मार्क्सवाद और राष्ट्रीय मुक्ति

गोपाल ठाकुर:आज नेपाल में नया संविधान बनाने का प्रयास जारी है । हम सन् २००६ से ही इस प्रयास में लगे हैं । ऐसा भी नहीं कि हमारे पास अभी तक संविधान ही नहीं था । तुलनात्मक रूप में सब से अधिक बार हमारे यहाँ संविधान बनाए गए हैं । सन् १९४८, १९५१, १९५९ और १९६२ तक नेपाल के राणा तथा शाही शासकों ने चार संविधान देने के प्रयास किए । जनता ने इन चारों संविधान में अपने को कुंठित पाया । सन् १९९० के संयुक्त जनआंदोलन के बाद जनता के बीच से कुछ नेतागण सम्मलित एक आयोग ने संविधान बनाया । उसे दरबार ने अपने हिसाब से कुछ तोडÞमरोडÞ सहित जनता में सन् १९९० में ही र्सार्वजनिक किया । फिर भी उसकी भूरी­भूरी प्रशंसा हर्ुइ और कहा गया कि वह विश्व का एक उत्कृष्ट संविधान था । इस के बावजूद उस संविधान ने एक दशक भी पूरा नहीं किया था कि, देश पुनः द्वन्द्व में फँस गया । इस प्रकार हमारे यहाँ पाँच बार संविधान निर्माण का प्रयास विफल होते हुए देखा गया है । आखिर इसके कुछ कारण तो होंगे –
कारण स्पष्ट हंै, राणाओं की गिरफ्त में रही राजशाही ने जनता के बल पर अपनी उन्मुक्ति के साथ सन् १९५१ में दो महत्वपर्ूण्ा रूपांतरण की घोषणा की थी । तत्कालीन राजा त्रिभुवन ने दिल्ली से काठमांडू विमानस्थल पर पहुँचते ही कहा था कि, नेपाल में गणतंत्रात्मक शासन व्यवस्था होगी और निर्वाचित जन-प्रतिनिधियों की संविधान सभा से नया संविधान बनेगा । परंतु राणाशाही की गिरफ्त से निकलते ही राजशाही ने गिरगिट की तरह अपना रंग बदल लिया और अपने इन दोनो वादों से मुकर गई । वास्तव में नेपाल की जनता ने उसे आस्तीन का साँप ही पाया । सन् १९९० के संविधान में भी राजशाही ‘संयुक्त जन आंदोलन’ भी लिखने को राजी नहीं हर्ुइ, जिसके आगे घुटने टेककर उसे इसकी घोषणा करनी पडÞी थी ।marksbad
आखिर सन् १९९६ से ही जनता की प्रतिनिधिमूलक भागीदारी माओवादियों के जनयुद्ध में होने लगी और सन् २००६ में तो नेपाल की सडÞकों पर जनसागर ही उमडÞ पडÞा था । जनयुद्ध और जनव्रि्रोह दोनों के बल के आगे राजशाही ने फिर से घुटने टेक दिए । देश में लोकतंत्र स्थापित हुआ, राजशाही निलंबित हर्ुइ, नेपाल का अंतरिम संविधान, २००७ का निर्माण हुआ । स्थायी संविधान के लिए संविधान सभा का निर्वाचन हुआ और इसकी पहली बैठक से राजशाही को विधिवत् उखाडÞ फेंका गया । तब से संवैधानिक रूप से नेपाल संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र घोषित है ।
निश्चित रूप से राजशाही के २४० वर्षों में अगर हम केवल अर्थ राजनीतिक शोषण में ही होते तो हमारा लोकतांत्रिक गणतंत्र से ही काम चल जाता, किंतु ऐसा नहीं है । इस दौरान हमारा जातीय, भाषिक, सांस्कृतिक, क्षेत्रीय, सांप्रदायिक हर प्रकार से शोषण हुआ है । सही कहा जाए तो हम सन् १७६९ से ही गोरखा साम्राज्य में जी रहे हैं । कहना नहीं पडÞेगा, यह साम्राज्यवाद पूँजीवादी न होकर सामंती है । मार्क्सवादी साहित्यों में इसका जिक्र सामान्यतया नहीं किया जाता । वह इसलिए कि मार्क्स के समय तक यूरोप में सामंतवाद का अंत हो चुका था । औद्योगिक व|mांति का प्रतिफल वहाँ की जनता और पूँजी निवेशकों को मिल रहा था । इसलिए मार्क्स का निशाना मुख्य रूप से पूँजीवादी साम्राज्यवाद पर रहा, जहाँ हर प्रकार का अर्थ राजनीतिक शोषण होता है । परंतु सामंतवाद पूँजीवाद से पश्चगामी होने के कारण वहाँ जातीय, भाषिक, सांस्कृतिक, क्षेत्रीय, धार्मिक, सांप्रदायिक शोषण मुख्य होते हैं और अर्थ­राजनीतिक शोषण इन पर आधारित होता है । अर्थात् वह हमारा शोषण पहले पहचान के आधार पर करता है, जिसका प्रत्युत्पादन हमंे अर्थ­राजनीतिक शोषण के रूप में मिलता है । तो अगर हम ने सामंती साम्राज्यवाद से सन् २००८ में मुक्ति का ऐलान किया है तो इसके जरिए पहचान पर आधारित हर तरह के शोषण का खात्मा भी करना होगा ।
इस अनिवार्य शर्त की पर्ूर्ति दो तरीकों से किया जा सकता है । एक तरीका तो यह है कि इस सामंती साम्राज्यवाद के उपनिवेश के रूप में रहे सभी जनपदों या प्रांतों को स्वाधीनता दे दी जाए । पर हमारा भूराजनीतिक परिवेश शायद उसकी इजाजत नहीं देता है । इसीलिए हमारे पक्ष में यह विकल्प कारगर नहीं है । ऐसी स्थिति में उत्तम विकल्प संघीयता ही है ।
जब संघीयता की बात की जाती है तो उसे भी विश्व में चल रहे अभ्यासों के मद्देनजर हम भौगोलिक संघीयता और पहचान संबद्ध संघीयता के रूप में पाते हैं । विस्तृत भूभाग में सुचारू शासन व्यवस्था के लिए भौगोलिक संघीयता कारगर होती है । परंतु भौगोलिक संघीयता पर्ूण्ा स्वायत्त नहीं होती, ना ही इसकी जरूरत ही समझी जाती है । चीन की प्रांतीय व्यवस्था और बहुत हद तक भारत भी इसके उदाहरण हैं । किंतु हमारा परिवेश इससे बिल्कुल भिन्न है । सब से पहले नेपाल अपने पडÞोसियों की तुलना में बहुत ही छोटा है । इसलिए यहाँ भौगोलिक संघीयता के बजाय एकात्मक शासन व्यवस्था ही ठीक बैठती थी । पर नेपाली शासकों ने हमारी विविधताओं को समस्या समझने की भूल की है । इसके तहत उन्होंने अपनी एकल पहचान के तहत बाकी सभी पहचानों का दमन ही राष्ट्रवाद समझा । राणाशाही और राजशाही ने तो यह अपराध किया ही, कथित लोकतंत्रवादी और साम्यवादी शासकों की कूपमंडुकता ने भी उन्हें अंधराष्ट्रवाद से ऊपर उठने नहीं दिया ।
उदाहरण के तौर पर पूरब मेची से पश्चिम महाकाली तक मधेशी भूभाग में पहडिÞयों की सैकडÞों आप्रवासी बस्तियाँ आज भी ‘नेपाली टोल’ के रूप में अवस्थित हैं । क्या अमरीका में कहीं अमरीकी टोल की कल्पना की गई है – क्या भारत के तहत भारतीय टोल है – हाँ, भारत के तहत नेपाली टोल संभव है । नेपाल में भारतीय टोल संभव है । परंतु नेपाल में नेपाली टोल का होना यह सिद्ध करता है कि वैसी बस्तियों के र्इदगिर्द रही आदिम बस्तियों में रहनेवाले लोग नेपाली नहीं हैं । अतः नेपाल अभी तक यहाँ के सभी नागरिकों की साझी भूमि नहीं बन पाया है । अर्थात् नेपाल देश तो सभी का है परंतु नेपाल राज्य कथित नेपाली कहे जानेवाले गोर्खाली शासक और उनके वंशजों तक ही सीमित है । तभी तो इस देश को राजशाही के बाद भी खसकुरा या गोरखा भाषा और दौरा सुरुवाल तक ही सीमित रखने का घिनौना हरकत अपने को कथित कम्युनिस्ट कहनेवाले शासकों ने भी करने की जर्ुरत की थी । यहाँ सीधी सी बात है अगर वे लोग खस-गोर्खाली के अलावे बाकी नागरिकों को नेपाली नहीं समझते हैं, तो निश्चित है नेपाल अब तक गोर्खालियों का घरेलु साम्राज्य और आंतरिक उपनिवेश बनकर रह गया है । यह प्रमाणित करता है कि नेपाल को एक राज्य तो बना दिया गया है, किंतु यह अभी राष्ट्र नहीं बन पाया है ।
ऐसी स्थिति में यहाँ जातिभेद, संप्रदाय भेद और समुदाय भेद अब तक अस्तित्व में हैं जो अप|mीकी देशों में कुछ समय पहले तक जारी रंगभेद से कम नहीं है । खास कर नेपाल के कम्युनिष्टों को याद करना होगा कि उन्होंने अप|mीकी राष्ट्रीय काँग्रेस की रंगभेद विरोधी संर्घष्ा का र्समर्थन किया था । नेपाल के ही नहीं, रंगभेद के विरुद्ध तो संसार के कम्युनिष्ट और लोकतंत्रवादी दोनो कैंप के लोग उठ खडÞे हुए थे । तो फिर अपनी भूमि पर वे खुद रंगभेद के विरोध में क्यों खडÞे नहीं होते – लेकिन खडÞा होना तो दूर, वे ऐसे विभेदों के विरुद्ध खडÞे होनेवालों को आडÞे हाथों ले रहे हैं और कोस रहे हैं । समन्यायिकता की बात करनेवालों को वे जातिवादी, विखंडनवादी और न जाने किन-किन विभूषणों से सुसज्जित कर रहे हैं ! यह सिद्ध करता है कि वे लोग खुद मार्क्सवाद का अब तक दुरूपयोग कर रहे हैं । उन्हें कम से कम आयरलैंड के सर्न्दर्भ में मार्क्स के और सोवियत संघ में राष्ट्रीय सवालों पर लेनिन के विचारों का अध्ययन, ­मनन और निष्पक्ष ढंग से नेपाल के सर्ंदर्भ में लागू करने चाहिए । अगर नहीं करते, तो न वे मार्क्सवादी हैं ना ही लेनिनवादी और ना ही लोकतंत्रवादी । वस्तुतः मार्क्सवाद, लेनिनवाद और लोकतंत्र का उनका मुखौटा एक पाखंड है जो अधिक दिन तक उनके असली चेहरे को ढÞकने में कामयाब नहीं होगा ।
परन्तु याद रहे, किसी कानून की किताब में कोई उक्ति या सूक्ति को खोजकर आजादी की लडर्Þाई नहीं लडÞी जाती । क्या उन्होंने खुद राणाशाही और राजशाही को किसी कानून के जरिए समाप्त किया है – जी, कतई नहीं । ये सभी नेपाल की जनता के बल पर हुआ, आंदोलन और व|mांति के बल पर हुआ । तो भला नेपाल की जनता अगर राष्ट्रीय आत्मनिर्ण्र्ााके अधिकार की सुनिश्चितता चाहती है, इसके साथ पहचान आधारित संघीयता और संघीयता सहित का संविधान चाहती है, तो मार्क्सवाद की कथित दुहाई के साथ इसके विरुद्ध टिटहडÞी की तरह किसी के टांग उठाने से इसको कब तक रोका जा सकता है – जी, बिल्कुल नहीं । हाँ, समय रहते अगर इसर्ेर् इमानदारी से जारी नहीं किया गया तो अगली राजनीतिक लडर्Þाई ऐसे ढोंगी उपनिवेशकों के विरुद्ध ही केंद्रित होगी एक नये राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के रूप में । और यह आंदोलन किसी वाद के भीतर पडÞेगा या नहीं, इसका प्रमाणिकीकरण किसी पश्चगामी के दस्तखत या मुहर का मुहताज नहीं होगा ।

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