मिथिलानियों ने आज उल्लासपूर्वक किया बटसावित्री की पूजा

विजेता चौधरी काठमाण्डू जेठ २२ |
मिथिला में मनाए जाने बाली बटसावित्री अर्थात बरसाइत व्रत आज मैथिल महिलाओं ने विधिविधान के साथ उल्लास पूर्वक मनाया है ।
संस्कृतिविद रेवतीरमण लाल बताते हैं प्राचीन काल से ही मैथिल महिलायें अपने पति की दीर्घायु के लिए वरसाइत व्रत मनाती आ रहीं हैं । नियम से वरगद के पेड में जल–फूल अर्पण कर तथा लाल व पीले धागे से तीन से पाँच बार पेड़ को बाँध कर पूजा किया जाता है ।

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बरगद को वैदिक वृक्ष के रुप में भी लिया जाता है । संस्कृतिविद् लाल कहते हैं– बरगद को मैथिली में वर के वृक्ष भी कहा जाता है । जनमान्यता के मुताविक बर के वृक्ष में धागा बाँधने से सत्यवान की तरह यमराज मेरे पति को भी दीर्घायू करेंगे, सौभाग्य की रक्षा करेंगें ऐसी जनआस्था आज भी कायम हैं । सुहागन महिलायें वटवृक्ष के जड़ मे बैठ विधान के साथ पूजा करती तथा सावित्री–सत्यवान की कथा सुनती हैं ।
सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण बचाने के लिए यमराज के पीछे पीछे यमलोक तक चली गईं थी । पत्नी की पति धर्म से प्रभावित हो यमराज ने उसे सत्यवान के प्राण वरदान में देने को बाध्य होना पड़ा था, वरसाइत भी इसी कथा से जुडा एक व्रत है । जो परम्परा से अनवरत रुप से चलता आ रहा है ।

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नव विवाहिता द्वारा इस व्रत को विशेष विधान के साथ मनाने का प्रचलन रहा है । आज के दिन नमक को वर्जित करते हुए एक बार ही भोजन किया जाता है । संस्कृतिविद लाल बताते हैं– मैथिल महिलायें इस संस्कृति की संरक्षक हैं । बहरहाल काठमाण्डू में पहाडी समुदाय की महिलायें भी इस व्रत को मानने लगी हैं तथा सम्पूर्ण विधान के साथ पूजा करती है । लाल कहते हैं ये संस्कृति विस्तार के साथ आपसी सदभाव व आस्था का सजीव चित्र है ।

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