मिथिला की संस्कृति : मांडव्य ग्राम में मंडप निर्माण

मिथिला में आज भी वहाँ के लोग अपनी संस्कृति को हृदय से लगाए हुए है।आज मैं महोत्तरी जिल्ला के मांडव्य ग्राम जिसका अपभ्रंस (मडैइ) है,यही पर सीता जी के विवाह का मंडप अर्थात मडवा बना था। उसी ग्राम में आज लडके की ब्रतबन्ध और लड़की के विवाह हेतु मंडप निर्माण कार्यक्रम में सहभागी होने का अवसर प्राप्त हुआ। क्या संस्कृति है हमारी! मंडप के लिए बॉस काटना होता है। जिसके लिए बॉस को निमंत्रण दिया जाता है।बॉस को चिर कर बनाए गए बत्ती को पाच जगह सूत के धागा अर्थात (डारा) से बाधा जाता है। पिसहुआ चावल और सिंदूर को घोल कर बॉस को पाच जगह टिका लगाया जाता है। बरुआ अर्थात जिसका जनेउ होनेवाला है उससे बड़ा पाच भाई खेत से मिटटी लाकर मंडप में रखते हैं। उसके वाद चरखा से पाच अहिवात अर्थात सादीसुदा सुहागन महिलाएं सूत के धागा काटती हैं,जिससे जनेउ का निर्माण होता है। जनेउ के दिन उसी जनेउ को बरुआ को पहनाया जाता है। मंडप निर्माण के क्रममे बरुआ के हाथ के लम्बाई से 7 और 5 हाथ का या कहें बेजोड़ा संख्या में बनाया जाता है।इस प्रकार बिधी और विधान का प्रारम्भ हो जाता है। ग्रामीण बुजुर्गों से पूछने पर उत्तर मिला की यह सदा से होता आया है। हम इसके कारण तो नहीं जानते; लेकिन यह हमारी संस्कृति है। हमारा धरोहर है।

हमारी पहचान है। हम हमारे कुल देवता को पूजन करने के वाद ही कोई शुभ कार्य का आरम्भ करते हैं।अतः यह हमारी आस्था का विषय है। सरकारी नौकरी से अवकाश प्राप्त शिक्षक,अभियंता,प्रोफ़ेसर लोग भी गाव में हो रहे इस कार्यक्रम में सहृदय सहभागी देखे गए। उनका भाव भी अपनी इस खो रहे सांस्कृतिक धरोहर के तत्व और मौलिकता को जानने का था। मैंने वहा बैठे एक बृद्ध महिला जिन्हें लोग बासकी बाली दादी कहते थे; से कुछ जानना चाहा। उन्होंने जो बताया मैंने ऊपर उल्लेख कर दिया है। अधिकाँश लोग सांस्कृतिक तत्व से अनभिज्ञ दिखे। आवश्यक है एक तत्वगत सांस्कृतिक जागरण अभियान का। मैं तत्काल जितना समझ पाया हूँ; उल्लेख कर दिया हूँ।विशेष खोज जारी रहेगा।

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