मुखर्जी का भ्रमण और छुट्टी को लेकर आलोचना, कमजोर मानसिकता की उपज : युवराज चौलागाईं

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 युवराज चौलागाईं, काठमांडू, १ नवम्बर । मुखर्जी का नेपाल भ्रमणः दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण अवसर
लगभग १८ साल के बाद नेपाल में भारत के राष्ट्र प्रमुख तथा राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का भ्रमण हो रहा है । दो देशों के बीच रहे मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध को थप प्रगाढ़ बनाने के लिए यह भ्रमण एक महत्वपूर्ण अवसर हो सकता है । वैसे तो इस भ्रमण में महत्वपूर्ण राजनीतिक तथा अन्य कोई सम्झौता नहीं हो सकता । क्योंकि प्रणव मुखर्जी एक संवैधानिक राष्ट्रपति हैं । तब भी यह भ्रमण, हमारे मजबुत सम्बन्ध के लिए महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक हो सकता है । मुझे लगता है– इसके पिछे कुछ कारण भी हैं–
गत साल नेपाल में लगभग ६ महिने तक मधेश आन्दोलन हुआ । नेपाल को नाकाबन्दी किया गया । चाहते हुए या नहीं चाहकर भी उसमें भारत को जोड़ कर देखा गया । जिसके चलते दोनों देशों के बीच कुछ अविश्वास का वातावरण बन गया ।  जनस्तर में नेपाल में भारत विरोधी भावना भड़कने लगा । जिसके चलते भारतस्थित नेपाली दूतावास के राजदूत को वापस बुलाया गया, निर्धातिर नेपाल की राष्ट्रपति का भारत भ्रमण को भी स्थगित किया गया । इस बीच में सरकार परिर्वतन हो गया और सम्बन्ध को पुराने ही ट्रैक में ले जाने का प्रयास होने लगा । इसी प्रयासों का एक सफलतम नमूना है– भारतीय राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का नेपाल भ्रमण । मुझे विश्वास हैं– इस भ्रमण के दौरान नेपाल–भारत बीच जो असमझारी और आशंका हैं, वह अन्त हो जाएगा और नेपाल–भारत सम्बन्ध थप सुमधुर बन पाएगा । हमारे लिए यह एक अवसर भी है कि दोनों देशों के बीच बार–बार विवादित होने वाले विषय है, उसमें भी इस भ्रमण के दौरान हम लोग छलफल कर सकते हैं और अपनी आशंका को मिटया जा सकता है ।
युवराज चौलागाईं

युवराज चौलागाईं

मुखर्जी वापस जाते ही कुछ दिनों के वाद नेपाल के राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी भी भारत भ्रमण में जाएंगे । इससे दोनों देशों के बीच हार्दिकता और सहानुभुति बढ़ेगी । हाँ, अभी सामाजिक सञ्जाल में कुछ लोग भारतीय राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के भ्रमण को लेकर कुछ बहस भी कर रहे हैं । वे लोग कह रहे है कि जब तक मुखर्जी नेपाल भ्रमण में रहेंगे, तब तक हम लोग भारत द्वारा नेपाल के ऊपर हो रहे हस्तक्षेप का विरोध करेंगे और उसके ट्रेंड बनाएंगे । प्रजातान्त्रिक दशों में अपनी असन्तुष्टि इसी तरह बाहर आते हैं । अर्थात् इसको अस्वभाविक नहीं माना जाएगा । जनस्तर में व्याप्त असन्तुष्टि और नेपाल–भारत सम्बन्ध को समझने के लिए भी ऐसी प्रक्रिया सहायक सिद्ध हो सकती है । इसीलिए दोनों देश इस में संवेदनशील होकर समस्या का समाधान करना चाहिए ।
दूसरी बात, नेपाल–भारत सम्बन्ध, ऐसी प्रतिक्रिया और आक्रोश से निर्धारित नहीं हो सकता । नेपाल, भारत को कितना सम्मान देता है और उसको कैसे व्यवहार में प्रकट करता है, यह देखना महत्वपूर्ण है । राष्ट्रपति मुखर्जी का भ्रमण और नेपाल सरकार की निर्णय इसका उदाहरण हो सकता है । भ्रमण को लक्षित करके ही नेपाल सरकार ने यहाँ सार्वजनिक छुट्टी देने का फैसला किया है । साथ में नेपाल कें राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी द्वारा मुखर्जी का स्वागत हो रहा है । यह भारत के प्रति उच्च सम्मान ही है । इससे पता चलता है कि नेपाल, भारत को उच्च महत्व देता है । हाँ, नेपाल की यह विन्रमता और हार्दिकता को भारत उसी उचाई से ग्रहण करे, यह हमारी चाहना है ।
मुखर्जी का भ्रमण और नेपाल सरकार की सार्वजनिक छुट्टी के सम्बन्ध में जो आलोचना और प्रश्न किया जारहा है, यह तो कमजोर मानसिकता की उपज है । इस तरह का आलोचना हम लोगों ने अपेक्षा नहीं किया था । नेपाल की इतिहास को देखा जाए तो विगत में भी यदि किसी देश का राष्ट्र प्रमुख नेपाल आते थे तो उस दिन छुट्टी देने का प्रचलन था ।  हम लोगों ने तो सिर्फ उस प्रचलन का पुनः सुरु किया है । दूसरी बात, यह निर्णय सिर्फ एकले प्रधानमन्त्री का निर्णय भी नहीं है । सुरक्षा विज्ञ, कुटनीतिक व्यक्तित्व तथा राजनीतिक सुझाव के आधार में ही यह निर्णय हुआ है । लेकिन दरवाजे के भीतर निर्णय करके जो लोग बाहर आकर उसका विरोध करते हैं तो हम लोग क्या कर सकते है ! मेरे व्यक्तिगत खयालों में अगर पूरे देश में छुट्टी न देकर सिर्फ राष्ट्रपति का भ्रमण स्थलों में यह किया होता तो सायद ऐसे विवाद नहीं आती । अगर हम लोग ऐसा ही करते थे, तो भी आलोचना करनेवालों के लिए मसला बाँकी ही रहता । वे लोग भ्रमण–व्यवस्थापन में हमारी कमजोरी को लेकर बहस में उतर आते थे । लेकिन यह हमारी व्यवस्थापकीय कमजोरी नहीं है । यह तो एक असल मित्र राष्ट्र और उसके प्रमुख के प्रति सम्मान है ।
किसी भी देश के राष्ट्र प्रमुख का नेपाल भ्रमण बहुत कम ही होता है । हम लोगों ने सिर्फ भारत को देकर सार्वजनिक छुट्टी नहीं किया है । अन्य देशों के राष्ट्र प्रमुख के लिए भी हम लोग ऐसे ही सम्मान व्यक्त कर सकते हैं । नेपाल के सन्दर्भ में इस तरह के सम्मान को सांस्कृतिक परम्परा के रुप में भी विकास किया जा सकता है । इसीलिए इसमें नकारात्मक दृष्टिकोण रखकर बहस में उतर आने की आवश्यकता नहीं है ।
(नवम्बर २ से होने जा रहे भारतीय राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का नेपाल भ्रमण सम्बन्धी सन्दर्भ को लेकर सत्ताधारी दल नेकपा माओवादी केन्द्र के पोलिटव्युरो सदस्य एवं विदेश विभाग सचिव युवराज चौलागाईं के साथ हिमालिनी सम्वाददाता लिलानाथ गौतम से हुई बातचीत पर आधारित)
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