मुस्ताङ, जहां आज भी चलता है मुखिया का शासन

काठमांडू, ३ भाद्र । राजामहाराजा के शासन काल में गांव–गांव में मुखिया होते थे । उनकी मुख्य जिम्मेदारी केन्द्र से प्राप्त राजा का निर्देशन पालन करना एवं स्थानीय जनता की ऊपर शासन करना होता था । ऐसे लोगों में से तो कुछ असल भी होते थे, जो जनता की दुःख और पीड़ा को सम्बोधन करने का प्रयास रते थे । लेकिन अधिकांश लोग सामन्त चरित्र के होते थे, स्थानीय जनता में अपनी मनमानी करने के लिए ऐसे लोग स्वतन्त्र होते थे । जब देश में राजनीतिक परिवर्तन होने लगा, मुखिया का शासन समाप्त होते गया । उसके बाद स्थानीय प्रशासन तथा केन्द्र से मुखिया को जो जिम्मेदारी मिलती थी, वह जिम्मेदारी स्थानीय जनप्रतिनिधिओं को मिलने लगा । यह अभ्यास तीन दशक अधिक समय से होता आ रहा है । अर्थात् नेपाल में तीन दशक अधिक समय से प्रजातान्त्रिक अभ्यास हो रहा है । लेकिन आज भी नेपाल में ऐसे गांव है, जहाँ निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का नहीं, मुखिया का शासन चलता है ।
आज प्रकाशित अन्नपूर्ण पोष्ट ने कुछ ऐसी ही समाचार को प्रकाशित किया है । समाचार मुस्ताङ जिला का है । मुस्ताङ में ५ गांवपालिका और २५ वडा हैं । सभी गांवपालिका तथा वडा में जनता ने अपनी प्रतिनिधि को वोट देकर निर्वाचित किया है । लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि २५ वार्ड के लगभग ५० गांव के लिए मुखिया भी चयनित हो गए है ।
उदाहरण के एि सदरमुकाम जोमसोम में दो गांव हैं, जहां सरकारी कार्यालय रहता है, वहां रामप्रसाद थकाली और एयरपोर्ट टोल में सुरेन्द्र थकाली को मुखिया के रुप में चयन किया गया है ।
स्मरणीय है, जिला में नेपाल सरकार के वैधानिक अंग जिला अदालत, जिला प्रशासन, जिला प्रहरी कार्यालय भी है । विकास निर्माण के लिए दर्जनौं सरकारी निकाय और गैरसरकारी संस्था भी चल रहा है । तीन महिने पहले ही जनप्रतिनिधि भी निर्वाचित हो चुके हैं । ऐसी अवस्था में आज भी वहां अधिकांश काम मुखिया के मातहत ही होता है । यहां तक कि जोमसोम बजार में मुखिया के लिए एक अलग ही कार्यालय भी खड़ा किया गया है ।

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