मुसलिम महिला के लिए कोटा की व्यवस्था हो :मोहना अंसारी

मुस्लिम समुदाय देश का तीसरा बड़ा धार्मिक समूह है । मुस्लिम का ज्यादा बसोबास तराई–मधेश में है । सन् २०११ की जनगणना के अनुसार ९७ प्रतिशत तराई–मधेश में ओर ३ प्रतिशत पहाड़ में निवास करते हैं । मुस्लिम की साक्षरता दर दलितों से भी कम है । अर्थात् मुस्लिम की साक्षरता दर ०.४१ है जबकि दलितों की ०.४२४ प्रतिशत है । मुस्लिम की कुल आमदनी वार्षिक रूप में १०,२०० रूपये है, तो दलितों की १३,२०० रूपये है ।
मुस्लिम महिलाओं की पहली समस्या है– शिक्षा । इस समुदाय में लड़कियों को बहुत कम पढ़ाया जाता है । दूसरी समस्या है बीमार होने पर वे अस्पताल नहीं जाती हंै । तीसरा समस्या है– राजनीतिक । शिक्षा में खासकर छात्रवृत्ति की व्यवस्था नहीं होने की वजह से गरीब परिवार की लड़कियाँ उच्च शिक्षा से वंचित हो जाती हैMohana-Ansari-front

वैसे २०६८ साल से सरकार ने प्राविधिक क्षेत्र में छात्रवृत्ति की व्यवस्था की है । इसलिए महिला को राष्ट्र के मूलधार में लाने के लिए ज्यादा निवेश करना चाहिए । इसी प्रकार मदरसा शिक्षा को भी आधुनिकीकरण करना चाहिए । क्योंकि मदरसा में भी इंजीनियरिंग तथा डॉक्टरी की पढ़ाई की जा सकती है । यहाँ भी सरकारी पाठ्यक्रम लागू किया जा सकता है । संविधानतः उन्हें भी अपनी मातृभाषा में शिक्षा अर्जन करने के अधिकार की गारंटी की गयी है । इसलिए भी शैक्षणिक योजनाएं होनी चाहिए ।
इसी प्रकार राजनीति में भी पहुँच बढ़ाने हेतु नीतियां बनाने की आवश्यकता है । इसके साथ–साथ उनके लिए ‘कोटा’ की भी व्यवस्था होनी चाहिए । हालांकि मुस्लिम समुदाय में कोटा की व्यवस्था है, परन्तु वह कोटा पहुँचवाले लोग ही उपभोग करते हैं । इसके लिए यह जरूरी है कि एक मानक प्रावधान बनाया जाए । स्वास्थ्य परीक्षण हेतु महिला चिकित्सक की व्यवस्था होनी चाहिए । क्योंकि मुस्लिम औरत पुरुष चिकित्सक से स्वास्थ्य परीक्षण नहीं करती है ।
अब जहां तक सवाल परदा अथवा बुरका का, तो मेरे ख्याल से नेपाल में परदा एक संस्कृति के रूप में रही है । यह संस्कृति हर जाति, समुदायों में दिखाई देती है । परदा का आशय है बदन ढकना । परदा पुरुष व महिला दोनों के लिए है । मजहब भी कहता है कि परदे के अंदर रहो । इसी प्रकार नेपाल के परिवेश में तलाक हमने बहस के विषय में देखा है । तलाक मुस्लिम समुदाय के अंदर की समस्या है । पुरुषों का तलाक बहुत जोरों से प्रचार–प्रसार हुआ है । महिला भी तलाक ले सकती है । लेकिन इसके लिए एक अलग प्रवाधान है । जैसे, महिलाओं की जरूरतें पूरी नहीं हो, तो उस स्थिति में महिला ‘खुला’ अर्थात् छुटकारा’ या ‘बंधन मुक्त होना’ ले सकती है । तलाक तीन बार दिया जाता है । प्रथम व दूसरे तलाक में पुरुष अगर माफी मांगते हैं, तो वह तलाक नहीं होता है । तीसरी बार पुनः तलाक कह दे तो पूर्ण रूप से उसे तलाक माना जाता है । जबकि हमारे गांव, नगरों एवं घरों में तलाक को गलत ढंग से प्रयोग किया जाता है । वैसे संविधान में तलाक का कोई प्रावधान नहीं है ।
समग्रतः कहा जा सकता है उपर्युक्त समस्याओं के बावजूद भी कुछ प्रतिभावान महिलाएं हैं । वे अब भी आगे बढ़ी है, और बढ़ रही है । उन्होंने कौमी जिन्दगी पर गहरा असर डाला है । अंत में मैं कहना चाहूंगी कि आज इस बात की सख्त जरूरत है कि महिलाओं में शिक्षा, चेतना आदि का विकास कर उन्हें पिछड़ेपन से निकाला जाए । जब पूरा मुसलिम समाज, विकसित होगा, तब मुसलिम महिला भी साहस व दृढ़ निश्चय के साथ कौमी जिन्दगी के निर्माण में हिस्सा ले सकेगी । ये कुछ प्रश्न है जिनकी ओर न केवल समाज शास्त्रियों, नीति निर्माताओं, राजनीतिज्ञों का ध्यान देना अपेक्षित है अपितु सरकार को इस दिशा में घनीभूत रूप में सोचना है ।

इसे भी पढ़ें..

मुस्लिम महिलाएँ क्यों पिछड़ी हुई है ? क्या हो सकता है इसका समाधान ?

loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz