मायूस मधेश यह सवाल कर रहा है कि आखिर ये दोगली नीति क्यों ?

modi-1श्वेता दीप्ति,काठमाण्डू ,२३ नवम्बर २०१४ । जनता की भावना के साथ खेलने का सत्ता को कोई अधिकार नहीं है ।  उनकी भावना को पहले तो हवा देते हैं फिर अपने स्वार्थ हेतु उन्हीं की भावना को हथियार बनाकर उनका शोषण करते हैं । आज मायूस मधेश यह सवाल अपने आकाओं से कर रहा है कि आखिर ये दोगली नीति क्यों ?

बात बहुत पुरानी नहीं है जब १७ वर्षों के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री का नेपाल आगमन हुआ । जब सत्ता के यही चेहरे  साम, दाम, दण्ड भेद के साथ कुछ मिल जाने की उम्मीद के साथ मोदी का इंतजार कर रहे थे । आज उन्हीं चेहरों ने अपनी पूरी कोशिश लगा दी कि मोदी जनकपुर ना जाएँ । कभी सुरक्षा के नाम पर, कभी सुविधा के नाम पर तो कभी उन्हीं मधेशियों के नाम पर जो आतिथ्य सत्कार के लिए बेताब थे, मोदी का जनकपुर भ्रमण को रोकने की पुरजोर कोशिश की जा रही थी । जनकपुर भ्रमण को इतना विवादित बना दिया गया कि, आज जो परिणाम सामने है वह तो होना ही था । कोई राजनयिक सहर्षता के साथ आपके यहाँ आएगा, जबरन नहीं । अगर देश सक्षम नहीं था तो यह बात उस समय हो जानी थी, जब मोदी ने जनकपुर जाने की इच्छा जाहिर की थी । कम से कम एक कूटनीतिक असफलता का ठप्पा तो नहीं लगता । किन्तु तभी तो उनकी जुवान में चाशनी घुली थी ।

भले ही भारतीय प्रधानमंत्री की व्यस्तता का हवाला देकर भ्रमण रद्द किया गया हो किन्तु पर्दे के पीछे का सच सब को पता है । मोदी, जिनकी शब्दावली में व्यस्तता और थकान जैसे शब्द नहीं हैं, जो देश और विदेश की धरती को एक किए हुए हैं, उनके लिए दिल्ली से कश्मीर और झारखण्ड से जनकपुर की दूरी कोई मायने नहीं रखती । जिनकी दिली इच्छा थी माँ जानकी की नगरी में आना वो व्यस्तता के नाम पर पीछे नहीं हट सकते । किन्तु एक सही मेहमान की तरह सही समय पर मेजवान की नीयत का अंदाजा लगाकर जो फैसला किया गया वो सही है । अभी तो सत्ता के लिए जश्न मनाने का समय है क्योंकि हालात ऐसे हैं कि चित भी मेरी और पट भी मेरी । लेकिन इसका दूरगामी असर अवश्य होगा जो देश हित में नहीं होगा । एक असफल और गलत संदेश तो विश्वपटल पर सम्प्रेषित हो ही चुका है । कई जेहन में यह भी है कि मोदी ने नेपाली सत्ता का ही साथ दिया है क्योंकि भारत को पहाड़ से जो फायदा है वो मधेश से नहीं । इस सोच का जन्म लेना भी लाजमी है क्योंकि प्रत्यक्षतः कुछ ऐसा ही लग रहा है । पर वो जनकपुर भारत के फायदे के लिए नहीं बल्कि अपनी धार्मिक अभिलाषा की पूर्ति हेतु जा रहे थे और पर्यटकीय दृष्टिकोण से फायदा मधेश को मिलता । अगर उनकी विदेश यात्रा को देखा जाय तो यह स्पष्ट जाहिर होता है कि वो हर वो जगह जाना चाहते हैं जो सांस्कतिक और धार्मिक विरासत से सम्बद्ध है ।

मोदी जी का पिछला भ्रमण नेपाली जनमन को उम्मीदों से भर गया । एक नए और उज्ज्वल भविष्य की आशा ने सभी को तरंगित किया जिसमें मधेश भी शामिल था । किन्तु मोदी जी का प्रत्यक्षतः मधेश को सम्बोधित ना करना मधेश की जनता को आहत कर गया था । किन्तु उनकी जनकपुर दर्शन की इच्छा ने मधेशी मन को यह उम्मीद दी कि चलो आज नहीं तो कल मोदी मधेश से वाकिफ हो पाएँगे । मोदी जी ने कहा मिलकर चलें, किन्तु वर्तमान को देखकर यह सवाल करने का मन करता है कि किनके साथ मिलकर चलें ? उनके साथ, जो सिर्फ लाभ लेना जानते हैं, लाभ देना नहीं, या उनके साथ जिनकी नीयत में शोषण का बीज इस कदर जड़ पकड़े हुए है, जिसमें मधेश के लाभ का फल, फल ही नहीं सकता । जहाँ समानता होती है मिलकर कदम वहीं चलते हैं, यह अंदाजा तो शायद अब उन्हें भी हो गया होगा । सुषमा स्वराज ने कहा मधेशी दूसरे दर्जे का नागरिक कैसे है ? अगर आज की स्थिति का आकलन वो करें तो जवाब उन्हें खुद ब खुद मिल जाएगा । जाहिर है कि मधेश सिर्फ मोहरा है जिसे फेंकना और समेटना सत्ता जानती है । किन्तु  कभी कभी असफलता में ही सफलता के तत्व समाहित होते हैं, कम से कम इन चंद दिनों में जनकपुर ने विश्व फलक पर अपना नाम तो दर्ज करा ही लिया है । 

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