मा“ तू क्यों रोती है ?

गंगेश मिश्र :जैसे भीड़ की भगदड़ में, बच्चे, बूढ़े दब कर रह जाते हैं । ऐसे ही संघर्ष के दौरान, कुछ पहलु अनछुए से रह जाते हैं । ‘शहादत पर, फक्र है मुझे’ विधाता के लिखे हुए को, भला कौन मिटा सकता है ? कोई नहीं, जानती हूँ । पर एक हूक सी उठती है सीने में, जब बहुरिया की सूनी मांग देखती हूँ । माँ, हूँ न ! पुत्र वियोग से बड़ा शोक नहीं है, इस जहान में । आँखें पथरा सी जाती हैं, कदम लड़खड़ाने लगते हैं ‘सूनी गोद, मांग भई सूनी ! रे ओली ! तेरे राज में ।’ असमय काल के गाल में समाए, बेटे की चिता की आग, अभी ठंढी नहीं हुई है ।
तूने जो घाव दिए हैं, अभी हरे हैं, भरे नहीं हैं । बड़ा निर्दयी है, रे तू । ‘तेरे अहंकार ने, मेरे लाल को मारा है । बहु की मांग, और मेरी कोख को उजाड़ा है । मैं बख्श भी दूँ, खुदा ना बख्शेगा तुझे, तू पापी है–नीच, निर्दयी– हत्यारा है । हँसता खेलता, खिलखिलाता छोटा सा परिवार था, हमारा । मेरा बेटा सबके काम आता था, सभी उसे बहुत प्यार करते थे । लेकिन–लेकिन, इस ब्रह्मराक्षस ने, मेरे बेटे को अपने खूनी पंजे में जकड़ कर मार डाला । मेरा बेटा, रोज सुबह घर से निकल जाता, भूखा– प्यासा । जब मैं कहती ‘कुछ खा–पी लिया कर, दुबला हो गया है तू । ‘तब कहता ‘माँ ! तू भूख प्यास की बात मत किया कर । शाम को आऊँगा, तेरे हाथों से खाऊँगा और सुन ! अब हमें, हमारा अधिकार मिल के रहेगा, कोई हमें ‘धोती’ नहीं कहेगा । आज हम लोग राजमार्ग पर गाड़ी– घोड़ा नहीं चलने देंगे, सरकार को अब झुकना पड़ेगा ।’ आत्मविश्वास से भरा, मेरा बेटा बड़े जोश के साथ ये बातें कह रहा था । मैं सपनों में खोई सी, टुकुर– टुकुर, अपने लाल को निहार रही थी । सोच रही थी, बहुत सयाना हो गया है, मेरा बेटा जब से आन्दोलन शुरु हुआ, तब से मेरा बेटा चैन से नहीं बैठा । एक ही रट लगाए रहता, ‘हमारी माँगे पूरी होंगी, सरकार को झुकना ही पड़ेगा । ‘मैं कहती ‘बेटा ∕ घर के बारे में सोच, अपने छोटे–छोटे बच्चों के बारे में सोच । घर– गृहस्थी कैसे चलाएगा रे तू । ‘मेरी बातों को अनसुना कर देता, कभी–कभी हँसते हुए कहता ‘माँ ∕ तू बड़ी भोली है, हम अपने बच्चों के भविष्य के लिए ही तो लड़ रहे हैं । घर–गृहस्थी की बात है, तो घर रहेगा तभी तो गृहस्थी रहेगी । पहले घर को तो सुरक्षित कर लूँ, फिर देखना ।
जब सुनती थी, सत्ता के सिंहासन पर बैठे पिशाच ने माँ से बेटे को, पत्नी से पति को, बच्चों से उसके बाप को छीन लिया । तो मैं सहम सी जाती थी, किसी अनहोनी की आशंका से । मैंने कई बार समझाने की कोशिश भी की, मगर वो मानने वाला कहाँ था । जैसे पिजड़े में कैद पंक्षी, आजादी के लिए फड़फड़ाने लगता है । वही दीवानगी थी, मेरे बेटे की आँखों में । दिन भर की आपाधापी के बाद, थकाहारा घर पहुँचता तो सबसे पहले मुझे बुलाता, दिन भर की पूरी घटना सिलसिलेवार बताता । उसे अपने नेताओं से भी नाराजगी थी, कहता ‘इन्होंने
गजेन्द्र बाबु का (स्व. गजेन्द्र नारायण सिंह) कहा माना होता, उनका साथ दिया होता, तो आज हमें ये दिन देखना नहीं पड़ता । हमारे इतने सारे भाई, मारे न जाते । खैर कोई बात नहीं माँ, अब अकल आ गई है इन्हें । देर से ही सही दुरुस्त आए हैं ।’ अभी कुछ दिन पहले की बात है, तमतमाया सा चेहरा लिए आया । मुझसे कहने लगा,‘बताओ माँ, जिसके बाप– दादों को जिस देश में शरण मिली, जहाँ का अन्न खाया, आज हमें ‘वहाँ का वफादार कुत्ता कहती है सरकार । ‘मैंने कहा, ‘उस करमजली की बातों से, क्यूँ लाल– पीला हुआ जा रहा है, तू अपना काम कर । उसे उसका करने दे । ‘तब जाके शान्त हुआ, पगला । उसकी बहकी–बहकी बातें सुन कर, मैं घबरा जाती थी । सोचती थी, मेरे भोले–भाले बेटे में इतनी हिम्मत कहाँ से आ गई ? अब सोचती हूँ, अपमान की चक्की में पिसते–पिसते, स्वाभिमान जग आया था । हाय मेरा श्रवण ∕ कहाँ चला गया, मुझ अभागिन को छोड़ कर ।
वार्ता का नाम सुनते ही, ठहाके मारता, कहता ‘माँ ∕ जब इन्हें मुफ्त में कुछ, अच्छा खाने का मन करता है, तो ये लोग वार्ता की मेज सजा लेते हैं । देखना डकार मारते हुए निकलेंगे । ‘सही कहता था, एकदम सोलह आने सच । एक रात मेरा पैर दबाते हुए, उसने कहा, ‘ओली जी ने हमें, आम समझ रखा है । कहते हैं दो– चार के गिरने से कोई फरक नहीं पड़ेगा । ‘मैंने कहा, ‘बेटा ! बड़े हमेशा अनुभव की बात करते हैं, उन्होंने सही बात कही है । आम फलों का राजा है, जिसे खाते समय इसके गुठली को मुँह के अन्दर– बाहर करते हैं, पर उगला हुआ निवाला नहीं खा सकते ना । ‘मेरी बातें सुन कर उसका चेहरा देखने लायक था । विधाता के लिखे को, भला कौन मिटा सकता है? कोई नहीं, जानती हूँ । पर एक हूक उठती है सीने में, जब बहुरिया की सूनी मांग देखती हूँ । ‘माँ हूँ न, पुत्र वियोग से बड़ा शोक, नहीं इस जहान में, आँखें पथरा सी जाती हैं । कदम लड़खड़ाने लगते हैं, आवाज महसूस होती है, पर सुनाई नहीं देती । आँसुओं को छुपाने के लिए, जगह ढूंढती हूँ, इधर से उधर भागती फिरती । (सुबह कह कर गया था, आज हम राजमार्ग अवरुद्ध करेंगे, डर तो तभी लग रहा था । सुना था मैंने, सरकार सेना भेज रही है, आन्दोलन को दबाने के लिए गोली भी चल सकती है । उसी ने बताया था मुझे ।) सुबह से शाम हो गई, अब तक आया भी नहीं, भूख लगी होगी कुछ खाया भी नहीं होगा । उसकी एक झलक पाने के लिए, मैं आतुर थी । बार–बार, उठती–बैठती फिर दरवाजे के पास जाती । दूर पीपल के पेड़, की ओर निहारती, ‘सुबह उधर से ही तो गया था मन में, अब हलचल सी होने लगी थी, व्याकुलता बढ़ने लगी थी । ‘आ जाना चाहिए था, क्या हुआ अभी तक नहीं आया । मन ही मन, बड़बड़ा रही थी मैं ।
तभी सन्नाटे को चीरती हुई, धाँयधाँय धाँय धाँय । धाँय (गोली चलने की आवाज आई) मेरे हाथ, पैर काँपने लगे, साँसें उखड़ने लगीं । मैं बदहवास सी बाहर निकलने के लिए, दरवाजा ढूढंने लगी । पैर उलझ गया.. कहीं. (धड़ाम) चारपाई में पैर उलझा, सर दरवाजे से टकराया । आँखों में तारे चमके, फिर अँधेरा सा छा गया । फिर क्या हुआ ? पता नहीं । कहीं दूर से, भारी शोरशराबे के बीच, किसी औरत के सुबक–सुबक कर रोने की धीमी आवाज, कानों की तंत्रिकाओं को झंकृत करतीं रहीं, करती रहीं । मैं हकबका कर उठ बैठी, मैं सो रही थी ? नहीं, नहीं.ये क्या, क्या हुआ ? मैं सो रही थी, कब से ? तू रो रही है । अब समझी, मैं तो बेहोश थी । बहुरिया कुछ बोली नहीं, फफक–फफक कर रोने लगी, कोई लालटेन, तो कोई टार्च लिए, हाथों में लाठी । पूरा जनसैलाब सा उमड़ आया था, मेरे घर के बाहर । मैंने पूछा,‘बहुरिया ∕ बाबु आया? बस इतना ही पूछ पाई । वो दहाड़े मार–मार कर, रोने लगी, बस. उँगली के . इशारे. से .. उस ..ओर इशारा किया । मैं भागती हुई पहुँची, उस. भीड़ मुझे.. रास्ता देने के लिए, हटने लगी । पास खड़ी महिला ने, कुछ कहा, क्या कहा ? सुन नहीं पाई ।
मैंने देखा, एक इन्सान, बिना हरकत, दोनों पैर फैलाए, चारपाई पर सो रहा है । बहुत गहरी नींद में । ऐसा लगा, कलेजा मुँह को आ जाएगा, दिल धाड़–धाड़ करके धड़कने लगा । पैर जमीन से उखड़ने को हुए, मैं वहीं गिरने लगी, तभी किसी ने पकड़ कर झकझोर दिया । मैं संभल कर खड़ी हो गई, लालटेन के उजाले में जो मैंने देखा, .. हाय रे विधाता ! ये खून से लथपथ, कौन पड़ा है ? तभी चारो ओर से, टार्च की रौशनी हुई । अरे ! ये तो मेरा ला..ल मेराबेटा है । भू. खा प्यासा. सो र मैंने उसके चहरे को एक हाथ से पकड़ कर हिलाते हुए कहा,‘बाबु बाबु उठ .चल. घर. कुछ .खाले । अब न उसे भूख थी, न प्यास थी, वो तो मेरे बेटे की लाश थी । वही बड़ी–बड़ी आँखें, हँसता हुआ चेहरा, पर खून से तरबतर थे कपड़े । मुँह से निकले खून, ऐसे लगते थे जैसे मुँह में पान लेकर सो रहा हो । आँखें खुली हुई थीं, जैसे मुझे ही देख रही हों और कह रही हों, ‘माँ ! तेरे लाल ने तेरा सर, ऊँचा किया है । तू दुःखी मत होना, मैं फिर
आऊँगा, तेरा बेटा बन कर । ‘मैं रोना चाह रही थी, रो नहीं पा रही थी । आँखें पथरा सी गईं थी, कदम लड़खड़ाने लगे थे ।
मेरे कानों में साँय–साँय करते हुए, मेरे बेटे की आवाज सुनाई दे रही थी । मत रो माँ ! मत रो ।
गलती हुई जो, मुझसे हो उसको क्षमा तू, कर देना । आँसू जो, आँखों में छलके, उसको तू, पी ही लेना । अंतिम दर्शन कर ले मेरा, अब अपने सूत को, खोती है । जननी क्यूँ तू, रोती है ??? जननी तू क्यूँ, रोती है ???

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