में पूछा, तो उस स्त्री ने कहा – मैं नहीं जानती वह कौन था, मनुष्य अथवा देवदूत। वह हम सबसे प्रेम करता था। वह अपना, नाम बताए बिना ही यहाँ से चला गया। परमात्मा उसका भला करे। यदि वह यहाँ न आया होता, तो हम सब मर ही गए होते ।
फिर उस स्त्री ने एफिम को भोजन कराया और सोने के लिए स्थान बताया।

एफिम विश्राम के लिए लेटा, पर उसे नींद नहीं आई। उसके मन में निरंतर एलिशा का ध्यान आता रहा। उसे याद था कि उसने जेरुसलेम के चर्च में एलिशा को विशेष स्थान पर खड़े देखा था और वह यह तो जानता था कि वह एलिशा को इसी झोंपड़ी में छोड़ गया था।
उसकी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था। मन-ही-मन उसे ऐसा लगने लगा कि ईश्वर ने शायद उसकी तीर्थ-यात्रा स्वीकार नहीं की परंतु एलिशा की तीर्थयात्रा अवश्य स्वीकार हुई है।

प्रातःकाल वह अपने गाँव की ओर चल पड़ा। गाँव पहुँचकर वह सबसे पहले एलिशा के घर गया। एफिम को देखकर वह बहुत प्रसन्न हुआ और बोला – मित्र, आशा है आप जेरुसलेम की यात्रा सकुशल पूरी कर आए?

एफिम बोला – मित्र, मेरा शरीर तो वहाँ अवश्य पहुच गया, परंतु मेरी आत्मा वहाँ पहुच सकी, इसमें मुझे संदह है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि तुम्हारी आत्मा वहाँ थी। मैंने अपनी आँखों से तुम्हें चर्च के भीतरी भाग में दीपमाला के पीछे खड़े देखा था। तुम्हीं सच्चे तीर्थयात्री और ईश्वर के प्रिय हो। मैं समझ गया हूँ कि मानव सेवा ही सच्ची ईश्वर सेवा है।

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