मुखर्जी भ्रमण का सन्देश : सत्ता मधेस के प्रति अपनी नियत ठीक करे

 

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डा.मुकेश झा, जनकपुर, 5 नवम्बर । पिछले तीन दिनों से नेपाल की राजनीति में काफी सरगर्मी रही, मामला था भारतीय राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का नेपाल भ्रमण। नेपाल के राष्ट्रपति विद्या देवी भण्डारी के विशेष निमंत्रणा पर आध्यात्मिक एवम् सांस्कृतिक भ्रमण पर आए राष्ट्रपति मुखर्जी नेपाल आने वाले तीसरे भारतीय राष्ट्रपति हैं।मुखर्जी राष्ट्रपति के रूपमे भले ही पहली बार नेपाल आए हों परंतु नेपाल ने मंत्री की हैसियत से मुखर्जी का पहले भी स्वागत कर चुका है। नेपाल के वरिष्ट नेता एवम् राजनीति विशेषज्ञों की मानें तो मुखर्जी नेपाल के मामला में काफी जानकार, नेपालके राजनीति को प्रभावित करने वाले तथा नेपाल के शुभ चिंतक के रूप में जाने जाते हैं। सशस्त्र युद्ध में रहे नेपाली माओवादियों को १२ बुँदे सहमति अंतर्गत नेपाल के मूल राजनैतिक धार में लाकर नेपाल में चल रहे गृह युद्ध को समाप्त करने में जो मुखर्जी की भूमिका रही वह एक ऐतिहासिक दस्तावेज है।

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विश्व इतिहास में यदा कदा ऐसा होता है जब किसी शक्ति सम्पन्न राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष किसी मित्र राष्ट्रमें लम्बा समय बिताए। नेपालको इस बात के लिए मुखर्जी को तहे दिल से आभार प्रकट करना चाहिये कि उन्होंने अपने बहुमूल्य समय में से तीन दिन नेपाल के भूमि पर व्यतीत किया। नेपाल के राष्ट्रपति भण्डारी ने भारतीय राष्ट्रपति मुखर्जीको नेपाल आने का निमंत्रण दे कर नेपाल भारत के सम्बन्ध को जो ऊर्जा प्रदान किया किया वह काफी सराहनीय है। इस ३ दिवसीय भ्रमण के दौरान कुछ व्यवस्था को लेकर सरकार की आलोचनाएं हुई, जनता को थोड़ी कष्ट की अनुभूति भी हुई परन्तु समग्र में इस भ्रमण को सफल ही कहा जाएगा, क्योकि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक भ्रमण के अनुरूप पूर्व निर्धारित स्थानों पर भ्रमण करवाने में नेपाल सरकार सफल रहा। जैसा पिछली बार भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की जनकपुर भ्रमण स्थगित हुवा था वैसा राष्ट्रपति मुखर्जी का भ्रमण रद्द नही हुवा।

इस भ्रमण में कुछ पार्टीयां, कार्यकर्त्ता एवम् तथाकथित अभियानियों ने मुखर्जी को भारत के प्रमुख होने के नाते नेपाल में संविधान घोषणा के समय मधेसिओं द्वारा की गई नाकाबंदी को भारत द्वारा किया गया कह कर अपना असफल विरोध जनाने का प्रयास किया। जो भी इस वास्तविकता से अनभिज्ञ है कि नेपाल ने भारत के ऊपर नाकाबंदी का जो आरोप लगाया था वह जेनेवा में प्रमाणित करने में असफल रहा, वही अपरिपक्व राजनीतिज्ञ और उनके कुछ कार्यकर्त्ता इस घटना में संलग्न रहे बाँकी आम नेपाली जनता ने मुखर्जी का दिल से स्वागत किया। अगर सच में भारत ने नाकाबंदी किया रहता तो भारत के राष्ट्रपति नेपाल भ्रमण के समय लाखों जनता द्वारा विरोध प्रदर्शन होता और सम्भवतः उनका यह भ्रमण भी रद्द की जाती न की कुछ गिने चुने लोग द्वारा विरोध का नारा लगाया जाता। यह विरोध सस्ता लोकप्रियता पाने के अलावा किसी और कारण से नहीं किया गया जो कि सामान्य दृष्टिकोण से भी निंदनीय कार्य है। कुछ विशिष्ट नेता जो कि मानसिक रूप से सबल और स्थिर नहीं हैं तथा उच्चस्तरीय व्यक्तित्व के व्यवहार से परिचित नहीं हैं उनके द्वारा भी कुछ अशिष्ट व्यवहार और वक्तव्य दिया गया जो की अशोभनीय था। कुछ नेता तथा राजनैतिक विश्लेषकों को नेपाल के राष्ट्रपति को भारतके राष्ट्रपति का आगवानी करने के लिए हवाई अड्डा जाना भी नही भाया। इन सब क्रियाकलापों को संकुचित मानसिकता का उपज कह सकते हैं।

 

इस भ्रमण में कुछ पार्टीयां, कार्यकर्त्ता एवम् तथाकथित अभियानियों ने मुखर्जी को भारत के प्रमुख होने के नाते नेपाल में संविधान घोषणा के समय मधेसिओं द्वारा की गई नाकाबंदी को भारत द्वारा किया गया कह कर अपना असफल विरोध जनाने का प्रयास किया। जो भी इस वास्तविकता से अनभिज्ञ है कि नेपाल ने भारत के ऊपर नाकाबंदी का जो आरोप लगाया था वह जेनेवा में प्रमाणित करने में असफल रहा, वही अपरिपक्व राजनीतिज्ञ और उनके कुछ कार्यकर्त्ता इस घटना में संलग्न रहे बाँकी आम नेपाली जनता ने मुखर्जी का दिल से स्वागत किया। अगर सच में भारत ने नाकाबंदी किया रहता तो भारत के राष्ट्रपति नेपाल भ्रमण के समय लाखों जनता द्वारा विरोध प्रदर्शन होता और सम्भवतः उनका यह भ्रमण भी रद्द की जाती न की कुछ गिने चुने लोग द्वारा विरोध का नारा लगाया जाता। यह विरोध सस्ता लोकप्रियता पाने के अलावा किसी और कारण से नहीं किया गया जो कि सामान्य दृष्टिकोण से भी निंदनीय कार्य है। कुछ विशिष्ट नेता जो कि मानसिक रूप से सबल और स्थिर नहीं हैं तथा उच्चस्तरीय व्यक्तित्व के व्यवहार से परिचित नहीं हैं उनके द्वारा भी कुछ अशिष्ट व्यवहार और वक्तव्य दिया गया जो की अशोभनीय था। कुछ नेता तथा राजनैतिक विश्लेषकों को नेपाल के राष्ट्रपति को भारतके राष्ट्रपति का आगवानी करने के लिए हवाई अड्डा जाना भी नही भाया। इन सब क्रियाकलापों को संकुचित मानसिकता का उपज कह सकते हैं।

सांस्कृतिक रूप से समान देशों के बीच होने वाली ऐसी भ्रमणों से दो देशों के नागरिकों को उत्साह और सम्बल तो मिलता ही है साथ ही दो देशों के बीच का सम्बन्ध भी पुनः नवीकरण होता है।आद्य शंकराचार्य द्वारा किया गया काठमांडू के पशुपतिनाथ मन्दिर का जीर्णोद्धार एवम् पुनर्निर्माण तथा टीकमगढ़ के महारानी द्वारा निर्मित जनकपुर के जानकी मन्दिर के द्वारा जो स्थापित नेपाल भारत का सम्बन्ध है उसको राष्ट्रपति मुखर्जी के भ्रमण ने और मजबूती प्रदान किया है। नेपाल भारत का जो सांस्कृतिक सम्बन्ध का विरासत है वह अपने आप में सबूत है कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से नेपाल और भारत अभिन्न है। दोनों देशों की भौगोलिक सीमाएं भले ही घटती बढ़ती रही हो परन्तु नेपाल और भारत अपने अपने अस्तित्व और मित्रता को पौराणिक काल से बनाकर रखने में सक्षम है। किसी नेता, दल, कार्यकर्त्ता या अभियानी द्वारा एक दूसरे देश के प्रमुख को काला झंडा दिखाने या अपशब्द प्रयोग करने से इस सांस्कृतिक दिवार को तनिक भी प्रभाव नही पर सकता क्योंकि नेपाल और भारत की सांस्कृतिक नींव बहुत ही मजबूत है।जिस व्यक्ति, पार्टी या कार्यकर्त्ता को न तो अध्यात्म का ज्ञान है और न ही संस्कृति का पहचान है वह भला राजनैतिक भ्रमण और सांस्कृतिक एवम् आध्यात्मिक भ्रमण में क्या अंतर समझे? इसी का दुष्परिणाम है कि अज्ञानियों द्वारा कुछ न करने योग्य कार्य किया गया।

यह बड़े दुःख की बात है कि जिस राष्ट्र से नेपाल के व्यक्तियों तक का सम्बन्ध है उस राष्ट्र के निर्दोष राष्ट्राध्यक्ष को बेइज्जती करने की नाकाम कोशिस की गई जो की सर्वथा निंदनीय कार्य है। परन्तु इस से भी शर्म की बात तो यह है कि नेपाल के किसी भी “बड़े” पार्टी ने वैसा कार्य का भर्त्सना के लिए दो शब्द नहीं बोला। यह दुर्भाग्य ही है कि एक तरफ तो नेपाल के राष्ट्राध्यक्ष अपने मित्रराष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष को आमंत्रित करती है और दूसरे तरफ उनको जो बेईज्जत करने का कोशिस करता है उसके लिए दो टूक शब्द भी नही निकालती। राष्ट्रपति मुखर्जी का भ्रमण फूलमाला और काला झंडा के बीच, सत्कार एवम् विरोध के बीच, भारत को अपना मित्र और शत्रु मानने वालों के बीच एक अंतरसंघर्ष के रूप में सम्पन्न हुवा फिर भी इसे असफल नही कहा जा सकता। यह नेपाल की अदूरदर्शिता है कि वह नाकाबंदी का आरोप भारत पर लगाये बैठा है तथा बारम्बार उस झूठे और अप्रमाणित आरोप के बल पर कुछ राजनैतिक पार्टीयाँ, नेता अपने राजनैतिक रोटी सेकने में लगे हैं।

राष्ट्रपति मुखर्जी के इस भ्रमण से मधेस और भारत का सम्बन्ध अवश्य ही मजबूत होगा क्योंकि यह सम्बन्ध राजनैतिक नहीं पारिवारिक है। जहाँ तक इस भ्रमण से काठमांडू और दिल्ली का सम्बन्ध की बात है तो उसका परिणाम अभी समय के गर्भ में है। नेपाल के राजनैतिक पार्टीयों से यही अपेक्षा है कि वह नेपाल के अंतर्द्वन्द को जल्द समाप्त करे, संविधान को जल्द से जल्द सर्व स्वीकार्य बनाए जिससे देश और विदेश में आदर का पात्र बने , नही तो कभी भारत, कभी चीन और कभी अमेरिका पर आरोप लगाते रहना होगा। सारा समस्या का एक ही समाधान है कि सत्ता मधेस के प्रति अपनी नियत ठीक करे और अंतरिम संविधान के मर्म को संविधान संसोधन के माध्यम से समावेश करके सम्पूर्ण विश्व के लिए आदर का पात्र बने।

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