मुखर्जी भ्रमण का सन्देशः सत्ता मधेस के प्रति अपनी नीयत ठीक करे

मोदी जी इस भ्रमण के दौरान जनकपुर आना चाहते थे किन्तु सत्ताधारियो ने अनेक शंका उपशंका के कारण सुरक्षा का बहाना बना कर मोदी जी का भ्रमण स्थगित करके वह अवसर भी गँवा दिया । अगर उस भ्रमण से मधेस और भारत के बीच सांस्कृतिक एवम् पारिवारिक बातावरण सुदृढ़ होता तो क्या उससे नेपाल एवम् भारत का रिश्ता मजबूत नहीं होता ?


आम जनकपुर वासी तो यही कह रहे थे कि जब भ्रमण सफल हो जाए तो समझेंगे सफल हो गया वरना नेपाल सरकार का क्या भरोसा, अंतिम घड़ी में भी सुरक्षा का बहाना बना कर भ्रमण रद्द कर सकती है । जितना उत्साह राष्ट्रपति मुखर्जी के भ्रमण को लेकर थी, उतनी ही नहीं, बल्कि कहीं उससे अधिक शंका नेपाली सत्ता के रवैए पर थी ।


यह बड़े दुःख की बात है कि जिस राष्ट्र से नेपाल के व्यक्तियों तक का सम्बन्ध है उस राष्ट्र के निर्दोष राष्ट्राध्यक्ष को बेइज्जती करने की नाकाम कोशिश की गई जो की सर्वथा निंदनीय कार्य है । परन्तु इस से भी शर्म की बात तो यह है कि नेपाल के किसी भी बड़ी पार्टी ने इस निन्दनीय कार्य की भत्र्सना नहीं की । यह दुर्भाग्य ही है कि एक तरफ तो नेपाल के राष्ट्राध्यक्ष अपने मित्रराष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष को आमंत्रित करती हंै और दूसरी तरफ उनको जो बेईज्जत करने की कोशिश करते है उसके लिए दो टूक शब्द भी नही निकालती ।

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डा.मुकेश झा
पिछले एक साल से, या युँ कहें कि जब से संविधान बना है तभी से, नेपाल में आतंरिक और बाह्य भ्रमणों का एक सिलसिला सा चल पड़ा है । मंत्री, प्रधानमंत्री, पार्टी अध्यक्ष इत्यादि सभी अपने अपने स्तर और पहुँच के अनुसार देश के अन्दर एवम् विदेशों मे भ्रमण करके अपना पक्ष स्थापित करने, राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध मजबूत करने, संविधान के समर्थन एवम् विरोध करने, इत्यादि कार्य में लगे हैं । इन भ्रमणों में कुछ भ्रमण, खÞास कर नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली जी का भारत भ्रमण, भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी का नेपाल भ्रमण, नेपाली राष्ट्रपति विद्या भण्डारी जी का जनकपुर एवम् सप्तरी का सखड़ा (छिन्नमस्ता भगवती) भ्रमण, नेपाली प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहाल जी का भारत भ्रमण, चिनीयाँ राष्ट्रपति सी जिन पिंग की काल्पनिक भ्रमण काफी चर्चा में रही एवम् अभी होने वाला भारतीय राष्ट्रपति का नेपाल भ्रमण चर्चा में है ।

इन भ्रमणों से नेपाल का प्रभाव अन्य देशों पर भले ही जैसा भी पड़ा हो परन्तु नेपाल के आंतरिक द्वन्द के कारण मधेस एवम् सत्ता के बीच जो दूरियां निर्माण हुई हैं उसको कम करने की बजाय हर एक भ्रमण ने मधेसी और सत्ता के बीच के खिंचाव मे बढ़ोत्तरी ही की है ।
मधेसी और सत्ताधारी के संघर्षों का मूल कारण सत्तापक्ष द्वारा मधेशियों को अधिकार विहीन रखने का निरन्तर प्रयासरत रहना है, जिसके फलस्वरुप भारतीय उच्च अधिकारियों का नेपाल भ्रमण तथा नेपाल उच्च अधिकारियों का भारत भ्रमण प्रभावित एवम् निष्फल होता देखा गया साथ ही नेपाली सत्तासीनों का अहंकार के कारण भी नेपाली उच्च अधिकारियों का मधेस भ्रमण प्रभावित होता देखा गया ।
कुल मिलाकर संविधान निर्माण के बाद जो भी उच्चस्तरीय भ्रमण हुए हैं, खास कर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का, वह चाहे देश में हो या विदेश में, किसी न किसी विवाद से घिरा ही रहा । संविधान घोषणा के बाद बने नवें प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली का दिल्ली भ्रमण कूटनैतिक दृष्टिकोण से सफल असफल जो भी माना जाय परन्तु उसने सत्ता और मधेशियों के बीच जो तिक्तता थी उसमे बढ़ोत्तरी ही किया । उसका कारण था संविधान में मधेसी के साथ जो घात हुआ था उस से आक्रोशित मधेसियों ने ओली जी का दिल्ली में विरोध किया जिसके फलस्वरूप दिल्ली पुलिस द्वारा करीब तीन दर्जन मधेसी युवाओं को तीन दिन तक हिरासत में रखा गया ।
मोदी भ्रमण का स्थगन
सत्ता और मधेस के बीच सौहाद्रपूर्ण वातावरण बनाने का एक उत्तम प्रयास और हो सकता था, वो था भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी का भ्रमण । मोदी जी इस भ्रमण के दौरान जनकपुर आना चाहते थे किन्तु सत्ताधारियो ने अनेक शंका उपशंका के कारण सुरक्षा का बहाना बना कर मोदी जी का भ्रमण स्थगित करके वह अवसर भी गँवा दिया । अगर उस भ्रमण से मधेस और भारत के बीच सांस्कृतिक एवम् पारिवारिक बातावरण सुदृढ़ होता तो क्या उससे नेपाल एवम् भारत का रिश्ता मजबूत नहीं होता ?
नेपाली सत्ता द्वारा इस तरह बारम्बार मधेसिओं को आक्रोशित करने के लिए तरह तरह की गति विधि की जाती रही है और अगर इस पर मधेस आक्रोसित होता है तो उन पर भारत द्वारा उकसाए जाने का आरोप लगाया जाता है । सत्ता इस तरह की साजिश इस सिर्फ लिए रचती है ताकि इस तरह के आरोप को भारत सत्य माने और अपनी बदनामी होने के कारण जो भी इस तरह के कार्य में हो उनके ऊपर दवाब डाले और वह चुप हो जाए और नेपाली सत्ता आसानी से उसका शिकार बनाकर शोषण करता रहे ।
राष्ट्रपति विद्या भण्डारी का जनकपुर भ्रमण
इसी तरह के उकसाहट भरे गतिविधियों के तहत पिछले साल नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भण्डारी द्वारा जनकपुर भ्रमण का कार्यक्रम रखा गया । उस समय नव जारी संविधान का विरोध चरम सीमा पर था और मधेसिओं ने उसे पूर्ण रूप से बहिष्कार कर दिया था और जनाक्रोश उँचाई छू रही थी । उस वक्त राष्ट्रपति का भ्रमण समय और तरीका शायद बौद्धिक,राजनैतिक या धार्मिक किसी तरह से उपयुक्त नहीं था । बौद्धिक स्तर से इसलिए सही नहीं था क्योंकि जनता का विरोध चरम पर था और जनता उनके भ्रमण का विरोध कर रही थी तो उन्हें अपना भ्रमण स्थगित करके जनमत की कद्र करनी चाहिए थी ।

राजनैतिक स्तर से इसलिए सही नहीं था क्योंकि उनका यह भ्रमण मधेस और सत्ता के बीच की दूरी को बढ़ाने वाला था । धार्मिक स्तर से इसलिए सही नहीं रहा क्योंकि उन्होंने जो गतिविधि मन्दिर दर्शन के दौरान अपनाया उससे सिर्फ मधेसी ही नही बल्कि हर हिन्दू धर्मावलम्बी मर्माहत हुए । सुरक्षा के नाम पर समूचे मन्दिर को नेपाली सेना ने बूट से रौंद दिया, मन्दिर परिसर के नियम और धार्मिक मर्यादा को ताक पर रख कर मन्दिर के कोन–कोने, यहाँ तक की मन्दिर के गर्भ गृह को भी कुत्तों से सुंघाया गया ।Pranab_1113832f

विश्व इतिहास में हिन्दू हो कर हिन्दू धर्म पर इस तरह का प्रहार करने वाली शायद यह पहली राष्ट्रपति रही होगी । उस समय इसका जब मधेसिओं ने विरोध किया तो विरोध करने वालों पर नेपाली पुलिस और सेना टूट पड़ी और दर्जनों लोग को सख्त घायल बनाया । हो सकता है उनके इस कुकृत्य को उनके कुछ अंध समर्थकों ने भले ही सराहा हो पर आम धर्म प्रेमी और आस्तिक हिन्दू को बहुत क्षोभ हुवा । उनके भ्रमण के उपरान्त जब एक धार्मिक कृत्य “शुद्धिकरण“ के अनुसार जनकपुर के स्थानीय वासी एवम् युवाओं ने मन्दिर को साफ करके गंगाजल से अभिषिञ्चित किया तो फिर राष्ट्रपति के अन्ध समर्थक व्यक्ति एवम् मीडिया द्वारा राष्ट्रपति विधवा होने के कारण मन्दिर में गंगाजल छिड़काव किया गया कहकर दुष्प्रचार किया गया । जबकि हर हिन्दू जानता है, जिस जगह को हम पूजा स्थल मानते हैं, चाहे वह अपना घर का एक कोना ही क्यों न हो उस जगह यदि जूता या कुत्ता प्रविष्ट हुवा तो उसे अपवित्र समझा जाता है एवम् उस जगह को धो कर गंगाजल छिड़काव किया जाता है । यह एक सामान्य परम्परा है, परन्तु जानकी मन्दिर में जब वही किया गया तो उसे सरकार के पृष्ठपोषक तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा गलत बतलाया गया । कुल मिलाकर नेपाली राष्ट्रपति विद्या भण्डारी जी का जनकपुर भ्रमण दुर्भाग्यपूर्ण ही रहा, इसमें कोई संदेह नहीं, कारण न तो इसने समाज में कोई सकारात्मक सन्देश दिया और न ही राष्ट्र के लिए उपलब्धिमूलक हुआ । राष्ट्रपति का भ्रमण ऐसा निरर्थक नहीं होना चाहिए था ।
नेपाली राष्ट्रपति विद्या देवी भण्डारी जी का दूसरा भ्रमण हाल ही में सप्तरी स्थित सखड़ा (छिन्नमस्ता) भगवती के दर्शन को ले कर हुआ । नेपाली सत्ता ने मधेसी के मांग अनुसार संविधान संसोधन के लिए समय सीमा छठ तक का निर्धारण किया है जिसके फलस्वरूप अभी जनआक्रोश थोड़ा शांत अवस्था में दिख रहा है, इसीलिए राष्ट्रपति भण्डारी जी का सप्तरी में शायद कोई प्रत्यक्ष विरोध नही हुआ हो फिर भी राष्ट्रपति भण्डारी जी का यह भ्रमण भी सुर्खियों में रहा, कारण नेपाली सेना द्वारा राष्ट्रपति और उनके साथ दर्शनार्थ जाने वाले व्यक्तियों के जूता चप्पल नेपाली सेना द्वारा उठाया जाना । देखने में यह बात सामान्य सी जान पड़ती है परन्तु राष्ट्र के स्वाभिमान का प्रतीक सेना का प्रयोग जूता चप्पल उठाने के लिए प्रयोग करना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता । एक तो धर्म स्थली की मर्यादा रखते हुए राष्ट्रपति जी को और उनके साथ जाने वाले दर्शनार्थी को पहले ही अपने जूता चप्पल को निर्देशित स्थान पर रखना था । अगर वह नहीं रख सकें तो वहां और भी दूसरे स्वयं सेवक रहे होंगे या सामान्य पोशाक के सुरक्षाकर्मी रहे होंगे उनको प्रयोग में लाना चाहिए था । परन्तु या तो राष्ट्रपति भण्डारी अपना रुतवा दिखाना चाहती थी या तो उनको नेपाल के सेना के गौरव गरिमा, मान मर्यादा का मोल पता नहीं इसीलिए तो वर्दी में रहे सेना से जूता चप्पल उठवाने जैसा कार्य किया । राष्ट्रपति के इस कृत्य ने वास्तव में नेपाली सेना के गौरव पर प्रश्न चिन्ह खड़ा किया ।
इन भ्रमणों के सिलसिला में एक और भ्रमण है जो शायद काल्पनिक ही है और जिसके लिये नेपाली सत्ता धारी अपनी एड़ी चोटी एक करके किसी भी तरह कराने के लिये व्यग्र हैं, वह है चीन के राष्ट्रपति सी जिन पिंग का नेपाल भ्रमण । पिछले करीब साल भर से उनके भ्रमण के बारे तरह–तरह की खबरें संचार माध्यम में प्रसारित की जा रही हैं जो की तथ्यहीन ही है क्योंकि चीन ने कभी भी अपने कूटनैतिक नियोग द्वारा नेपाल भ्रमण की बात सार्वजनिक नही किया है । परन्तु नेपाली सत्ता साझेदार चाहे वह पूर्व प्रधानमंत्री के पी ओली हों या वर्तमान प्रधानमन्त्री पुष्प कमल दहाल हों सब के सब अपने आप में चीन के राष्ट्रपति को किसी भी तरह नेपाल भ्रमण के लिये राजी करने का भरपूर प्रयास कर रहे हैं । इतना ही नही माओवादी पार्टी, एमाले एवम् रा प्र पा अपने पार्टीगत स्तर से भी उनको नेपाल भ्रमण कराने की नाकाम कोशिश बार–बार कर रहा है ।
भारतीय राष्ट्रपति भ्रमण
नेपाल के राष्ट्रपति का भ्रमण चाहे जैसा भी रहा हो हर समय विवादास्पद ही रहा है, चीन के राष्ट्रपति का भ्रमण भी अभी भविष्य के गर्भ में ही है परन्तु इसी बीच भारत के राष्ट्रपति महामहीम श्री प्रणव मुखर्जी ने नेपाल का भ्रमण किया । भारतीय राष्ट्रपति के नेपाल भ्रमण को लेकर जनकपुर की जनता ने जो उत्साह दिखाया और उनका जनकपुर की जमीज पर जो भव्य और अविस्मरणीय स्वागत हुआ वह अपने आप में एक इतिहास

कुछ नेता तथा राजनैतिक विश्लेषकों को नेपाल के राष्ट्रपति को भारत के राष्ट्रपति का आगवानी करने के लिए हवाई अड्डा जाना भी नही भाया । इन सब क्रियाकलापों को संकुचित मानसिकता की उपज कह सकते हैं ।
बन गया । जनकपुर में जनसहयोग द्वारा सड़क, तालाब सफाई कार्यक्रम, स्वागत सत्कार की भव्य तैयारियाँ हुईं । यह अलग बात है कि ये सारी तैयारियाँ अविश्वास और शंका के घेरे में की जा रही थी । आम जनकपुर वासी तो यही कह रहे थे कि जब भ्रमण सफल हो जाए तो समझेंगे सफल हो गया वरना नेपाल सरकार का क्या भरोसा, अंतिम घड़ी में भी सुरक्षा का बहाना बना कर भ्रमण रद्द कर सकती है । जितना उत्साह राष्ट्रपति मुखर्जी के भ्रमण को लेकर थी, उतनी ही नहीं, बल्कि कहीं उससे अधिक शंका नेपाली सत्ता के रवैए पर थी । क्योंकि जनकपुर की जनता पिछले साल भारतीय प्रधानमंत्री मोदी जी के भ्रमण के समय भी काफी उत्साहित थी और उसे अंतिम समय में निराश होना पड़ा था ।
परन्तु शंका और उपशंका के बीच यह भ्रमण हुआ और सफल हुआ । इस भ्रमण को नेपाल भारत का एक ऐतिहासिक भ्रमण कहा जा सकता है ।
पिछले दिनों नेपाल की राजनीति में इस भ्रमण को लेकर काफी सरगर्मी रही । नेपाल के राष्ट्रपति विद्या देवी भण्डारी के विशेष निमंत्रण पर आध्यात्मिक एवम् सांस्कृतिक भ्रमण पर आए राष्ट्रपति मुखर्जी नेपाल आने वाले तीसरे भारतीय राष्ट्रपति हैं । मुखर्जी राष्ट्रपति के रूप में भले ही पहली बार नेपाल आए हों परंतु नेपाल मंत्री की हैसियत से मुखर्जी का पहले भी स्वागत कर चुका है । नेपाल के वरिष्ठ नेता एवम् राजनीति विशेषज्ञों की मानें तो मुखर्जी नेपाल के मामले में काफी जानकार, नेपाल की राजनीति को प्रभावित करने वाले तथा नेपाल के शुभ चिंतक के रूप में जाने जाते हैं । सशस्त्र युद्ध में रहे नेपाली माओवादियों को १२ बुँदे सहमति अंतर्गत नेपाल के मूल राजनैतिक धार में लाकर नेपाल में चल रहे गृह युद्ध को समाप्त करने में जो मुखर्जी की भूमिका रही वह एक ऐतिहासिक दस्तावेज है ।
विश्व इतिहास में यदा–कदा ऐसा होता है, जब किसी शक्ति सम्पन्न राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष किसी मित्र राष्ट्र में लम्बा समय बिताए । नेपाल को इस बात के लिए मुखर्जी को तहे दिल से आभार प्रकट करना चाहिये कि उन्होंने अपने बहुमूल्य समय में से तीन दिन नेपाल के भूमि पर व्यतीत किया । नेपाल की राष्ट्रपति भण्डारी ने भारतीय राष्ट्रपति मुखर्जी को नेपाल आने का निमंत्रण दे कर नेपाल भारत के सम्बन्ध को जो ऊर्जा प्रदान किया है वह काफी सराहनीय है । इस ३ दिवसीय भ्रमण के दौरान कुछ व्यवस्था को लेकर सरकार की आलोचनाएं हुई, जनता को थोड़ी कष्ट की अनुभूति भी हुई परन्तु समग्र में इस भ्रमण को सफल ही कहा जाएगा, क्योंकि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक भ्रमण के अनुरूप पूर्व निधारित स्थानों पर भ्रमण करवाने में नेपाल सरकार सफल रही । जिन कारणों को दिखाकर पिछली बार भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की जनकपुर भ्रमण स्थगित हुआ था, वैसा राष्ट्रपति मुखर्जी का भ्रमण पर नहीं, जबकि इसकी पूरी सम्भावना नजर आ रही थी ।
विरोध की राजनीति
इस भ्रमण में कुछ पार्टियाँ, कार्यकर्ता एवम् तथाकथित अभियानियों ने मुखर्जी को भारत के प्रमुख होने के नाते नेपाल में संविधान घोषणा के समय मधेसिओं द्वारा की गई नाकाबंदी को भारत द्वारा किया गया कह कर अपना असफल विरोध जनाने का प्रयास किया । जो भी इस वास्तविकता से अनभिज्ञ है कि नेपाल ने भारत के ऊपर नाकाबंदी का जो आरोप लगाया था, वह नेपाल जेनेवा में प्रमाणित करने में असफल रहा, वहीं अपरिपक्व राजनीतिज्ञ और उनके कुछ कार्यकर्ता इस घटना में संलग्न रहे बाँकी आम नेपाली जनता ने मुखर्जी का दिल से स्वागत किया । अगर सच में भारत नाकाबंदी किया रहता तो भारत के राष्ट्रपति नेपाल भ्रमण के समय लाखों जनता द्वारा विरोध प्रदर्शन होता और सम्भवतः उनका यह भ्रमण भी रद्द भी हो जाता, कुछ गिने चुने लोगों द्वारा सिर्फ विरोध का नारा नहीं लगाया जाता । यह विरोध सस्ती लोकप्रियता पाने के अलावा किसी और कारण से नहीं किया गया जो कि सामान्य दृष्टिकोण से भी निंदनीय कार्य है । कुछ विशिष्ठ नेता जो कि मानसिक रूप से सबल और स्थिर नहीं हैं तथा उच्चस्तरीय व्यक्तित्व के व्यवहार से परिचित नहीं हैं, उनके द्वारा भी कुछ अशिष्ट व्यवहार और वक्तव्य दिया गया जो की अशोभनीय था । कुछ नेता तथा राजनैतिक विश्लेषकों को नेपाल के राष्ट्रपति को भारत के राष्ट्रपति का आगवानी करने के लिए हवाई अड्डा जाना भी नही भाया । इन सब क्रियाकलापों को संकुचित मानसिकता की उपज कह सकते हैं ।
भ्रमण का सन्देश
सांस्कृतिक रूप से समान देशों के बीच होने वाली ऐसी भ्रमणों से दो देशों के नागरिकों को उत्साह और सम्बल तो मिलता ही है, साथ ही दो देशों के बीच के सम्बन्धों का भी पुनः नवीकरण होता है । आद्य शंकराचार्य द्वारा किया गया काठमांडू के पशुपतिनाथ मन्दिर का जीर्णोद्धार एवम् पुनर्निर्माण तथा टीकमगढ़ के महारानी द्वारा निर्मित जनकपुर के जानकी मन्दिर के द्वारा जो स्थापित नेपाल भारत का सम्बन्ध है, उसको राष्ट्रपति मुखर्जी के भ्रमण ने और मजबूती प्रदान किया है । नेपाल भारत का जो सांस्कृतिक सम्बन्ध का विरासत है वह अपने आप में सबूत है कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से नेपाल और भारत अभिन्न है । दोनों देशों की भौगोलिक सीमाएं भले ही घटती बढ़ती रही हो परन्तु नेपाल और भारत अपने अपने अस्तित्व और मित्रता को पौराणिक काल से बनाकर रखने में सक्षम है । किसी नेता, दल, कार्यकर्ता या अभियानी द्वारा एक दूसरे देश के प्रमुख को काला झंडा दिखाने या अपशब्द प्रयोग करने से इस सांस्कृतिक दीवार को तनिक भी प्रभावित नही पर सकता क्योंकि नेपाल और भारत की सांस्कृतिक नींव बहुत ही मजबूत है । जिस व्यक्ति, पार्टी या कार्यकर्ता को न तो अध्यात्म का ज्ञान है और न ही संस्कृति की पहचान है वह भला राजनैतिक भ्रमण और सांस्कृतिक एवम् आध्यात्मिक भ्रमण में क्या अंतर समझे ? इसी का दुष्परिणाम है कि अज्ञानियों द्वारा कुछ न करने योग्य कार्य किया गया ।
यह बड़े दुःख की बात है कि जिस राष्ट्र से नेपाल के व्यक्तियों तक का सम्बन्ध है उस राष्ट्र के निर्दोष राष्ट्राध्यक्ष को बेइज्जती करने की नाकाम कोशिश की गई जो की सर्वथा निंदनीय कार्य है । परन्तु इस से भी शर्म की बात तो यह है कि नेपाल के किसी भी बड़ी पार्टी ने इस निन्दनीय कार्य की भत्र्सना नहीं की । यह दुर्भाग्य ही है कि एक तरफ तो नेपाल के राष्ट्राध्यक्ष अपने मित्रराष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष को आमंत्रित करती हंै और दूसरी तरफ उनको जो बेईज्जत करने की कोशिश करते है उसके लिए दो टूक शब्द भी नही निकालती । राष्ट्रपति मुखर्जी का भ्रमण फूलमाला और काला झंडा के बीच, सत्कार एवम् विरोध के बीच, भारत को अपना मित्र और शत्रु मानने वालों के बीच एक अंतरसंघर्ष के रूप में सम्पन्न हुआ फिर भी इसे असफल नहीं कहा जा सकता । यह नेपाल की अदूरदर्शिता है कि वह नाकाबंदी का आरोप भारत पर लगाये बैठा है तथा बारम्बार उस झूठे और अप्रमाणित आरोप के बल पर कुछ राजनैतिक पार्टियाँ, नेता अपने राजनैतिक रोटी सेकने में लगे हैं ।
राष्ट्रपति मुखर्जी के इस भ्रमण से मधेस और भारत का सम्बन्ध अवश्य ही मजबूत होगा क्योंकि यह सम्बन्ध राजनैतिक नहीं पारिवारिक है । जहाँ तक इस भ्रमण से काठमांडू और दिल्ली के सम्बन्ध की बात है, तो उसका परिणाम अभी समय के गर्भ में है । नेपाल के राजनैतिक पार्टियों से यही अपेक्षा है कि वह नेपाल के अंतद्र्वन्द्व को जल्द समाप्त करे, संविधान को जल्द से जल्द सर्व स्वीकार्य बनाए जिससे देश और विदेश में आदर का पात्र बने, नही तो कभी भारत, कभी चीन और कभी अमेरिका पर आरोप लगाते रहना होगा । मधेश समस्या और संसवधान संशोधन के सम्बन्ध में भारतीय राष्ट्रपति का यही मानना है कि मधेश के प्रति नेपाली सरकार को सहयोगी और सकारात्मक पहल करनी चाहिए और सही नीयत के साथ करनी चाहिए । इसलिए सारी समस्याओं का एक ही समाधान है कि सत्ता मधेस के प्रति अपनी नीयत ठीक करे और अंतरिम संविधान के मर्म को संविधान संसोधन के माध्यम से समावेश करके सम्पूर्ण विश्व के लिए आदर का पात्र बने ।

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