माफिया के चंगुल में वन:बिनय दिक्षित्

यूँ तो वातवरण शुद्ध और समुचित रखने के लिए भी वन की उपयोगिता पर कर्मचारी भाषण देते हुए नहीं थकते, जिले में हो रहे वन अतिक्रमण और तस्करी पर वन कर्मचारियों की चुप्पी भी यह दर्शाती है कि मामला कहीं तो पेचीदा है । हिमालिनी ने उस क्षेत्र का दौरा किया जहाँ वन सुरक्षा के लिए पुलिस भी है और इलाका वन कार्यालय भी, लेकिन वन में माफियाकरण और तस्करी आम बात है । जिला वन कार्यालय बाँकी के अभिलेख को मानें तो २४०० हेक्टर वन की जमीन माफिया के कब्जे में है ।For Binay Dichit (2)
वन कार्यालय की उदासीनता का प्रत्यक्ष उदाहरण है, राष्ट्रपति चुरे संरक्षण कार्यक्रम । अनियन्त्रित उत्खनन, बालु और गिट्टी की तस्करी भी आम बात है, वन क्षेत्र में शिकार करना, जड़ीबूटी निकासी करना वन कर्मचारियों के लिए भी आम बात है ।
२०७० साल पौष महीने में वन कार्यालय ने मीडिया और आम नागरिकों के दबाव में वन कब्जा भूमि खाली कराने का अभियान चलाया । अभियान के दौरान २ हजार १ सौ मकान जो वन क्षेत्र में थे उन्हें ध्वस्त किया गया ।
तस्करी और माफियागिरी का ताजा नमूना है जिले का राप्तीपार क्षेत्र । जहाँ वन न तो निकुन्ज में है, और न राष्ट्रपति संरक्षण योजना में । हालाँकि योजना चल रही है लेकिन सिर्फ कागजी रूप में । वन कार्यालय ने जिले के विभिन्न पक्षों पर अध्ययन किया और पाया कि राप्ती पार का क्षेत्र तस्करी के मामले में अव्वल है ।
जिला वन अधिकारी पुष्पराज बर्तौला ने हिमालिनी से बातचीत में बताया कि, असुविधा के नाते वन कर्मचारी भी राप्ती पार जाना नहीं चाहते । फिर भी वन कार्यालय के मातहत में इलाका वन कार्यालय बैजापुर और इलाका वन कार्यालय नरैनापुर स्थापित किए गए हैं ।
दो कार्यालय में एक दर्जन कर्मचारी नियुक्त हैं, जिनका काम सिर्फ वन सुरक्षा है । लेकिन आए दिन काठ तस्करी के मामले जब उजागर होने लगे तो यह जाँच का विषय बन गया कि तस्करी कैसे सम्भव हो रहा है ?
नेपालगन्ज से करीब ३० किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित इलाका वन कार्यालय नरैनापुर के इन्चार्ज अनिरुद्ध यादव को काठ तस्करी प्रकरण में जिला वन कार्यालय ३ बार पत्राचार कर कारवाही करने की चेतावनी दी ।,
स्थानीय सुमन शर्मा ने हिमालिनी को बताया कि, यहाँ तस्करों का भी रेट है । बिना वन अधिकारी के साँठगाँठ काठ तस्करी करना सम्भव नहीं है । राप्तीपार क्षेत्र के ७ गाबिस से भारतीय सीमा का भी सम्बन्ध है । खुली सीमा, वन पदाधिकारी की मिलीभगत, यातायात की असुविधा, सुरक्षा ब्यवस्था की कमी जैसे कारणों से तस्कर को ज्यादा परिश्रम नहीं करना पड़ता । इलाका वन कार्यालय नरैनापुर तस्करों अखाड़ा है, स्थानीय मजीद खाँ ने कहा, यहाँ तस्करी करने के लिए कर्मचारियों और पुलिस दर रेट है, जिसके हिसाब से हर महीने भुगतान करना पड़ता है ।
ट्राली से मिट्टी भी तस्करी होती है, स्थानीय शिवराम मिश्रा ने बताया, भारतीय सीमावर्ती क्षेत्रों ईंट उद्योग स्थापित होने के कारण बालु और मिट्टी की तस्करी तीब्र है । वन क्षेत्र से चिमनी में प्रयोग की जानेवाली लकड़ी भी सप्लाई होती है उन्होंने कहा, ऐसा लगता है यहाँ कानून नहीं है ।
जिला वन कार्यालय के विवरण के अनुसार उच्चस्तर में काठ तस्करी होती है । लेकिन पत्थर, बालु, मोरंग, जड़ीबूटी और मिट्टी आदि के तस्करी की घटनाएँ भी सामने आती रही हैं । वन क्षेत्र के नालों में हो रहे अवैध खनन के कारण पिछले दिनों राप्ती नदी के आसपास का क्षेत्र मरु भूमि होती जा रही है । बाढ़ की समस्या और सूखे के लक्षण भी वन विनाश के कारण दिखाई दे रहे हैं, प्रकोप ब्यवस्थापन पर काम कर रहे युवा राम निवास यादव ने कहा, इसी रफ्तार से वन विनाश होता गया तो गाबिस क्षेत्र में उत्पादनयुक्त जमीन की किल्लत बढ़ जाएगी ।
राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिवद्धता अनुसार देश में ४० प्रतिशत वन होना अनिवार्य बताया गया है । सहायक वन अधिकृत गणेश खड़का ने बताया कि हाल में ३९.६ प्रतिशत वन मात्र है । उन्होंने बताया कि सरकारी नीति के अनुसार कार्यक्रम और बजट प्राप्त न होने के कारण बृक्षारोपण का काम सुस्त गति पर है ।
खड़का ने बताया कि जिले में १७ गाबिस बन के रेन्ज से काफी दूरी पर हैं । उन्हें वन की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए निजी वन विस्तार का कार्यक्रम लाया गया है । उन्होंने बताया कि साढ़े ९ हेक्टेयर भूमि में वृक्षारोपण किया जा चुका है ।
वन सुरक्षा चिन्ता का विषय है, वन अधिकृत वर्तौला ने कहा, प्रयास करने के बावजूद भी कभी कर्मचारी की गलती से कभी सूचक की गलती से तस्कर हाथ में नहीं आते ।
कैसे सम्भव है शिकन्जा ?
स्थानीय सामुदायिक वन के अध्यक्ष विजयजीत सिंह ने बताया कि वन क्षेत्र की सुरक्षा के लिए जनता को स्वयं आगे आना पडेÞगा । सुरक्षा की स्थिति पर विचार करते हुए सरकार ने सन २००५ में वन को समुदाय में हस्तान्तरण किया । इस समय गाँव गाँव में वन सुरक्षा के लिए सामुदायिक वन उपभोक्ता समिति गठित हैं । लेकिन आम उपभोक्ता सामुदायिक वन समूह से सहमत नहीं है । बाँके हिरमिनिया निवासी उमाकान्त यादव ने बताया कि सूखा, ढला, पडा के नाम पर सामुदायिक वन हरे वृक्ष पर निशाना लगाते हैं ।
आम उपभोक्ता के नाम पर चन्द माफिया के कब्जे में सिमटकर रह गया है वन समूह । स्थानीय स्तर पर जहाँ उपभोक्ता सचेत हैं वहाँ, कानूनी हिसाब से भी तस्करी होती है । फत्तेपुर निवासी हरिराम थारु ने कहा, व्यक्ति के वृक्ष में वन का वृक्ष रख कर वन कर्मचारी टाँचा लगाते हैं । वन क्षेत्र के काठ को व्यक्ति विशेष के काठ में रखकर कानूनी मान्यता मिल जाती है, एक वन कर्मचारी ने बताया, सुरक्षा करने वाले लोग जब चोर होे जाएँ तो सुरक्षा की उम्मीद नहीं की जा सकती । वन क्षेत्र की सुरक्षा के लिए नियुक्त कर्मचारी तन्त्र आर्थिक लाभ में अटका हुआ है ,।
जनस्तर से आवाज नहीं उठती ऐसी बात नहीं, नरैनापुर निवासी रमेश शर्मा ने बताया, काठ माफिया को गिरफ्तार करने के लिए उन्होंने ७ कर्मचारियों को फोन किया, लेकिन असफलता ही हाथ लगी ।
कुछ लोगों का फोन तो उठा नहीं, ३ लोगों का मोबाइल बन्द मिला, बाँके जिला अधिकारी रविलाल पन्थ ने बताया, कारवाही न करे या फोन न उठाने के कारण हुए क्षति पर स्वयं कर्मचारी जिम्मेवार है ।
उन्होंने कहा, कर्मचारी की जवाबदेही है उसे फोन उठाना ही पड़ेगा । काठ तस्करी के कारण स्थानीय स्तर पर हुए क्षति का जायजा लेकर सम्बन्धित कर्मचारी से असूल किया जाएगा ।
समस्या की जड़ भारतीय चिमनी
पिछले २ वर्षों से काठ तस्करी कर रहे बाँके कालाफाँटा निवासी एक तस्कर ने बताया सीमावर्ती क्षेत्र में स्थापित भारतीय ईंटा उद्योग चिमनी ही समस्या की वास्तविक जड़ है । नेपाली क्षेत्र से तस्करी होने वाला काठ, मिट्टी, बालु और मोरङ्ग ईंटा उद्योग के प्रयोग में जाता है ।
भारतीय क्षेत्र ककरदरी से बघौडा तक सीमावर्ती क्षेत्र में ८ ईंटा उद्योग स्थापित है । सीमा से सटा हुआ है भारतीय वन । लेकिन कड़ी सुरक्षा के कारण ईंटा उद्योग मिट्टी सहित सभी कच्चा पदार्थ बाहर से ही मंगवाते हैं ।
ईंटा उद्योग का ८० प्रतिशत उत्पादन तस्करी के माध्यम से फिर नेपाल में ही बिक्री होता है । स्थानीय लोगों ने बताया नेपाली क्षेत्र में सुविधा के अनुसार ईंटा उद्योग न होने के कारण भारतीय क्षेत्र पर ही निर्भरता है

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