माहामायाजी, जब पद में थी तब किसी को गोद में बिठाया तो किसी को आंख की ओट भी न लगने दी

बिम्मीशर्मा, बीरगंज , (व्यग्ँय), माहामाया को शेर सवारी कर के उतरे हुए अभी सिर्फ एक ही सप्ताह हुआ है । पर ईन का रोबदाब ऐसा है कि जैसे यह साक्षात महाकाली ही हो । न्याय की देवी के रुप में प्रतिष्ठित यह माहामाया जब पद में थी तब अपने देश की लाखों महिलाओं के हित में कोई कानून नहीं बनाया । हर दिन देश की महिलाएं घरेलू हिंसा या रेप से पीडित हो रही हैं । पर उह सब देख कर ईनका दिल न पसिजा न ईन्होनें ईनके ईंसाफ के लिए कोई कदम उठाया । पर जिस दिन से यह शेर की सवारी कर के उतरी हैं यानी कि रिटायर्ड हुई है तब से ईन का यह बकबक चालू है । खुदको बेहद ईमानदार और दुसरों को भ्रष्ट और बेईमान बताने के लिए यह माहामाया आए दिन अपना थोबडा टिभी में प्रदर्शन कर रही हैं । और अनलाईन में ईनका जिवनी भी प्रसारित हो चूका है । ईन माहमाया के तो तेवर ही निराले हैं । ईनको लगता है यह जो बोलेगीं सब सही और बांकी सब गलत । लेकिन यह भ्रम कब तक ?
भ्रम एक न एक दिन तो टूटेगा ही । खुदको महाकाली बता कर और दुसरों को निचा दिखाने के लिए शुंभ, निशुंभ ठहरा कर कितने दिन चलेगा ? दुर्गा सप्तसती में भी देवी को पकड्ने या मारने आए दानवों के सामने महाकाली ने खुदको बहुत छोटा और तुच्छ मान कर अपने बल का घमंड किया था । लेकिन जब दानवों को मारने का समय आया तब महाकाली नें अपना रौद्र रुप दिखा दिया । पर यह माहामाया कोई माने या न माने खुदको देवी का अवतार मान कर दुसरों के द्धारा पूजा करने की चाह रखती है । जब न्यायमूर्ति थी तब तो मूर्तिमानहीबनी रही । पर शेर की सवारी कर के उतरने के बाद ईस मूर्ति मे अचानक कहां से जान आ गई है कि एफएम रेडियो कि तरह बोले जा रही हैं ।
जब तब पद में थी किसी को गोद में बिठाया तो किसी को आंख कीओट भी न लगने दी । गूट बंदी करने में ईतनी माहिर निकली कि राजनीतिक दल और ईस के नेता भी शरमा जाएं । किसी की श्रीमती या पत्नी होकर भी खुद जीवन भर श्रीमान बनी रही और अपने पति को श्रीमती बना दिया । मानाकि ईन्होने न्यायालय में दो, पांच नहीं किया । किसी मुकद्धमा का निर्णय सुनाते हुए कोई अनियमितता नहीं की, घूष नहीं खाई । पर ईतने बडे और महत्वपूर्ण पद में रहते हुए अपनीजाति के लिए क्या किया । बस एक विवादितऔर फर्जी वरिष्ठ प्रहरी अधिकृत को आई. जी. पी. बनाने और पद में प्रतिष्ठापन करने के लिए एडी, चोटी का जोर लगा दिया । ऐसी हरकत किसी चिफ जस्टिस के लिए शोभा देती है क्या ? खुद के किए हुए फैसले को उल्टा कर उसी के विरोध मे निर्णय सुना दिया ।
चार साल पहले माहामाया के न्यायीक बेंच नें ही किसी उच्चप्रहरी अधिकृत के प्रमोशन में वरिष्ठता को हीआधार मान कर मापन नहीं किया जाएगा । पर चार साल बादअ पने प्रियपात्र को आई. जी. पी. बनाने के लिए योग्यता को दरकिनार कर वरिष्ठता के चोले को पहना दिया ? वाह आपका न्याय करने का तरिका तो गज्जब है माहामायाजी ? और आप के बोलने का अंदाज भी माशाल्लाह क्या जान लेवा है कि मुर्दा तो उठ कर बैठेगा नहीं । उल्टे जिंदा आदमी भी मुर्दा हो जाएगा आपकी बोली सुन कर । किसी चिफ जस्टिस कि तरह नहीं एक कम पढी, लिखी फुहड औरत कि तरह है आप के बातचित्त करने का अंदाज । आप बोलती कम और गाली ज्यादा देती है । सभी को अपने घर या आफिस का अर्दली समझ रखा है क्या ? जैसे आप बिना सोचे, समझे बोलती हैं क्या न्याय भी बिना आगा, पिछा देखे ही कर देती थी ? आपका काम बस फैसला सुनाना है बांकी सब जाए भांड में ।
जैसे गाँव, देहात में पनघट में पानी भरने आई औरते अपनी पडोसी या सहेली से सास, ननद और जेठानी का शिकायत करती है । टिभी और पत्र, पत्रिका में आपका इंटरभ्यू देख, सुन और पढ कर ऐसा ही लगा । माहामाया आप में और पनघट में मटका ले कर पानी भरने आई उन ग्रामिण अनपढ औरतों में कुछ फर्क नहीं लगा । हां उन औरतों के शीर मे धूघंट था और आपका शीर उघडा हुआ बस ईतना ही अंतर था आप में और उन में । अरे हां जब आप चिफ जस्टिस थी तब आप मधेश आई थी । मधेश में आ कर आप ने यह कह दिया था कि मधेश की औरतों का विकास घूघंट ओढने के कारण नहीं हुआ है । तब आप शायद यह भूल गईं की र्इंदिरा गांधी, बेनजिर भुट्टो और शेख हसिना सहितअन्य बडे पद की महिलाए भी शीर में आंचल रखती हैं या घूघंट करती है । पर यह सब महिला हस्ति अपने देश का सिरमौर थी या हैं । किसी के परपंरा को ओछा बता कर आप कैसे महान बन सकती है माहामायाजी ? मधेशी अपनी संस्कृति से प्रेम करते हैं और ईसी के प्रतीक के रुप में घूघंट भी है ।
पर आपको क्या आप तो आगे, पिछे देखे बिना और माहौल का मिजाज जाने बिना ही धडल्ले से बोल देती हैं । आपकी बोली गोली की तरह दुसरों पर क्या असर करती है आपने कभी सोचा है ? आप जिस राजनीतिक पार्टी किओर झुकाव रखती हैं उसका छांया बन कर और नाजुक समय में ढाल बन कर रक्षा करती आई हैं । बांकी औरो के साथ नाईंसाफी होती है तो उसकी बला से । आपने तो अपना पार्टी धर्म निभा दिया । दुसरों के दामन पर दाग ढुंढते समय आपको यह ख्याल कभी नहीं आया की आपका दामन भी पाक, साफ है की नहीं । क्या सभी ईमानदार लोग आपही की तरह घमंडी और अकडू होते हैं  ? आपको लगता है ईस जहां में बस एक आपही कर्तव्य निष्ठ और ईमानदार हैं ।
आपही के साथ अपने प्रधानमंत्री पद से हटे या राजिनामा  देने वाले एमाओवादी के सुप्रिमो प्रचण्ड ने सिंह दरवार से बाहर आ कर अपने विोधियों के बारे में मीडिया में कोई शिकायत की ? नहीं न क्यों किउन्होने अपने पद कि गंभीरता को देखते हुए परिपक्वता दिखाई । पर ६५ साल की बुजुर्ग महिला हो जाने के बाद भी आप में कोई परिपक्वता नहीं है । आपको देख, पढ कर लगता ही नहीं की आप ईतने बडे पद से सेवानिवृत हुई हैं । आप ने तो पद की गरीमा को ही घटा दिया महामायाजी । जाते जाते आपसे एक सवाल जरुर पुछना चाहती हुं की जिन के विरोध में आप अभी बोल रही हैं । ईन के हर्कतों का पता आपको चिफ जस्टिस के पद मे रहते हुए भी जरुर मालूम होगा ? तब क्यों नहीं ईन बुरे लोगों के खिलाफ उस समय कोई एक्सन लिया ? जवाब दिजिए माहामायाजी ?

 

 

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