मार्निङ वाकिङ् और कुत्ते से टाकिङ्

मुकुन्द आचार्य:मैंने अभी हाल ही में अपनी उमर के सत्तरवें साल को बाई-बाई कहा है । इसलिए अपनी सेहत को चुस्त-दुरुस्त, चाक-चौबन्द रखने के लिए तकरीबन हर रोज मार्ँर्निङ वाकिङ में निकल पडÞता हूँ । सुबह की इस हवाखोरी का खास मकसद रहता है, उमर कहीं अपनी वेवफाई पर न उतर आए । आजकल अपनांे का तो भरोसा नहीं उमर का क्या भरोसा । जाने कब दगा दे जाए !
इसी हवाखोरी के दौरान एक रोज अजब सा वाकया पेश आया । मैं अपनी रौ में टहल रहा था । एक भारी भरकम आवाज पीछे से आई- ‘गुड मार्ँर्निङ सर !’ मैंने देखा तो पीछे कोई नहीं था । अलवत्ता एक भयानक डÞरावना कुत्ता मेरे पास आकर फिर से बोला- गुड मार्ँर्निङ सर ! एक कुत्ते को आदमी की आवाज में बोलते देख कर मेरे तो होश फाख्ता हो गए । फिर खुद को सम्भाला और कहा- ‘वेरी गुड मार्ँर्निङ मिस्टर डाँग ! कहिए क्या हाल हैं -‘m
मि. डाँग ने उछल-कूद करते हुए कहा, ‘आई एम भेरी फाइन ! मेरे तो अच्छे दिन आने वाले हैं ! मैं भयंकर खुश हूँ ।’
‘वो कैसे मि. डाँग – अच्छे दिन का वादा तो भारत के प्रधानमन्त्री मोदी जी ने तोहफे के तौर पर अपनी जनता को दिया था । फिर आप क्यों इतना चहक रहे हैं -‘ मैंने आर्श्चर्य से पूछा ।
मि. डाँग ने ‘एक्सक्यूज मी’ कहते हुए बाजू वाले बिजली के खम्बे को लक्षित कर अपनी पिछली टाँग उठा कर उसे पवित्र किया । फिर शान से फरमाया- ‘बजेट भाषण तो अपने भी सुना ही होगा । हमारे अपने नेता जी भी सांसद हैं । पहले दस लाख पाते थे, अब सुनते हैं खुदा नेपाल का फटा हुआ छप्पर और ज्यादा फाडÞ कर पाँच करोडÞ के करीब देने वाला है । अब तो मजे ही मजे हैं । दिन को होली रात दिवाली ! ‘
‘वो कैसे -‘ मैंने उत्सुकतापर्ूवक पूछा । मि. डाँग ने कुछ खुलासा किया- ‘देखिए सर जी । मुफ्त में जो चीज मिलती है न, प्रायः उसकी कदर नहीं होती । मुफ्त का चन्दन घिस रघुनन्दन । जैसे नेपाल में प्रजातन्त्र, लोकतन्त्र, गणतन्त्र, कोई भी तन्त्र-मन्त्र ठीक से काम नहीं कर पा रहा है । नेपाली जनता ने आसानी से मिली इन व्यवस्थाओं की कदर ही नहीं जानी । पहले हमारे नेता जी हफ्ते में एक दो रोज मांस-मछली लाया करते थे । घरेलू उद्योग को प्रोत्साहन देना चाहिए कह कर ‘होम मेड’ दारु पीते थे । जब दस लाख मिलने लगा तो वीयर, रम, बोदका लेने लगे । कहते थे- आखिर हम लोग ठहरे देश सेवक । हम लोग नहीं पिएंगे तो देश के शराब उद्योग कैसे फलेंगे-फूलेंगे । कितनी देशभक्ति है, उनके दिल में । अब करोडÞों में खेलने वाले हैं तो कहते हैं- उदार लोगों के लिए तो सारी दुनिया ही एक परिवार है । इसलिए अब स्वदेशी विदेशी का लफडÞा क्यों । अब तो सिर्फरेड लेबल, ब्लैक लेबल ही चलेगा । उधर मोदी जी प्रधानमन्त्री हुए, इधर हमारे अच्छे दिन आ गए । सर जी ! अब हम भी पानी के बदले बीयर पिएंगे । लंच में बफ लेंगे, नास्ते में मटन और रात को चिकेन चलेगा । हमारे नेता जी खुद कह रहे थे, अब तो दोनों हाथों में लड्डू और सर कडÞाही में रहेगा । क्या कहने हैं ! खुदा सब को ऐसी खुशहाली दे । ऐसी ऐयाशी का अवसर दे । हम तो आर्य संस्कृति के पोषक हैं । ‘र्सर्वे भवन्तु सुखिनः’ ही कहेंगे ।’
मैंने मि. डाँग को सावधान करने के लहजे में कहा- ‘ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है मि. डाँग । आजकल अख्तियार अपनी जवानी के जलवे दिखा रहा है । छोटे-मोटे ननस्टैर्ंर्डड भ्रष्टाचारियों को तो कटघरे में खडÞा कर रहा है तो जहाँ करोडÞों का सवाल होगा तो क्या अख्तियार चुपचाप बैठा रहेगा । आप के नेता जी की नाक में नकेल नहीं डालेगा – जरा अपने नेताजी को एक नेक सलाह जरूर दीजिएगा- इतना न खाएं कि हाजमा खराब हो जाए । भोजनालय में की गई गडÞबडÞी की भरपाई शौचलाय में करनी पडÞती है । बुजुगोर्ं ने ऐसे ही तो नहीं कहा है, चोरी का धन मोरी में ।’
मि. डाँग ने एक अच्छा-खासा ठहाका लगा कर मेरी नसीहत की ऐसी-तैसी करते हुए कहा, ‘जनाब आप किस जमाने की बात कर रहे हैं । कोर्ट कचहरी वाले भी तो हाड मांस के ही पुतले होते हैं । इन्हें कुछ सूंघा दीजिए, कुछ चटा दीजिए । जब चाँदी के जूते चलते हैं तब कानून गंूगा, बहरा और अंधा बन जाता है । पहले जिस कर्म को भ्रष्टाचार कहा जाता था, उसे आजकल शिष्टाचार कहा जाता है । है न मजे की बात !’
अपनी राजधानी की एक ताजा खबर आपने भी सुनी होगी । कोई एक डाँन जेल से रिहा हुआ । उसके स्वागत के लिए जनता उमडÞ पडÞी । फूल-माला-अबीर-गुलाब से उस डाँन को सराबोर कर दिया गया । लगता था, कोई महापुरुष महान कार्य सम्पन्न कर लौट रहे हैं । घंटांे ट्राफिक जाम रहा, डाँन के दर्शनार्थियों की भीडÞ से । ट्राफिक पुलिस के बूते से बाहर की बात हो गई, भीडÞ को नियन्त्रित करना । जमाना कहाँ-से-कहाँ चला गया और आप हंै कि लकीर पीटे जा रहे हैं, सर जी !
इतना कह कर दूर से आती हर्ुइ एक गदरायी हर्ुइ कुतियाँ के पीछे मि. डाँग भाग लिए । लेफ्ट-राइट करते हुए मैंने फिर वाकिङ  को जारी रखने की कोशिश की !

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